शुक्रवार, 27 मार्च 2009

हसीनाओं का पसीना

 
आजकल हर पार्टी चाहती है कि वह किसी न किसी हसीना को अपना उम्मीदवार बनाए, इससे पार्टी की टी.आर.पी. बढ जाती है, क्योंकि जब वह अपने दोनों हाथों को जोड़ कर वोट मांगेगी तो किस माई के लाल में हिम्मत है कि उसको मन कर दे..इतनी  बड़ी अभिनेत्री वोट जैसी तुच्छ चीज़ मांगने आई है और हम इनकार कर दें.छिः...बेचारी दिन भर धूप में झुलस के अपनी नर्म, नाज़ुक त्वचा का बेडा गर्क कर रही है ..उस त्वचा का,जिसके हम दीवाने हुआ करते थे..जिस ब्रांड के साबुन से वह नहाती, थी उसे लेने के लिए घर में महाभारत किया करते थे, उसके लिए शेरो शायरी किया करते थे, उससे मिलती जुलती शक्ल की लड़की से इश्क फरमाया करते थे, आज उसके एहसान चुकाने का सुनहरा मौका हमारे सामने आया है, और हम मुकर जाएं तो हमें नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी..ये महलों में रहने वालीं, ए.सी.गाड़ी में चलने वाली,आज गलियों की ख़ाक छानने में मजबूर है किसकी खातिर? हमारी ही न! क्या हुआ जो एक बार उसकी एक ज़रा सी झलक पाने के लिए बारह घंटे धूप में इंतज़ार किया था,लाठियाँ खाईं थी,और सिर पर बारह टांकें आए थे..पर आज वह खुद चल कर आई है उसका प्रायश्चित्त करने, वह भी हाथ जोड़ कर..आज चाहें तो उससे हाथ भी मिला सकते हैं ..
और वो देखो पार्टी कार्यकर्ताओं को..हसीना को देख-देखकर नारे लगा रहे हैं..पता लगाना मुश्किल है कि पार्टी की जिंदाबाद कर रहे हैं या हसीना की..यही कार्यकर्त्ता पिछले चुनाव में सुबह, शाम, दिन, रात मुर्गा, कबाब तोड़ते थे, रात को शराब की बोतल के बिना सो नहीं पाते थे, आज हसीना के साथ सारा सारा दिन सड़कों पर भूखे-प्यासे घूम रहे हैं ..इनका निःस्वार्थ समर्पण देखकर मन श्रद्धा से भर गया.
हसीना को पसीना ना आ जाए इसका ख़ास ख्याल रखा जा रहा है..वैसे भी इनको पसीना कम ही आता है .अगल बगल कई लोग पंखा लेकर खड़े हैं ..कईयों के हाथ में हर समय रुमाल तैयार रहता है..'काश! इसके पसीने की एक बूँद भी मुझे मिल जाए तो हमेशा के लिए अपने रुमाल में सहेज लूँगा..और अपने दोस्तों को जलाया करूँगा.. 
इनका बस चले तो ये सूरज के मुख पर पर्दा दाल दें ...ताकि हसीना का गोरा रंग धूप से काला न हो जाए..सड़कों पर कालीन बिछा दें..ताकि उसके पैरों में बिवाइयां न पड़ जाएं ...अरे कुछ याद आया ...माँ घर में पिछले दस दिनों से एड़ियों में दर्द के चलते बिस्तर से उठ नहीं पा रही है ...कोई बात नहीं ..माँ और हसीना का क्या मुकाबला? ...माँ तो किसी तरह रोती पीटती अपने आप खड़ी हो जाएगी ..लेकिन अगर हसीना की एडियाँ फट गईं तो अनर्थ हो जाएगा, पार्टी की शान में बट्टा लगेगा सो अलग ..
वो देखो नज़ारा..जिस जिस मोहल्ले से वो गुज़र रही है, वहां के वाशिंदे खुद को वी. आई.पी. समझ रहे हैं ..उसका हाथ हिलता है तो लोगों के दिल में हूक सी उठती है 'काश! एक बार ये हाथ हमारे हाथ में आ जाता'....जैसे ही वह हवा में चुम्बन उछालती है ..कई नौजवान अपने बाप दादाओं की बनाई मुंडेरों को तोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं .... हसीनाओं तुम्हारी 'जय हो

6 टिप्‍पणियां:

  1. हसीना पुराण पढ़ कर लगा
    शेफाली जी की नजर धूपिया
    नहीं खुफिया है, और इतनी
    खुफिया कि इनकी पोलखोलक
    कलम से ऐसा लग रहा है कि
    शेफाली जी अपने पूर्वजन्‍मों
    के किस्‍से के हिस्‍सों को कलमबद्ध
    कर रही हैं।
    तस्‍वीर का यह रूख पसंद आया।

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  2. बहुत ही उम्दा व्यंग्य.......बढिया लगा

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  3. मजा आ गया. तीखा व्यंग्य भी और लिखने की शैली भी रोचक.
    बेहतरीन.

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