शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

राजनीति में पोर्न, पोर्न की राजनीति

यह समय ऐसा है बंधुवर कि विद्वजन जिसके बारे में कह गए हैं कि करो सब लेकिन इस तरह से कि जिस तरह से दानी लोग दान दिया करते हैं जिसमें दाएं हाथ को पता न चले कि बाएं हाथ ने क्या दिया है। 
घूस लो पर स्टिंग में मत फंसो, नक़ल करो पर नज़र में मत आओ, चोरी करो पर सी.सी.टी.वी.से बच जाओ। सिगरेट और शराब पियो पर ऐसे कि बदबू न आए। पोर्न देखो पर पकड़े मत जाओ। 

बीते कुछ दिनों बड़ी रोचक घटनाएं हुईं। अमेरिका में ट्रम्प को पोर्न मामले में जेल हुई। अपने देश में त्रिपुरा के एक मंत्री महोदय पोर्न देखते हुए पकडे गए। यूँ पहली बार ऐसा नहीं हुआ है, पूर्व में भी कई नेता संसद अथवा विधान सभा में पोर्न देखते हुए पकडे गए हैं। इस मामले में नार्थ -ईस्ट से लेकर साउथ - वेस्ट सभी दिशाएं एक समान हैं। 

आंकड़े बताते हैं कि देश में धर्म और पोर्न दो सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली साइट्स हैं। सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है कि धार्मिक साइट्स कहीं भी और कभी भी देखी जा सकती हैं जबकि पोर्न बेचारी को अपना मुंह छुपाना पड़ता है। 

कुछ सावधानियाँ बरती जाएं तो पोर्न देखना इतना भी मुश्किल नहीं है। 

पोर्न देखने के लिए सही समय का चुनाव अत्यंत आवश्यक है। जब संसद में या विधान सभा में हंगामा हो रहा हो, गर्मागर्म बहस हो रही हो, माइक से लेकर के कुर्सी ,जूते ,गमले फेंकें जा रहे हों ,विधेयक फाड़े जा रहे हों ,लात -घूसों का हसीं मंज़र चल रहा हो, वह समय सर्वथा उपयुक्त रहता है। इस समय सारे कैमरों का रुख दूसरी तरफ होता है ऐसे में आप एक कोने में चुपचाप पोर्न देख सकते हैं। 

संसद में पोर्न देखना हो तो भाव - भंगिमा का ध्यान रखना सर्वाधिक आवश्यक है। बैठे -बैठे ऊँघने का अभिनय उपयुक्त रहेगा। आँखें बंद करके सिर को मेज से टिका देना चाहिए। देखने वाले को ऐसा लगना चाहिए कि आपका ह्रदय अत्यंत द्रवित है और दुनिया भर की हालत ,गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी पर आपके आंसू टपकने ही वाले हैं। 

अगला ध्यान मुद्रा से सम्बंधित है। अर्थशास्त्र वाली नही। पोर्न देखते समय पीठ को यथासंभव झुका कर रखें। ऐसा लगना चाहिए कि महंगाई का सारा बोझ आपके ऊपर ही आ गया है। गर्दन इतनी झुकी हो कि देखने वाले को लगे कि आप आने वाले चुनावों के लिए अभी से वोट मांगने का अभ्यास कर रहे हैं। 

पोर्न देखने के लिए आपको अपने कपड़ों की डिजाइन पर ध्यान देने की गहन आवश्यकता है। टाइट फिटिंग के कपड़ों को तिलांजलि दे दें। कुर्ते की बाहों को यथासंभव चौड़ा बनवाएं। उसके अंदर छुपी हुई जेब बनी हो, मौका पड़ने पर जिसमें मोबाइल खिसकाया जा सके। याद रहे जेबें सिर्फ पैसा भरने के ही काम नहीं आतीं है। 

स्कूली बच्चों को बुला कर उनसे नक़ल करने के तरीके जान कर उनका उपयोग चुपचाप पोर्न देखने के लिए किया जा सकता है। परीक्षा के दौरान बच्चे किस सफाई से नक़ल कर ले जाते हैं, एक से बढ़कर एक दिग्गज निरीक्षक तक भांप नहीं पाता। सामने बैठा टीचर, जो बच्चों को हिलने भी नहीं देता या उड़नदस्ते के घाघ सदस्य जो नक़ल रखने के चप्पे - चप्पे से परिचित होते हैं, सब मिलकर भी दुर्दांत नकलचियों को पकड़ नहीं पाते हैं। इन बच्चों से माननीय लोग व्यक्तिगत ट्यूशन क्लासेस भी ले सकते हैं। 

पोर्न देखना हो तो कैमरों से बचना आना परम आवश्यक है।अच्छा होगा कि जो भी आप देखने जा रहे हों उसे मीडिया को पहले दिखा दें, फिर वो चुप रहेंगे। स्कूली बच्चे ऐसे ही पकडे जाते हैं ,जिन बच्चों को नक़ल करने को नहीं मिलती वे ही सबसे पहले शिकायत करते हैं, उन्हें एक - आध पुर्ची मिल जाए तो वे शांत रहते हैं। 

अगला ध्यान बैठक व्यवस्था का रखना होगा । आपको सबसे आगे की सीट पर बैठना होगा । स्कूल - कॉलेज में भी  सबसे आगे बैठने वाले बच्चे होशियार माने जाते हैं ,न कोई उनकी कॉपी चेक करता है न सवाल पूछता है। आगे बैठने वाले बोलते रहते हैं पीछे बैठने डांट खाते हैं। अंतिम सीट पर बैठे बच्चों को बिना किसी प्रमाण के जन्मजात बेवकूफ ,शरारती ,काम न करने वाला उद्दंड मान लिया जाता है। 

माननीय अपने सामने फाइलों का एक बड़ा सा ढेर रख लें। थोड़ी -थोड़ी देर में फ़ाइल में से एक - आध पन्ने को पलटते रहें ताकि देखने वालों को ज़रा भी शक न हो। 

कुछ कदम सरकार को भी इस दिशा में उठाने होंगे। शून्य काल की तर्ज पर पोर्न काल की शुरुआत करनी चाहिए। पोर्न नहीं देखने वालों को विशेष भत्ता दिया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति के तहत 'पोर्न कैसे देखें ' टॉपिक पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। इसके लिए देशवासियों से राय ली जा सकती है। 

मंगलवार, 30 जून 2020

गो कोरोना गो

प्रस्तुत है कोरोना पर कविता, श्रोताओं की भारी डिमांड पर -

इस कोरोना काल में 
महामारी के जाल में 
नित नई फरमाइशें हैं 
नित नई ख्वाहिशें हैं | 

सुबह को खाने हैं समोसे 
दिन को मीठी - मीठी खीर 
शाम को गर्मागर्म पकौड़े 
रात को शाही पनीर | 

सबसे ज़्यादा टूटा है 
महिलाओं पर इसका कहर 
बीत रहे रसोई में दिन 
रसोई में ही बीते सहर | 

दुनिया से हो गयी हूँ आइसोलेट 
हूँ रसोई में कवारंटीन 
पैर पडूँ तुम्हारे कोरोना 
जाओ तुम वापिस अपने चीन |  

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

कितना मुश्किल है बच्चो !

दस दिवसीय सेवारत प्रशिक्षण के पश्चात प्राप्त ज्ञान |   

हमने जाना बच्चों !
कितना मुश्किल होता है 
फिर से बच्चों जैसा बनना | 

हमने जाना बच्चों !
कितना उबाऊ होता है 
किसी लेक्चर को सुनना 
सुबह से लेकर शाम तक 
एक मुद्रा में बैठे रहना 
एक के बाद एक लगातार 
एक सी बातें सुनते रहना | 

हमने जाना बच्चों !
कि तुम्हारा तन और तुम्हारा मन 
कक्षा से क्यों जी चुराता है 
पढ़ने - लिखने से ज़्यादा मज़ा 
गाने, बजाने और चुटकुले 
सुनाने में आता है | 

हमने जाना बच्चों !
क्यों तुम सरपट दौड़ लगाते हो 
हर वादन के बाद फ़ौरन 
नल पर पाए जाते हो 
अनसुना कर देते हो घंटी को 
मुश्किल से कक्षा में आते हो 

हमने जाना बच्चों !
कि कभी - कभी तुम क्यों 
बेवजह कक्षा में खिलखिलाते हो 
बोलते रहते हैं हम, और तुम 
जाने किन - किन बातों पर 
मंद - मंद मुस्काते हो 
कितना भी टोकें हम तुम्हें 
तुम बाज़ नहीं आते हो | 

हमने जाना बच्चों !
क्यों तुम कभी - कभी 
भूल गए कॉपी, नहीं लाए किताब 
खत्म हो गयी पैन की रीफिल 
जैसे बहाने बनाते हो 
चूर हो गए थक कर 
सिर्फ दस दिनों में हम 
तुम रोज़ इतना काम 
जाने कैसे कर पाते हो ?

हमने जाना बच्चों !
बंधी - बंधाई लकीरों पर चलना 
सुनना, पढ़ना, लिखना 
लिखे हुए को प्रस्तुत करना 
कितना मुश्किल होता है बच्चों !
फिर से बच्चों जैसा बनना | 

मंगलवार, 29 मई 2018


वो हसीन दर्द ------


पिछले कई दिनों से वह खासी परेशान नज़र आ रही है । उनका कहना है कि लगभग दो वर्षों से एक लड़का है जो उन्हें परेशान कर रहा है । परेशान कहें तो इस अर्थ में कि वह उन्हें लगातार घूरता रहता है । जब वह ऑफिस जाती हैं तो उसी समय अपनी बाइक लेकर आ जाता है और उनके पीछे - पीछे रोज़ उनके ऑफिस तक पहुँच जाया करता है । 
जिन दिनों वह उन्हें परेशान करता था, वे प्रसन्न रहती थीं । चहकती रहती थी । नए - नए परफ्यूम लगा कर महकती रहती थी । नियमित रूप से कान के टॉप्स बदलती थी, नई - नई मालाएं पहनती थी । खूबसूरत कारीगरी के सूट हर हफ्ते खरीदा करती थी । मैचिंग के चप्पल और जूते उनके पैरों में सजने लगे थे । बढ़ते वजन पर लगाम कसने के लिए सुबह चार बजे उठ कर पांच किलोमीटर की दौड़ भी लगाने लगी थी । चाल में नज़ाकत और बातचीत में नफासत आ गयी थी । धूप हो या छाँव, काला चश्मा सर्वदा आँखों में शोभायमान रहने लगा था । काले चश्मे से आँखों के आस - पास के काले घेरों और झुर्रियों को छिपाने के लिए मदद मिलने लगी थी । दाँत बाहर निकले हुए थे जिन पर तार लगवा दिया था । कमर तक के खूबसूरत और घने बालों को लेटेस्ट स्टाइल में कटवा दिया था । 
उस लड़के के परेशान करना शुरू करने से पहले वे जब भी मिलतीं थीं, अपनी बेटी की बातें बताने लगती थीं । बेटी, जो उनकी नज़रों में अद्भुद एवं विलक्षण है । उसका दिमाग, अगर उनका कहा सच माना जाए तो आने वाले समय में आइंस्टीन को पीछे छोड़ सकता है । 
लेकिन आजकल वे जैसे ही मिलती हैं, उस परेशान करने वाले का ज़िक्र छेड़ देती हैं । नौबत यहाँ तक आ पहुँची है कि उन्होंने सामान्य शिष्टाचार का पालन करना भी त्याग दिया है।  
अब उनका पहला वाक्य होता है '' वह पीछा ही नहीं छोड़ रहा है, परेशान करके रख दिया है''।  
हमने उन्हें तरह - तरह के सुझाव दिए । 
''तुम उस तरफ मत खड़ी हुआ करो । बस का  इंतज़ार करने की जगह बदल दो तब शायद कुछ फर्क पड़े'' ।
''पुलिस से शिकायत करनी चाहिए तुम्हें'' ।   
वे कहती '' इसमें भी एक पेंच है । उसने कभी मुंह पर तो कुछ कहा नहीं । बस घूरता रहता है और रास्ते भर मोटर बाइक से पीछा करता है ''।
''उससे डायरेक्ट कह कर देखो'' 
''एक बार मैंने कहा तो बोलता है कि '' मैं तो आपको जानता भी नहीं हूँ । आपके पीछे थोड़े ही आता हूँ, अपने काम से जाता हूँ'''। 
''क्या पता सच में किसी और काम से ही जाता हो''। मैंने कहा तो शायद उन्हें बुरा लग गया । 
''नहीं मुझे पता है, मेरे ही पीछे आता है ''। उनके आत्मविश्वास को देखते हुए मैंने हथियार डाल देना ही उचित समझा । 
''एक बार मैंने फोन किया था उसे धमकाने के लिए लेकिन वह नंबर किसी और का निकला ''। 
आपको नंबर कहाँ से मिला ? मैंने पूछा । 
''मैंने किसी से कहा था इसका नम्बर पता करने के लिए । पता नहीं क्या दिमाग खराब हो गया है इसका ? क्या उसे दिखता नहीं कि मैं शादीशुदा हूँ, एक बेटी की माँ हूँ । मेरे गले में मंगलसूत्र भी है, मांग में सिन्दूर भी लगा रहता है । पैरों में बिछिये पहने रखती हूँ । पता नहीं क्यों दीवानों की तरह घूरता रहता है । अब मैं छोटी लगती हूँ तो इसमें मेरा क्या कसूर है'' ? उसने अनुमोदन के लिए मेरी तरफ देखा मैं उनकी इस बात पर हामी नहीं भर पाई । उन्हें लगा कि मैं उनके छोटे दिखने और उनके पीछे एक दीवाना पड़ा होने के कारण उनके भाग्य से चिढ रही हूँ ।  

उन्हें एक लड़का परेशान करता है यह बात उनके साथ आने -जाने वाले हर शख्स को मालूम हो गयी है । जब वे पाती थीं कि फलाने को उस लड़के के बारे में नहीं पता तो वे आश्चर्य से भर जाया करतीं,  फ़िर पूरे विस्तार के साथ बताती थीं कि उन्हें किस - किस तरह से वह लड़का परेशान करता है । अब हालात यह हो गयी थी कि जैसे ही वे बस में बैठती, कई लोग एक साथ पूछ बैठते '' आज क्या किया उस लड़के ने ?''

लड़के के बारे में बताते हुए उनके चेहरे में एक किस्म का नूर सा आ जाया करता था। एक प्रकार की श्रेष्ठता का एहसास भी हो सकता है कि देखो पैंतालीस पार कर गयी हूँ फिर भी एक पच्चीस साल का लड़का मुझे छेड़ रहा है । एक तरफ आप लोग हैं कि चालीस की उम्र में ही पचास के लग रहे हैं और कोई घास भी नही डाल रहा है।   

साथ वाले कुछ लोग दबे स्वर में एक दूसरे से कहते भी रहते हैं, ''झूठ बोलती है सरासर । कोई लड़का - वड़का नहीं है बस इसके मन का वहम है'' । दूसरी कहती है '' अगर इतनी ही परेशान है तो क्यों नहीं पुलिस में शिकायत करती है ? छह महीने से सुन - सुन कर कान पक गए हैं''। 
तीसरी फुसफुसाती है, ''मुझे तो लगता है कि यह ही उसके पीछे पडी हुई है । अगर पूछेंगे न तो शर्तिया वह लड़का यही कहेगा कि इस बुढ़िया ने मुझे तंग कर रखा है ''। 
वे समवेत स्वर में खिलखिलाती हैं जिसे वह अनसुना कर देती है ।
 
इस बीच मैं कुछ दिनों की छुट्टी पर चली गई थीं । छुट्टियों से लौटी तो बस स्टॉप पर खड़ी उस सूरत को मैं पहचान ही नहीं पाई । उनका रूप - रंग ही बदल चुका था । बाल डाई किये जाने की राह देख रहे थे । शरीर पर काफी मांस चढ़ चुका था । न फिटिंग के कपडे, न मैचिंग के आभूषण, पैरों पर हवाई चप्पल, लिपिस्टिक, बिंदी, काजल, क्रीम सब छूमंतर हो चुके थे । अब वे फिर से  वही पुरानी फ्रस्टेटेड कामकाजी औरत में बदल गयी थी । आँखे बुझी - बुझी मानो जीवन का सारा रस निचुड़ गया हो । चेहरे की रौनक उड़ चुकी थी । 
'' क्या बात है ? सब ठीक है ? मैंने पूछा । 
''हाँ क्यों ''?   
ऐसे ही पूछ रही थी, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही है । बीमार हो क्या'' ?  
'' हाँ कुछ दिन से बीमार हूँ ''। मरियल सी आवाज़ में उसका जवाब आया । 
'' वह लड़का अभी भी घूरता है क्या ''? उन्होंने मिलते ही उस लड़के की बात नहीं करी तो मेरा माथा ठनक गया । 
''इधर तो काफी दिनों से नहीं दिखा, सुना है उसने शादी कर ली है वह भी लव मैरिज । घरवालों ने निकाल दिया है उसे ,अब शायद दिल्ली चला गया है लड़की को लेकर''। अच्छा हुआ मेरा पल्ला छूटा । दुखी हो गयी थी मैं । अब टेंशन फ्री हूँ हा हा हा ''। 
वे हँस रही थीं लेकिन उनके चेहरे से मुस्कान गायब थी । अब फिरसे उनकी ज़िंदगी पुराने ढर्रे पर लौटने लगी है । वही उनकी विलक्षण बेटी , सास से रोज़ की तनातनी, पति से अनबन, मकान खरीदने की चिंता, बीमारियां, ऑफिस की उठापटक, अधिकारी की मनमानी, साथ वालों के षड्यंत्र इत्यादि - इत्यादि अनगिनत समस्याओं से घिरी वे फिर से ढूंढ रही हैं किसी परेशान करने वाले को ।    
   


बुधवार, 16 मई 2018

कुछ ख़ास नहीं करने वालों की जमात -----



पिछले दिनों उससे एक शादी में मुलाक़ात हुई । उसने मुझे पहचान लिया । मैं तो देखते ही पहचान गयी थी । आश्चर्य उसके द्वारा मुझे पहचान लेने में है । कॉलेज छोड़ने के पंद्रह साल बाद आपको साथ वालों के द्वारा पहचाना जाना मायने रखता है । कमर के आस - पास चर्बी का ढेर, चेहरा फूल की जगह फूला हुआ, मेकअप की अनगिनत पर्तों के बीच उम्र को छिपाने की नाकाम कोशिश और उंगली पकड़ कर खड़ा हुआ एक बच्चा जब आपके साथ हो ।  बच्चा, जो आँखें फाड़ - फाड़ कर कभी अपनी माँ तो कभी उन अंकल को देख रहा है । बच्चे को विश्वास ही नहीं हो रहा कि घर पर दिन -रात पापा से झगड़ने वाली मम्मी हँस - हँस कर किसी से बात भी कर सकती है । 
उसने मुझे पहचान लिया था । अब बात आगे बढ़नी थी । अगला सवाल जो कि प्रत्याशित था ,'' क्या कर रही हो आजकल ''?
मैंने जवाब दिया '' कुछ नहीं ''। 
''कुछ तो कर ही रही होगी । आजकल कोई औरत खाली नहीं बैठती ''। 
''कुछ नहीं सरकारी नौकरी कर रही हूँ और क्या ?''
मैंने सरकारी नौकरी को कुछ नहीं करने की श्रेणी में रखा । उसने भी घरेलू कार्यों को खाली बैठने की श्रेणी में रखा । 
''वाह ! '' सुनते ही उसने आँखें चौड़ी करीं और भवों को जितना ऊँचा तान सकता था तान लिया । 
अब पूछने की बारी मेरी थी । 
''और सुनाओ तुम क्या कर रहे हो ''? 
वह कुछ कहने ही वाला था कि उसका फोन बज उठा । उसने जेब से फोन निकाला और रिसीव करने में उतनी देर लगाई जितनी देर में मैं उसका विशाल स्क्रीन, मॉडल और कंपनी का नाम स्पष्ट देख सकूं । 
''कुछ ख़ास नहीं ''। उसका  जवाब आया । 
कुछ ख़ास तो करते ही होंगे तभी तो साठ हज़ार का फोन रखा हुआ है, मैं कहना चाहती थी पर कह नहीं पाई । 
'' फिर भी बताओ तो सही ''। 
'' बस ऐसे ही काम चल रहा है ''उसने जवाब टाल दिया । 
इतने में उसके पास एक नौजवान आया, '' साहब ! मैडम और बच्चे बाहर गाड़ी में इंतज़ार कर रहे हैं ''। 
'' यह मेरा कार्ड है, कभी मौका मिले तो बात करेंगे । अभी जल्दी में हूँ । लड़का और लड़की को हॉस्टल छोड़ने जा रहा हूँ । तुम अपना कार्ड दे दो ''। मैं खिसिया कर हंस दी । कार्ड और मैं ?  भला हो टीचरी का कि पर्स में रेजगारी हो न हो पेन व कागज़ हमेशा रहता है । उसी एक छोटे से पुर्ज़े पर अपना फोन नम्बर लिख कर दे दिया । 
'' बाय द वे, बच्चे कहाँ पढ़ते हैं ? स्कूल के नाम से उसके स्टेटस का पता चलने की पूरी - पूरी सम्भावना थी । 
''दून स्कूल में '' 
मेरी कल्पना में शहर में स्थित तीन चार दून स्कूलों के नाम आ रहे थे । 
'' कौन से वाले दून में ? आवास विकास वाले या रामपुर रोड वाले में ?''
''देहरादून वाले दून में, जहाँ प्रियंका गांधी के बच्चे पढ़ते हैं''।  
अब बारी मेरी थी कि मैं भवों को जहाँ तक हो सके चढ़ा लूँ और आँखों को जहाँ तक हो सके चौड़ा कर लूँ । मेरा मुंह बिना प्रयास किये गोल हो गया । सीटी बजाने की ट्रेनिंग न होने की वजह से बज नहीं पाई।  
वह अपनी गाड़ी के पास गया । गाड़ी वही थी जो पिछले ही हफ्ते टी.वी. के विज्ञापन में दिखाई दे रही थी । खासी महंगी गाड़ी थी । इतनी कि गौर से देखने में ही डर लग जाए कि कहीं खरोंच न आ जाए । 
उसने गाड़ी में बैठी अपनी पत्नी से मुझे मिलवाया । बीबी क्या थी समझो कि किसी अभिनेत्री ने लगातार फ्लॉप फ़िल्में देने के कारण शादी कर ली हो । 
'' कहाँ पोस्टिंग है आजकल ?'' उसका यह प्रश्न मुझे अपनी दुनिया वापिस खींच लाया ।   
मैंने जगह का नाम बताया । उसने दूरी पूछी । 
''१०० किमी के लगभग हो जाता है आना - जाना ''। 
''ओह माय गॉड! पहले क्यों नहीं बताया ? इतना ट्रैवल करती हो ? अभी मुझे एक एप्लिकेशन लिख कर दे दो । एक हफ्ते समय लगेगा । ट्रांसफर घर के पास हो जाएगा'''। वह ख़ासा चिंतित हो गया । 
उसके अफ़सोस ज़ाहिर करने से ऐसा लगा कि मेरे इतनी दूर रोज़ाना के आने - जाने से उसे बहुत दुःख पहुंचा हो । मुझे हांलाकि इतनी तकलीफ कभी नहीं होती है। बस के अंदर जाते ही मैं खुद को निद्रा देवी के हवाले कर देती हूँ फिर मेरा स्टेशन आने तक मुझे जगाने की सारी ज़िम्मेदारी कंडक्टर की होती है। 
मैंने फटाफट एप्लिकेशन दे दी । 'न जाने किस रूप में भगवान् मिल जाए' यह सोचकर मैं हमेशा अपने पर्स में एक एप्लिकेशन रखती थी ।
उसने अपनी गाड़ी बैक करी तब मैंने गाड़ी को और गौर से देखा । गाड़ी में एक नेम प्लेट लगी थी जिस पर '' अध्यक्ष'' लिखा था । नीचे छोटे - छोटे अक्षरों में एक ऐसी पार्टी का नाम लिखा था जो बस चुनाव के समय ही अस्तित्व में आती है । मैंने अनुमान लगाया कि इसी पार्टी का ख़ास काम होगा जो वह नहीं किया करता होगा । 
मुझे याद आने लगा कि वह कभी क्लास में नहीं गया लेकिन परीक्षा में हमेशा पास हो जाता था । सारे टीचर्स का काम भाग - भाग कर करता था । एडमिशन के लिए आई लड़कियों के फॉर्म उनसे जबरदस्ती लेकर खुद ही जमा करता था। शहर में हो रही हर किस्म की हड़ताल में उसका चेहरा अवश्य दिख जाता था । जलनिगम, विद्युत्, परिवहन से लेकर सफाई कर्मचारियों तक के धरने में बैठा हुआ मिलता था हम पढ़ने - लिखने वाले पहले तो डिग्रियों के पीछे लगे रहे । फिर नौकरी की तलाश में भटकते रहे । हज़ारों फॉर्म भरने के बाद नौकरी हासिल हुई । नौकरी मिली तो इतनी दूर कि आने - जाने में ही सारा समय निकल जाता है । बचा हुआ समय ऐसे शख्स की तलाश में निकल जाता है जो बिना रुपया खिलाए ट्रांसफर करवा सके ।  
आज उस कुछ ख़ास नहीं करने वाले के पास सब कुछ ख़ास है । ख़ास कार, ख़ास पत्नी, ख़ास स्कूल में पढ़ते बच्चे ख़ास इलाके में कोठी, ख़ास मोबाइल, ख़ास लोगों से सम्बन्ध ।   
इतना सब देख चुकने के बाद मेरे ज्ञान चक्षु पूर्णतः खुल चुके थे । मुझे भली प्रकार से समझ में आ गया कि यह समय ऐसे ही '' कुछ ख़ास नहीं करने वालों का है ''।    


शनिवार, 15 जुलाई 2017

टॉप टेन बरसात के गाने और सन्दर्भ सहित व्याख्या ---


पिछले कई सालों से, जी हाँ भाइयों और बहनों ! नंबर एक पायदान पर विराजमान जो गाना है, वो है ----''तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए ---''

गाना समर्पित है पति और पत्नी को | प्रस्तुत पंक्तिओं में पत्नी अपने पति को सम्बोधित करती हुई कहती है कि हे प्रियतम ! तुम्हारी नौकरी नौकरी चाहे लाखों की हो लेकिन मेरे लिए वह दो टके की भी नहीं है, अगर उस नौकरी से मैं सावन के महीने के दौरान लगने वाली सेल में बम्पर शॉपिंग न कर सकूं | जिस तरफ भी नज़र दौड़ाती हूँ सेल वाला बोर्ड टंगा हुआ पाती हूँ | हर शोरूम वाला मुझे हसरत भरी निगाह से देखता हुआ मालूम होता है | मेरी सारी सहेलियां इन दिनों बड़े - बड़े थैले लेकर बाज़ार से आती हैं, मेरे घर के आगे स्कूटी खड़ी करके ''पीं पीं करती हैं, मैं विवश होकर बाहर आती हूँ | मजबूरन उनकी शॉपिंग देखनी पड़ती है, दिल ही दिल में कुढ़न होती है लेकिन मुंह से '' बहुत सुन्दर ! वाओ ! कितना सस्ता और कितना बढ़िया ! कहती हूँ | दर्द भरे दिल से पत्नी, ''हाय हाय ये मजबूरी'' कहकर गाना पूर्ण करती है | 

पुराने से लेकर नए, सभी श्रोताओं ने जिस गाने को नंबर दो पर रखा है वह है भाइयों और बहनों ! -----''एक लड़की भीगी भागी सी, सोई रातों में जागी सी ---''

प्रस्तुत पंक्तियाँ एक नौजवान को ऑन द स्पॉट समर्पित हैं | इन पंक्तियों में नौजवान बता रहा है कि किस प्रकार से उसे घनघोर बारिश में एक लड़की मिली और उस लड़की ने मुस्कुराते हुए उसे देखा तो वह अति प्रसन्न हो गया और उसके दिल में सितार, गिटार जैसे यंत्र बजने लगे और पता नहीं कौन - कौन से फूल खिलने लगे | लड़की वैसे अमूमन किसी अजनबी को नहीं देखती है | लेकिन इस मौसम में वह मजबूर है क्योंकि उसे सड़क पार करवाने वाला कोई नहीं मिल रहा | सड़क में घुटनों तक पानी भरा हुआ है | लड़की लड़के से लिफ्ट लेती है और सड़क पार करने के बाद उतारते समय लड़के के हाथ में बीस का नोट यह कहकर रख देती है '' ये तो आपको लेने ही पड़ेंगे भैया '' | तबसे वह लड़का सदमे में है और सबसे यही पूछता फिर रहा है '' तुम ही कहो ये कोई बात है ?''

नंबर तीन पर जिस गाने को आप लोगों ने जगह बख्शी है, उसके बोल हैं , ''रिमझिम गिरे सावन, सुलग - सुलग जाए मन ---''

निम्न पंक्तियाँ बिजली विभाग के कर्मचारियों को समर्पित है | जबसे सरकार ने बिजली विभाग वालों के फोन नंबर सार्वजनिक किये हैं, और जिओ के सिम की बदौलत फोन करना मुफ्त हुआ है, जनता बिजली जाने के पांच मिनट के अंदर ही पचास - पचास कॉल करने लगी हैं | जनता खुद तो घर  अंदर बैठी - बैठी चाय - पकौड़ों का आनंद लेती है और उन्हें रात - बे रात कभी तार बदलने कभी ट्रांफॉर्मर बदलने तो कहीं पोल ठीक करने जाना पड़ता है | उनके कर्मचारी तुरंत मौके पर पहुंचकर तार बदलने पर मजबूर हैं | इस नाज़ुक मौके पर भी जनता उन्हें काम नहीं करने देती | चारों ओर से घेर कर खड़े हो जाते हैं और '' कितनी देर लगेगी ? ''कब तक ठीक हो जाएगा ''? ''रात तक तो ठीक हो ही जाएगी क्यों ''? का आलाप छेड़ते रहते हैं | बिजली वालों का मन इतना सुलग जाता है कि उनका मन करता है कि एक नंगा तार यहाँ खड़ी जनता को भी छुआ दे | 

अगली पायदान यानि कि चौथे नंबर पर जो गीत है, जी हाँ ! बिलकुल सही पहचाना, उस गाने के बोल हैं ------''बरसात में हमसे मिले तुम, सजन तुमसे मिले हम बरसात में ''

गाने की पंक्तियाँ समर्पित हैं ''बीन बजाते हुए सपेरे और उसके झोले में रहने वाली नागिन को | प्रस्तुत पंक्तियाँ बरसात के दौरान घर के अंदर घुस जाने वाले साँपों और उन्हें पकड़ने के लिए बुलाए गए संपेरों के आपसी संवाद पर आधारित हैं | संपेरा पहले दिन चुपके से रात के समय अपने झोले से अपनी पालतू नागिन को निकालता है फिर उसे गली में छोड़ देता है | दिन के समय सांप घर के लोगों को दिखता है | लोग उसी संपेरे को बुलाते हैं | वह आस - पास के इलाकों में साँप पकड़ने के लिए काफी प्रसिद्द है | वह अपनी प्यारी नागिन को ढूंढता है, पकड़ता है और फीस के रूप में २००० रुपया लेता है | वह यह बताना नहीं भूलता कि ''बहुत ही खतरनाक सांप है | इसका काटा पानी नहीं मांगता'' |  लोग सहम जाते हैं | अगले दिन दूसरे मुहल्ले में उसी सांप को छोड़ता है और वहां से भी उतना ही पैसा लेता है | बरसात के मौसम में वह और उसकी पालतू नागिन यह ड्युएट गाते पाए जाते हैं | | 

और भाइयों और बहिनों ! दिल थाम कर सुनिए | पांचवी पायदान पर कोई फ़िल्मी गाना नहीं है, बल्कि वह ग़ज़ल है, जिसे गाया है पंकज नाम के उदास आदमी ने --''आइये बारिशों का मौसम है इन दिनों चाहतों का मौसम है  ---''

उपरोक्त ग़ज़ल के बोल समर्पित हैं उस पत्नी को जो अपने पति से कह रही है, ''आइये और कपड़ों को छत में डाल कर आइये'' | पत्नी इन दिनों पति को आम दिनों की अपेक्षा अतिरिक्त मात्रा में चाह रही है और उसे धूप निकलते ही छत पर कपडे ले जाकर सुखाने के लिए कह रही है | बादलों के आते ही कपड़े उठाना फिर दोबारा धूप के आते ही छत की ओर दौड़ना, पति इस कवायद में थक चुका है | जैसे ही वह छत कपडे डाल कर आता है, बादल न जाने कहाँ से आ जाते हैं | जैसे ही वह कपड़ों को नीचे कमरे केअंदर बँधी हुई रस्सी में फैलाता है, सूरज उसे खिजाने के लिए पूरी ताकत से चमकने लगता है | पत्नी के लिए बरसात का दिन वह कसौटी हैं जिस पर वह अपने पति के प्यार को कस सकती है | 

अगली पायदान यानि की छठे स्थान पर जिस गाने ने अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है वह है , ''सावन का महीना पवन करे शोर -------''

प्रस्तुत पंक्तियाँ एक चाय - पकौड़ा प्रेमी,  जिसका नाम पवन है, के पकौड़ा प्रेम को समर्पित है | सावन का महीना आते ही पवन हर घंटे में चाय - चाय चिल्लाता है और पत्नी से कभी आलू, कभी गोभी, कभी प्याज की पकौड़ियाँ बनाने को कहता है | पत्नी उसके चाय - पकौड़ों की डिमांड से त्रस्त हो गई है | उसका मन वन में जाने को करता है | वह नाचना चाहती है बारिश में मोर की तरह, लेकिन पवन, पकौड़ों के लिए इतना शोर करता है कि वह तंग आ गयी है | पत्नी अपने आप से कहती है कि कितनी भाग्यशाली हैं वे औरतें जिनके बलम बिदेश रहते हैं और एक वह है जिसका पकौड़ियों के आगे कोई जोर नहीं चल पाता है | 

दिल थाम कर सुनिए सातवीं पायदान पर जो गाना है उसे सुनकर किसी के भी होश उड़ सकते हैं | गाना है --''बादल यूँ गरजता है डर कुछ ऐसा लगता है ----''

ये डरावनी पंक्तियाँ समर्पित हैं पप्पू नामक बालक को | रात को चमकने वाली बिजली और माँ की चीख '' बेटा सारे घर के स्विच बंद कर दो फटाफट'' | ''सारे प्लग निकाल दो'' | ''बाहर जाकर मेन स्विच ऑफ करना मत भूलना '' ''बरामदे से चटाई उठा लेना ''| ''साइकिल को किनारे कर देना '' | पप्पू को गहरी नींद से उठने पर गुस्सा भी आता है और बिजली का कड़कना सुनकर डर भी लगता है और अँधेरे से सबसे ज़्यादा डर लगता है | पप्पू के पापा कच्ची पीकर जो सोते हैं तो फिर सुबह पत्नी की डाँट की आवाज़ से ही उठते हैं | पप्पू की माँ दुनिया में सबसे ज़्यादा करंट से डरती है और यह काम बेचारे पप्पू को करना पड़ता है | सारी बरसात वह आधा सोया और आधा जागा हुआ रहता है | 

गाना नंबर आठ जो है, भाइयों और बहिनों, वह जुड़ा हुआ है किसी की मीठी - मीठी यादों से | जी हाँ ! सही पहचाना | गाने के बोल हैं --''ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात'' 

ये रूमानी क्तियाँ समर्पित हैं कुमारी वर्षा को | रात के आठ बजे थे और कुमारी वर्षा ने ऐसे ही एक भीषण बरसात वाले दिन एक दूकान के नीचे शरण ले रखी थी | वर्षा बार - बार दुकानदार को परेशान नज़रों से देखती, फिर अपनी घडी देखती | दुकानदार को वर्षा पर तरस आ गया और उसने वर्षा को अपनी सबसे प्रिय वस्तु, अपनी शादी की छाता दे दी | वर्षा कुमारी ने आँखों में कृतज्ञता भरते हुए बार - बार धन्यवाद दिया और यह वादा किया कि कल सुबह सबसे पहले वह उनकी छाता वापिस करने आएगी | उस दिन के बाद कितने ही सावन - भादों आए और चले गए लेकिन न छाता दिखा न वर्षा कुमारी | शादी की छाता ऐसे ही किसी लड़की को पकड़ा देने पर हर साल पहली फुहार पड़ते ही पत्नी के तानों की फुहार भी उन्हें झेलनी पड़ती है | 

और नवीं पायदान पर जो गाना है वह है, बहनों और भाइयों --''बरसो रे मेघा - मेघा बरसो रे मेघा | कोसा है, कोसा है,  बारिश का बोसा है ----''

ये खूबसूरत पंक्तियाँ समर्पित हैं सड़क बनाने वाले ठेकेदार के श्री चरणों में | इन पंक्तियों में वह बादलों से से बरसने का अनुरोध कर रहा है | वह मनुहार कर रहा है  कि भले ही मैंने तुझे देर से आने के कारण कोसा हो लेकिन तू दिल पर मत ले | तू बस सड़कों पर बोसे बरसाती रहना | तेरे बोसो से ही सड़कों पर बड़े - बड़े गड्ढे पड़ते हैं, जिनसे मेरी ज़िंदगी आसानी से चलती रहती है | ठेकेदार की इच्छा है कि मेघ साल भर बरसते रहें और वह ऐसे ही सड़कें बनाता रहे | जनता उसे कोसती रहती है और शिकायत करती है कि ''क्या ठेकेदार साहब ! कैसी सड़क बनाई कि एक बरसात भी नहीं झेल पाई ''| ठेकेदार साहब लोगों के कोसने को खाने के बाद कुछ मीठे की तलब की तरह लेते हैं | 

और अब टॉप टेन समाप्ति की ओर है | जी हाँ ! अंतिम पायदान पर जो गाना है भाइयों और बहिनों ! उसके लिए दिल को थाम लीजिए | बड़ा ही मस्त गाना है | बिलकुल सही पहचाना -- ''टिप टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई ----''

निम्न पंक्तियाँ नई बस्ती में रहने वाले बाबू राम के गले से कल रात निकलीं सो गाना उसे ही समर्पित है | बरसात में उसके कमरे में पानी भर गया है और करंट दौड़ने का खतरा हो गया है | कल ही उसके पड़ोस में रहने वाले जीवन की पानी में बहते करंट से मौत हो गयी है | जीवन के छोटे - छोटे चार बच्चे अनाथ और बीबी विधवा हो गयी है | उसकी बस्ती के लिए बरसात, न सावन है, न रिमझिम के गीत हैं और न ही छई छप्पा छई है | पानी उसके लिए और उस जैसे हज़ारों लोगों के लिए हर साल आग का रूप लेकर आती है | 

तो बहनों और भाइयों ! टॉप टेन गानों के बारे में अपनी राय देना मत भूलिएगा | 

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

ज़िंदगी भर नहीं भूलेंगे वो बरसात के दिन |

बरसात का मज़ा बच्चों से ज़्यादा कौन उठा सकता है भला ? साल भर स्कूल न आने वाले बच्चे बरसात में स्कूल अवश्य आते हैं | उनके स्कूल आने से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वे पढ़ने के लिए आए हैं | वे आए हैं बारिश में भीगने के लिए | वे आए हैं एक दुसरे को भिगाने के लिए, बारिश में धक्का देने, एक दूसरे पर गिर पड़ने के लिए | वे आए हैं नंगे पैर पानी में छप - छप करने | दौड़ने, भागने और फिसलने के लिए | 

''भीगो मत, बीमार पड़ जाओगे '' ऐसा कहना फ़िज़ूल होता है, क्योंकि वे चाहते हैं भीग कर बीमार पड़ना | 
''दौड़ो मत, गिर जाओगे '' ऐसा कहना भी व्यर्थ होता है,  क्योंकि वे चाहते हैं गिरें और कीचड़ में लथपथ हो जाएं | 

बच्चों के लिए ये ऐसे बरसाती जुमले होते हैं, जिन्हें वे एक कान से भी नहीं सुनते हैं | 

भीगना यहाँ भी है भीगना वहां भी है | टपकती हुई छतों के नीचे बैठकर भीगने और बाहर बारिश में भीगने,  इन दोनों में से बच्चे बाहर भीगने का चुनाव करते हैं |  

ऐसे मौसम में बच्चों की कोशिश होती है कि अध्यापक स्कूल न आने पाएं | आएं भी तो कक्षा के अंदर ना आएं | कक्षा के अंदर आएं भी तो उन्हें ना बुलाएं | उन्हें बुलाएं भी तो पढ़ने के लिए न कहें | पढ़ने के लिए कहें भी तो कोर्स का न कहें | अंताक्षरी, नाच, गाना, चुटकुला, कविता, कहानी कुछ भी चलेगा | 

इन दसेक सालों में बच्चे कमोबेश अभी भी वैसे ही हैं | बरसात भी वैसी ही है | कुछ बदला है तो वे दो नदियां जिन पर पुल बन चुके हैं | 

मेरे पास बरसात के मौसम से जुडी जो यादें हैं, उनमे सबसे ज़्यादा यादें इन दो नदियों और दो ही भयंकर नालों की है | नौकरी के शुरुआत में ही लोगों ने डरा रखा था '' बाप रे ! उधर तो दो - दो नाले आते हैं | बरसात के मौसम में तो बड़ी मुश्किल होगी | दो नदियां भी रास्ते में पड़ती हैं | चार महीने बड़ी मुसीबत रहेगी | उधर ही रुकना पडेगा ''| 

लोग दो नदियों और दो नालों को पार करके लोग अपने गंतव्य तक पहुँचते थे | नदियों के नाम भी सामान्य न होकर के ''भाखड़ा, '' दाबका '' जैसे थे | नाम सुनते ही लगता था कि ये तो बाढ़ आने के लिए ही बनी होंगी | इसके उलट ''गंगा', 'यमुना' नाम का नाम लेते ही ऐसा लगता है जैसे कि ये नदियां प्यास बुझाने के लिए ही बनी हैं , बाढ़ से इनका दूर - दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता होगा |  

नाले तो अभी भी वैसे के वैसे हैं | तब नालों के नाम भी खासे खतरनाक मालूम होते थे 'कर्कट नाला 'और ''मेथी शाह नाला ''| 

पुराने लोग बताते थे कि इन दो नदियों को बरसात के दिनों में खतरनाक बनाने के लिए उस इलाके का एक बहुत बड़ा गिरोह है | यह गिरोह बारिश होते ही नदी से थोड़ी दूर पर जाकर मिट्टी को एक जगह पर जमा कर देते थे जिससे नदी का बहाव सीमित हो जाता था और वह कॉज़वे तक आते - आते भयानक लगने लगती थी | आस - पास के कुछ लोग जो रात के समय इस पुनीत कार्य को अंजाम देते थे, सुबह अपने - अपने ट्रैक्टर - ट्रौलिओं के साथ बाढ़ वाले स्थल पर मौजूद रहते थे | पार जाने वालों से अच्छा - ख़ासा शुल्क लेकर उनकी गाड़ियों को ट्रॉलियों के ऊपर रखकर पार कराते थे | बरसात के मौसम में रोज़गार कैसे पैदा किया जाता है, इस कला में वे माहिर थे | ये उनका स्टार्ट अप प्रोग्राम था, जो बरसात में स्टार्ट होता था और फंसे हुए यात्रिओं को अप कराता था | वर्तमान में दोनों नदियों पर पुल बन जाने के कारण इस स्टार्ट अप पर ग्रहण लग चुका है | 

इनके साथ - साथ कुछ साहसी लड़के भी याद आते हैं जो उफनती हुई नदी के दोनों तरफ खड़े रहते थे | नदी का पानी कभी कम हो जाता था तो कभी बहुत तेज | इतना तेज कि बस तक बह जाए | वे तमाशा देखते थे | ताली बजाते थे  | जब कोई दुःसाहसी इस नदी को पार करने की कोशिश करता था, वे उसका उत्साह बढ़ाते थे | सीटी बजाते थे और जब कोई नदी को पार करने में सफल हो जाता था, तो हिप - हिप हुर्रे कहते थे | जब कोई नदी पार नहीं कर पाता और रास्ते में डूबने लग जाता था,  तो वे दौड़ पड़ते थे उसे बचाने के लिए | फिर ये अपनी जान की भी परवाह नहीं करते थे | उफनते हुए रौद्र रूप धारण की हुई नदी  के बीचों - बीच अंगद की तरह पाँव जमा कर खड़े हो जाते थे और उस डूबते हुए को '' हईशा .... हईशा ' कहकर पार करा लेते थे  | 

नदी के पानी को देखकर जिनका कलेजा मुंह को आ जाता था, उनका हौसला बढ़ाते थे | उनकी गाड़ियों को स्वयं चला कर मय गाड़ी नदी पार करवा देते थे  | वे दिखाना चाहते थे कि नदी पार करना उनके बाएं हाथ का खेल है | वे बिना तमगे के हीरो थे | बिना अभिनय किये नायक थे | बरसात में इनको देखना आठवें आश्चर्य को देखना होता था | आम दिनों में जो गुंडागर्दी, हल्ला - गुल्ला मार -पिटाई हंगामा करते हुए पाए जाते थे , बरसात के दिनों में उनका रूप ही बदल जाता था |

कोई पेड़ बहकर आ जाए या मोटे लट्ठे बीच नदी में आकर अटक जाएं तो ये बाँकुरे भीड़ को चीर कर, बड़े - बड़े डग भरकर, उस लट्ठे को किनारे लगा आते थे या पेड़ को आरी से मिनटों में चीर डालते थे | जनता तब साँसे रोके हुए सारा दृश्य देखती रहती थी | 

भीड़ में से कुछ लोग चाहते थे कि वे अपनी जान जोखिम में न डालें | ज़्यादातर चाहते थे कि वे जाएं और उनके लिए रास्ता खोलें | वे किनारे से ''शाबास, शाबास'' चिल्लाते थे | 

जाने अब कहाँ होंगे कैसे होंगे क्या करते होंगे ये बिना नाम के बरसाती नायक ? पुल बनने के बाद ये शायद फिर से अपने पुराने गुंडागर्दी और आवारागर्दी के कार्यक्रम में लौट गए होंगे | 

उन दिनों नदी और नाले के इस पार खड़े - खड़े कई पुराने दोस्त मिल जाया करते थे | बिछुड़े हुए दोस्तों को मिलाने में इन दोनों का अभूतपूर्व योगदान हुआ करता था | नई नियुक्ति वालों से भेंट होती थी | वहीं पर खड़े- खड़े, पानी के कम होने का इंतज़ार करते हुए आपस में कई तरह की चर्चाएं हो जाया करती थीं , मसलन ''कौन से स्कूल में हो ''?'' कब से हो'' ? ''आजकल ट्रांसफर का क्या रेट चल रहा है'' ? ''कौन कितना देकर किस स्कूल में आया है'' ? ''कौन रिटायर होने वाला है'' ? ''किसका प्रमोशन होने वाला है'' ? इत्यादि इत्यादि | अपनी - अपनी गोटियाँ फिट करने के जुगाड़ सोचे जाते थे | 

उन दिनों मुलाक़ात के लिए फिर से अगली बरसात का इंतज़ार करना होता था |  

चाय की केतली पकडे हुए दो - तीन स्थानीय बच्चे नाले के आस - पास घूमते रहते थे | पानी तो पता नहीं कब उतरेगा , सोचकर चाय पीते - पिलाते हुए, लाया हुआ नाश्ता खाते हुए , ट्रांसफर का जुगाड़ ढूँढा जाता था | 

अपने - अपने स्कूलों और दफ्तरों के साहबों को फोन खटकाए जाते थे | उन्हें पानी की स्थिति से अवगत कराया जाता था | वे तुरंत बिना प्रतिवाद किये अवगत हो भी जाते थे | किसी तरह से दो - तीन घंटे देरी से ही सही, स्कूल पहुँच जाते थे तो साहब लोग बिना कुछ कहे साइन करवाने रजिस्टर भेज देते थे | ''हम क्या करें बाढ़ आई थी तो',' ''ये आपकी समस्या है '',''नौकरी नहीं कर सकते तो छोड़ दो '' जैसे जुमले किसी साहब ने नहीं कहे | 

बालिका स्कूलों की शिक्षिकाएं सबसे ज़्यादा कांपती थीं | उफनते नाले से भी ज़्यादा खतरनाक वे 'प्रधानाचार्या' नामक प्राणी को मानती थीं | कुछेक तो डर के मारे विकराल रूप धरे हुए नाले को पार करने के बारे में गंभीरता से विचार करने लगतीं थीं | नाले के पास खड़े कई लोगों की तरफ आशा से भरी नज़रें दौडातीं लेकिन कोई भी उस नाले में गाड़ी डालने की हिम्मत नहीं करता | वे दुखी हो जातीं | फिर एक सीनियर अध्यापिका, ''क्या कर लेगी प्रिंसिपल ज़्यादा से ज़्यादा ? कैज़ुअल लगा देगी,  फांसी पर थोड़े ही लटका देगी '' कहकर सांत्वना बंधाती थी | अपने बैग से एक सफ़ेद कागज़ निकालती और उपस्थित स्टाफ के हस्ताक्षर उस कागज़ में ले कर रख लेती कि अगले दिन प्रधानाचार्या को सौंप देंगे और बाढ़ की विकराल स्थिति से अवगत करा देगी | आगे जैसी उसकी मर्ज़ी होगी, कैज़ुअल लगाए या साइन करवाए | 

अक्सर चौदह में से छह कैज़ुअल ये नदी - नाले अपने साथ बहा ले जाते थे | 

अब समय बहुत बदल गया है 
नदियों के ऊपर पुल हैं | 
स्कूलों, कार्यालयों में बायोमेट्रिक है | 
साहबों में साहबगिरी है | 
नौजवान अभी भी हैं लेकिन जान बचाने के लिए नहीं बल्कि बहते हुए की सेल्फी लेने के लिए हैं | 
रेन है लेकिन रेनी डे नहीं है | 
नाले हैं लेकिन पार कराने वाले नहीं हैं | 

कुल मिलाकर बाढ़ भी है, बरसात भी है, बस साथ देने वाले नहीं है | 


सोमवार, 3 जुलाई 2017

व्यंग्य की जुगलबंदी#34 टेलीफोन

बहुत परेशानी है | समाधान नहीं मिलता | हर कम्पनी बात करवाने के लिए बैचैन है | कोई कह रहा है पचास पैसे में देश भर के अंदर कहीं भी बातें करिए | कोई पच्चीस पैसे का लुभावना ऑफर दे रहा है कोई दस पैसे का लालच दिखा रहा है | भले ही पचास पैसे, पच्चीस पैसे या दस पैसे किसी के पास नहीं होंगे लेकिन बन्दा फिर भी खुश है कि वाह ! दस पैसे में बात करने को मिलेगी | और तो और मुफ्त बातें करने का बेशकीमती खज़ाना तक हमारे सामने कंपनियों ने खोल कर रख दिया गया है | इतना सस्ता ज़माना है कि मुद्रा बाज़ार से गायब है लेकिन विज्ञापन में धड़ल्ले से चल रही है | 

खुश होने वाले खुश हैं | बहुत खुश हैं | उनके पास अनलिमिटेड बातें हैं | उनके पास अनलिमिटेड दोस्त हैं | वे अपने अनलिमिटेड दोस्तों से अनलिमिटेड बातें करेंगे इसीलिए कम्पनियाँ इतने सस्ते लुभावने ऑफर लुटा रही हैं | 

मेरी समस्या यह है कि बात करने की इतनी खुलेआम लूट के बावजूद मैं हूँ कि खुश नहीं हो पा रही हूँ | कैसे खुश होऊं ? खुश होने के क्या उपाय अपनाऊँ ? जब अनलिमिटेड बातें करने के दिन थे, तब मोबाइल तो क्या लैंडलाइन का भी नाम नहीं सुना था | तब मित्रों से अनलिमिटेड बात करने के लिए स्कूल -कॉलेज जाना पड़ता था | पढ़ाई जैसी फ़ालतू चीज़ भी साथ में हो जाया करती थी, जिसमे हमारी कोई गलती नहीं होती थी | ऐसे ही साल भर बात करते - करते पास भी हो जाया करते थे | अब तो यह टीचर्स की मेहरबानी लगती है कि हो न हो वे भी इसी ऑफर के तहत हमें पास करते रहे होंगे कि स्कूल आने के साथ - साथ पास होना फ्री मिलेगा | हमारे समय में कक्षाएं भी भरी रहती थीं | आजकल कक्षाएं खाली रहती हैं क्योंकि बात करने के लिए स्कूल - कॉलेज जाने के स्थान पर सबके हाथ में मोबाइल आ गया है | अब गप्पें मारने के लिए स्कूल जाने की ज़रुरत नहीं है | घर बैठे - बैठे बातें हैं |अनलिमिटेड बातें हैं | 

कहते हैं कि मोबाइल और समय का कभी मेल नहीं होता | अब समय है, मोबाइल भी है,अनलिमिटेड वाउचर भी है, लेकिन कोई बातें करने वाला नहीं है | ये कम्पनियाँ बात करने वाला भी फ्री क्यों नहीं बांटती ?

हमारा क्या था ?  एक आम लड़की का जीवन,  जिसे आजकल के बच्चे जीवन मानने को ही तैयार नहीं होते | हमारी पढ़ाई पूरी हुई | माँ - बाप ने शादी तय करी | लैंडलाइन भी अब तक घर में आ गया था, लेकिन शादी से पहले बातें करना अच्छा नहीं माना जाता था | इस अवधि में आस - पास वालों ने सब जगह हमारे लैंडलाइन का नंबर बाँट दिया था | आधा समय लोगों को बुलाने में और आवाज़ लगाने में ही निकल जाता था | कुछ समय बाद ''फलाने को बुला दो '' सुनते ही फोन काटना और रिसीवर रखकर आवाज़ लगाना भूल जाने जैसी हरकतें सीख लीं था | परिणाम यह हुआ कि साल भर के अंदर ज़्यादातर लोगों के हाथ में मोबाइल दिखने लगा | आश्चर्य की बात है कि बहुत कम लोगों ने घर में लैंडलाइन लगवाया | 

तय समय पर शादी हुई | शादी के बाद सोचा कि हाथ में मोबाइल है, समय भी है, अनलिमिटेड प्लान भी है तो क्यों न पति से उनके ऑफिस में बात कर ली जाए | शादी से पहले बातें करने का मौक़ा नहीं मिल पाया था सो उसकी कसर अब पूरी कर ली जाए,  ऐसे ही सोच कर फोन लगाया तो जवाब आया, ''क्या बात है ? जल्दी कहो | बहुत काम पड़ा हुआ है ''| नहीं कहा मैंने कि अनलिमिटेड टॉक टाइम है ज़रा बातें कर लो | उन्होंने झल्ला कर फोन काट दिया | घर आकर अनलिमिटेड लताड़ अलग लगाई ,''खबरदार ! जो कभी फ़ालतू में फोन किया | ऑफिस वाले मज़ाक उड़ाते हैं | इतना ही बोलने का शौक है तो दीवारों से बातें करो | शीशे के आगे बोल लिया करो''|

इस ग्रह में जीवन की सम्भावना की तलाश फ़िज़ूल देखकर मैंने दूसरे ग्रह में जीवन तलाशने की सोची,  सोचा बच्चे बड़े होंगे तब जी भर के बातें करने का अधूरा ख़्वाब पूरा करूंगी | बच्चों से अनलिमिटेड बातें करने में कम से कम डाँट खाने का खतरा तो नहीं होगा |  

दिल में मौजूद इस ख्वाहिश को पूरा करने का मौका आखिरकार आ ही गया | बेटी बाहर पढ़ने के लिए चली गयी | उसके जाने के एक दिन बाद ही उसे फोन मिलाया तो वह झल्ला कर बोलती है, ''क्या अम्मा ! अभी - अभी क्लास छूटी है | अब कोचिंग जा रही हूँ | तुम पुराने ज़माने की माँओ की तरह हर समय शक करती हो''| मैं ज़ाहिर सी बात है कि अपना सा मुंह लेकर रह गयी | 

अब कौन रह गया जिससे अनलिमिटेड बात की जा सकती है? मैंने मन ही मन अपनी पुरानी दोस्तों को याद किया | पुरानी दोस्तें अब गए जमाने की बातें हो चुकी हैं | पते खो गए | नंबर भी खो गए हैं | बहुत मुश्किल से एक नंबर मिला | मैंने उत्साह से भरकर फोन लगाया तो उसने पहले तो पहचाना ही नहीं | काफी याद दिलाने के बाद उसने जो बात करी तो मैंने स्वयं ही फोन काट दिया | उसने कहा, '' अच्छा ! तुम्हारी आवाज़ तो बहुत बदल गयी है | आज क्या काम है जो मेरी याद आ गयी | कॉलेज के ज़माने में तुम अपने नोट्स किसी को नहीं दिखाती थी | याद आया कुछ ? और तुमने मेरी किसी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया जो मैंने तुम्हें कॉलेज छूटने के बाद लिखीं थीं | आज ज़रूर किसी काम से फोन कर रही होगी, है ना ''?

मैं उससे अनलिमिटेड बातें करने का सपना देख रही थी और वह मुझे अनलिमिटेड आइना दिखाने की ठाने हुई थी | 

काफी चिंतन के बाद यह निष्कर्ष निकल कर आया कि एक आम औरत की ज़िंदगी ऐसी ही होती है, अनलिमिटेड के दौर में लिमिटेड सम्बन्ध और लिमिटेड बातें | इससे तो अच्छी आधुनिक हिंदी कहानी की नायिका की ज़िंदगी होती है जिसमें अवैध सम्बन्ध होते हैं, उनसे चैट होती है, बातें होती हैं | इधर कुछ समय से मैंने जब भी किसी साहित्यिक पत्रिका को उठाया, उनमे छपी कहानियों में इस बात को महसूस किया कि सिर्फ यही नायिकाएं अनलिमिटेड बातें कर सकतीं है क्योकि इनके अनलिमिटेड सम्बन्ध होते हैं | 


शनिवार, 1 जुलाई 2017

फैशन बना रखा है | #हिन्दी_ब्लॉगिंग

जनता महंगाई से त्रस्त हो गयी है वैसे जनता को आदत होती है किसी न किसी प्रकार से त्रस्त रहने की | जीने के लिए त्रस्त रहना बहुत ज़रूरी होता है वरना पता नहीं चल पाता कि ज़िंदगी कट भी रही है या नहीं | 
बहुत दिनों बाद मुद्दा मिला है वरना बिजली पानी जैसी निम्न स्तरीय समस्याओं से आखिर कब तक त्रस्त रहा जा सकता है | 

जनता राजा के पास फ़रियाद लेकर गयी है, '' सरकार ! महंगाई बहुत बढ़ गयी है | दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पा रही है | जीना मुश्किल हो गया है | क़र्ज़ पर क़र्ज़ चढ़ता जा रहा है | बैंक वाले जीना हराम किये दे रहे हैं | आत्महत्या के अलावा कुछ नहीं सूझता ''| 

''क्या कहते हो ? कभी कहते हो सब्जी महंगी हो गयी कभी कहते हो दाल महंगी हो गयी | आज कह रहे हो रोटी महंगी हो गयी है | तुम लोग एक बात पर क्यों नहीं टिके रह सकते हो ? हम लोगों की तरह आए दिन बयान बदलते रहते हो | मेरी गद्दी हथियाना चाहते हो क्या ? और ये आत्महत्या की बात क्यों कर रहे हो मेरे सामने ? फैशन बना रखा है आत्महत्या को ? अरे संघर्ष करो संघर्ष | कायर आदमी ही मरने की सोचते हैं | काम से जी चुराते हो और मरने की बात करते हो ''| 

भूखी जनता दौड़ रही है | धरना प्रदर्शन कर रही है | जो नहीं कर रहे वे सल्फास खा रहे हैं और इस नश्वर और पापी शरीर से मुक्त हो रहे हैं | 

''सरकार भूखे हैं'', कहीं से फिर धीमी सी आवाज़ आती है | 

''क्या कहते हो ? भूखे हैं ? सारा देश सातवें वेतनमान की फसल काट रहा है | नए - नए फ़ूड स्टोर खुल रहे हैं | चारों तरफ पैसा ही पैसा बरस रहा है | लोग चाट - पकौड़ी के ठेलों पर टूटे पड़े रहते हैं | हर गली हर मोहल्ले में ढाबे खुले हुए हैं | लोग खाए जा रहे हैं, खाए जा रहे हैं | शाम होते ही सड़कें चटोरों से भरी दिखती हैं | बिग बाजार और हर मोहल्ले में एक न एक मॉल खुला हुआ है | खाने की सामग्री ठुंसी पडी हुई है | मोटापे से त्रस्त लोगों के लिए दवाइयाँ, जड़ी - बूटियां, और नाना प्रकार के यंत्र रोज़ लॉन्च हो रहे हैं | तुम कह रहे हो भूखे हैं | कौन विशवास करेगा इस बकवास का'' ?

''सरकार ! हम किसान हैं | मजदूर हैं | उस तरफ जाने की सारी गलियां हमारे लिए बंद हैं'' | 

''कमाल की बात करते हो ! अरे किसान हो तो अनाज उगाओ | मजदूर हो तो मेहनत करो हमारी तरह | अच्छा अब हमारे जाने का समय हो गया है | सेक्रेटरी ! अब हमें कहाँ जाना है''?

''हुज़ूर ! आज आपको दस बजे कनॉट प्लेस में थाई फ़ूड रेस्टॉरेंट का फीता काटने जाना है | ग्यारह बजे सदर में मेकडॉनल्ड का उद्घाटन करना है | दो बजे गुरुग्राम में राजस्थानी फ़ूड कोर्ट की नींव रखनी है ''| 

''जल्दी चलो ड्रायवर ! समय कम है | काम बहुत ज़्यादा है'' | 

सोमवार, 26 जून 2017

ईद मुबारक मुल्ला जी !


वह मुल्ला है | नाम पूछने की कभी ज़रुरत नहीं पडी | मुसलमान है | दाढ़ी रखता है जो अब लगभग सफ़ेद हो चुकी है | सफ़ेद टोपी पहिनता है | राम किशोर और उनके घर के सभी लोग उसे मुल्ला कहकर ही बुलाते हैं | उम्र होगी करीब पचास या पचपन लेकिन उसकी सूरत इतनी ज़्यादा पक गयी है कि वे सत्तर से भी ज़्यादा लगता है | 

आँखें लाल, रंग धूप में साइकिल चलाने के कारण झुलस गया है | दुबला - पतला शरीर | एक पुरानी साइकिल जिस पर दोनों तरफ उसने कबाड़ रखने के लिए बोरे लटकाए हुए हैं | 

राम किशोर को घरेलू कबाड़ बेचने के लिए सिर्फ मुल्ला पर ही भरोसा था | घर में चाहे कबाड़ का ढेर लग जाए, अखबार के चट्टे लग जाएं , मज़ाल है राम किशोर किसी और कबाड़ी को हाथ भी लगाने दें | दिन भर में कई कबाड़ वाले साइकिल और ठेला लेकर आते थे,गेट के ऊपर से झांककर, ललचाई निगाह से आम के पेड़ के नीचे रखे खाली डिब्बे, बोतलें, टीन, टूटे - फूटे अन्य कबाड़ की सामग्रियों को ललचाई निगाह से देखते | उनमें से कई दुस्साहसी राम किशोर से पूछ भी लेते, 

''बाबूजी ! अब तो बेच दीजिये कबाड़ | एक महीने से रखा हुआ देख रहे हैं | किसके लिए संभाल रखा है'' ?

राम किशोर चिढ़ कर जवाब देते, ''इससे तुम्हारा क्या मतलब ? तुम आगे जाओ हमें नहीं बेचना कबाड़'' | 

''ठीक लगा दूंगा साहब, हमें ही दे दो ''| 

राम किशोर गुस्से से गेट बंद कर देते | कबाड़ी भुनभुनाता हुआ चला जाता | 

राम किशोर की पत्नी घर के सामने पेड़ के नीचे रखे हुए कबाड़ को देखती और कभी - कभी बहुत नाराज़ हो जाती,

''क्या हो जाएगा अगर कोई और कबाड़ी ले जाएगा तो ? महीनो - महीनो तक मुंह नहीं दिखाता आपका मुल्ला | क्या लगता है आपका वह ? कबाड़ ही तो है कोई भी कबाड़ी ले जाए | पता नहीं क्या लाल लगे हैं उस मुल्ला में ? घर में मेहमान आते हैं, अड़ोस - पड़ोस वाले आते हैं, अच्छा लगता है क्या मुंह सामने कबाड़ ''?

राम किशोर एक कान से सुनते हैं दूसरे से निकाल देते हैं | उन्हें आदत पड़ चुकी है | घर में हर तीसरे दिन यही मुल्ला पुराण छिड़ जाता है | 

फिर एक दिन राम किशोर का इंतज़ार ख़त्म होता है | मुल्ला की आवाज़ को वे दूर से ही पहचानते हैं | मुल्ला आता है, साइकिल रोकता है गेट पर खड़े होकर पूछता है, '' बाबूजी कबाड़ है''?

राम किशोर खुश हो जाते हैं, '' हाँ ! हाँ ! बहुत सारा जमा है''| 

राम किशोर जो खुद अस्सी पार कर चुके हैं, दौड़ - दौड़ कर अंदर जाते हैं | दोनों हाथों में भर - भर कर अख़बार और पत्रिकाओं की रद्दी को बाहर लाते हैं | कई महीनों की रद्दी लाने के लिए उन्हें कई चक्कर लगाने पड़ते हैं लेकिन वे इस कवायद में ज़रा भी नहीं थकते |
 
इस दौरान मुल्ला पेड़ के नीचे जमा किये कबाड़ का मुआयना करता, डिब्बों को पिचकाता, गत्तों को मोड़ता और अपने पास रखते जाता | 

राम किशोर के सामने तराजू रखकर मुल्ला रद्दी और कबाड़ को तोलता जाता और बताता जाता कि फलानी चीज इतने की और फलानी चीज़ उतने की लगी | 

राम किशोर गाल पर हाथ धर कर ध्यान से सुनते रहते हैं और फिर मुल्ला अपने कुर्ते की जेब से नोटों का एक बण्डल निकालता और उसमे से कुछ नोट राम किशोर के हाथ में दे देता है | राम किशोर चुपचाप उन नोटों को अपनी जेब के हवाले कर देते | 

''अच्छा बाबूजी ! सलाम !'' मुल्ला कबाड़ समेटकर अपने बोरे में भरकर चल देता किसी दूसरे मोहल्ले की तरफ | 

राम किशोर का एक बेटा है | एक बेटी है | दोनों पढ़े लिखे हैं | दोनों सरकारी नौकरी में हैं | 

बेटा, बाप की मुल्ला को ही कबाड़ बेचे जाने की आदत से परेशान था | वैसे वह बाप की हर आदत से परेशान था | सोशल मीडिया के द्वारा फैलाए जा रहे संदेशों के परिणामस्वरूप पिछले कुछ समय से मुस्लिम धर्म के प्रति उसके नज़रिए में फर्क आ गया था | हर मुस्लिम को वह शक की नज़र से देखता था | 

''पापा आपको कोई हिन्दू कबाड़ी नहीं मिलता क्या ''? बेटा गुस्से से भरकर कहता | 

''अब कबाड़ में धर्म कहाँ से आ गया ?'' राम किशोर शांत रहते | 

''आपको पता ही क्या है कि दुनिया में क्या हो रहा है ''?

''अच्छा ही है कि नहीं पता''| राम किशोर शांत चित्त जवाब देते हैं | उनकी चुप्पी के आगे बहस करने की सारी संभावनाएं दम तोड़ देतीं थीं | 

एक दिन राम किशोर बीमार पड़ गए | ब्लडप्रेशर हाई हो गया | डॉक्टर ने चलने - फिरने के लिए तक सख्त मना कर दिया |  बेटा नौकरी से छुट्टी लेकर आया | उसी दिन आ पहुंचा मुल्ला | अन्य दिनों उसे राम किशोर 
आँगन में बैठे हुए ही मिल जाते थे | आज उसे घंटी बजानी पड़ी | गेट बेटे ने खोला | 

''सलाम बेटे ! बाबूजी कहाँ हैं ''?

''बीमार हैं'' बेटे ने रूखा सा उत्तर दिया | 

''खुदा खैर करे | सब खैरियत है'' ?

''हाँ दो तीन दिन में ठीक हो जाएंगे ''| 

''अल्लाह सलामत रखे | बाबूजी बहुत अच्छे आदमी हैं ''| 

''हूँ ''| 

''कबाड़ होगा क्या भैया ? बहुत दूर से आते हैं | कुछ रद्दी वगैरह होगी तो ले आइये | बाबूजी तो हमारे लिए जमा करके रखते हैं ''| 

''बेटा , मुल्ला आया है क्या ? अंदर से रद्दी दे दे उसे ''| अंदर से राम किशोर की आवाज़ आई |   

''देखता हूँ'' मन मारकर बेटा अंदर जाता है तो राम किशोर हिदायत देते हैं ,'' देख ! उससे बहस मत करना | जितना रुपया दे, चुपचाप ले लेना'' | 

 बेटा मन मारकर रद्दी का ढेर बाहर लाता है | 'बीमारी का लिहाज किया वरना कभी का भगा दिया होता इस मुल्ला को '| 

''कितने बच्चे हैं आपके''? नफरत से भरे हुए बेटे ने पहला सवाल दागा | 

सोशल मीडिया और इधर - उधर से उसने यही जाना था कि इन लोगों के यहाँ दस से कम बच्चे नहीं होते हैं | और फिर यह तो कबाड़ी है इसके तो बीस से कम नहीं होंगे | 

''जी तीन'' मुल्ला तराजू पर बाट रखते हुए बोला | 

''क्या ? क्या कहा'' ? बेटे को लगा कि उसने ढंग से नहीं सुना | 

''तीन बच्चे हैं हमारे''| 

''अच्छा ! बेटे का मुंह खुला का खुला रह गया'' | 

बहुत देर बाद उसकी चेतना लौटी | तब तक मुल्ला रद्दी तोल चुका था | 

''कौन - कौन हैं'' ?

''एक बेटी है दो बेटे हैं ''| 

''क्या करते हैं वे ''? 

बेटे का अनुमान था कि बेटी की शादी हो गयी होगी और वह कहीं ढेर सारे बच्चे पैदा कर रही होगी | बेटे कहीं आवारागर्दी करते होंगे या इसकी ही तरह कबाड़ बेचते होंगे या ऐसा ही कोई और मिलता जुलता धंधा करते होंगे | 

बेटे की यह धारणा कुछ समय से ही बनी थी जबसे वह सोशल मीडिया पर सक्रिय हुआ था | 

''लड़की बड़ी है एम.ए. कर रही है'' | 

बेटा आसमान से गिरा | एक कबाड़ी वाले की बेटी एम.ए.?

''अच्छा ! कहाँ से ? विषय से ''?

बेटे को कुछ तसल्ली मिलती अगर वह कहता , प्राइवेट है और विषय है समाजशास्त्र या हिंदी या ऐसा ही कुछ | लेकिन उसने कहा ''जी अंग्रेज़ी से कर रही है | कालेज जाती है साथ में ट्यूशन भी पढ़ाती भी है घर पर |अपनी पढ़ाई का इंतज़ाम अपने आप ही करती है'' | 

''और लड़के क्या करते हैं''? राम किशोर के बेटे को उम्मीद थी कि यहाँ पर उसकी धारणा सही होगी | 

''छोटा वाला हाईस्कूल में है | कक्षा में हमेशा अव्वल आता है'' | 

''बड़ा वाला'' ? यह ज़रूर छोटा - मोटा धंधा करता होगा साथ में चोरी - चाकरी में भी सक्रिय होगा | ऐसा ही पढ़ा है उसने इन लोगों के बारे में | 

''बड़ा वाला मिस्त्री है''|  मुल्ला रद्दी के ढेर बना कर बांधता जा रहा था | 

बेटे के कलेजे में ठंडक पड़ी | उसकी सांस में सांस आई | कुछ तो राहत मिली | ''मिस्त्री'' वह बड़बड़ाता है | 

''मिस्त्री का काम तो वह बहुत छोटी उम्र से करता आ रहा है | साथ में पढ़ाई भी करता है | ओपन यूनिवर्सिटी से एम. एस. सी. कर रहा है'' | 

अब बेटा कुछ बोलने के लायक खुद को नहीं पा रहा था | 

लीजिए बाबूजी दो सौ रूपये हो गए '' मुल्ला ने अपनी जेब से सौ - सौ के दो नोट निकाले और बेटे के हाथ में पकड़ाए | 

'' नहीं नहीं, आप रख लीजिये '' बेटे के मुंह से निकला | 

''नहीं बाबूजी, पैसे ले लीजिए''| 
 
''नहीं मैं बिलकुल नहीं लूंगा ये रूपये | आप इतने बुजुर्ग हैं | इस उम्र में इतनी मेहनत करते हैं | बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रहे हैं मुझे बहुत अच्छा लग रहा है'' | 

''जी बाबूजी ! बच्चे मना करते हैं, कहते हैं क्या ज़रूरत है इस उम्र में इतना घूमने की ? लेकिन हमें अच्छा लगता है काम करना | धूप, बरसात, जाड़ा कुछ भी हो जाए हम रुकते नहीं हैं | आपके बाबूजी जैसे कई बुजुर्ग हैं जो हमारा इंतज़ार करते हैं किसी और को कबाड़ नहीं बेचते''| 

इतने में उसका फोन बजता है | वह फोन उठाता है 
 
''जी ! जी हाँ हम बोल रहे हैं मुल्ला जी | कहाँ आना है साईं मंदिर ? ठीक है | आ जाएंगे | कल सुबह साईं मंदिर आ जाएंगे'' | 

''मंदिर क्यों जाएंगे मुल्ला जी ''? बेटे ने जिज्ञासावश पूछा | 

''हमारा काम है वहां | हम ही वहां से कबाड़ लाते हैं हमेशा | जब भी कबाड़ जमा हो जाता है, हमें बुला लेते हैं फोन करके'' | 

बेटा सोच रहा है पहले मधुशाला मंदिर और मस्जिद को  मिलाती थी आजकल कबाड़ मिला रहा है | समय बदल रहा है और क्या खूब बदल रहा है | 

''अच्छा है '' बेटा मन ही मन हंस दिया | 

''अच्छा बेटा चलते हैं | खुदा हाफ़िज़ | बाबूजी को सलाम कहियेगा'' | 

''मुल्ला जी कल फिर आ जाना मेरे पास बहुत सारा फ़ालतू सामान पड़ा है | मेरे किसी काम का नहीं है अब | आप सब ले जाना और हाँ ! अपना फोन नंबर दे दीजिए अगले हफ्ते ईद है, मैं आपको और आपके परिवार को ईद की मुबारकबाद दूंगा'' | 

''जी ज़रूर बेटा ! अल्लाह आप सबको सलामत रखे ''| 

शुक्रवार, 23 जून 2017

आमदनी और सफाई ; एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

मेरी ज़िंदगी में ऐसे कई लोग आए, जिनके व्यवहार के आधार पर मैंने कुछ सूत्रों और कहावतों का निर्माण किया है | इन सूत्रों में से एक सूत्र यह रहा - ''ज्यों - ज्यों इंसान की आमदनी बढ़ती जाती है त्यों - त्यों उसके घर में होने वाली सफाई का ग्राफ भी बढ़ता जाता है''| 

इस सूत्र को मैं एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करूंगी | 
  
बहुत साल पहले मेरी एक सहेली हुआ करती थी | तब वह मेरे जैसी निम्न वर्गीय थी | हफ्ते में दो बार झाड़ू और एक बार पोछा लगाया करती थी | उसके घर में चप्पल - जूते पहिनकर कहीं भी घूम सकते थे | मैं उस बेतरतीब, बिखरे हुए घर में जब भी जाती थी, कपड़ों के ढेर को हटाकर अपने बैठने के लिए स्वयं जगह बनाती थी | वह हंस कर कहती थी, ''जगह तो दिल में होनी चाहिए ''| दिल की बात पर भला कौन सहमत नहीं होगा | 

ऐसे ही एक बार उसके बिस्तर पर रखे हुए कपड़ों के ढेर को सरकाकर, बैठे हुए हम दोनों दुनिया जहान की बातें कर रहे थे | गलती से बिस्तर का गद्दा मुझसे सरक गया | मैंने उसे ठीक करने की कोशिश करी तो क्या देखती हूँ गद्दे के नीचे पूरा एक लोक बसा हुआ है | मुझे देश के वैज्ञानिकों पर तरस आया कि वे बिला वजह चाँद और मंगल पर रहने की जगह ढूंढ रहे हैं अगर उन्हें इस गद्दे के नीचे की दुनिया का दीदार करवा दिया जाता तो वे अपने अन्य ग्रहों पर जीवन ढूंढने के अभियान को तिलांजलि दे देते |  

उस गद्दे के नीचे किताबें, अखबार, ज़रूरी कागज़, होम्योपैथी की खाली शीशियां, दवाई के रेपर, पुरानी चिट्ठियां, महिलाओं की पत्रिकाएं, शादी के कार्ड, कपडे, मोज़े, चम्मचें, सुई धागा, बिजली - पानी के बिल, लिपस्टिक, पाउडर, बिंदी, रूमाल, पर्स, कैसेट, कंगन, कटे हुए नाखून, बालों के गुच्छे, पॉलीथिनों का ढेर जो तकिया होने का भरम दे रहा था, इसके अलावा भी कई वस्तुएं थीं जिन्हें मैं एक नज़र में नहीं देख पाई | मैंने इतने दिव्य दर्शन से घबराकर गद्दा वापिस ठीक से लगा दिया और उसके ऊपर बैठ गयी | दोस्त को कोई फर्क नहीं पड़ा | वह हँसती रही | मैंने मन ही मन अपनी दोस्त को प्रणाम किया उसके गद्दे को नमन किया जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में समेटे हुए था | 

उनके घर में मक्खी - मच्छर, मकड़ियों के बड़े - बड़े जाले, काक्रोच ,चूहे, छुछुंदर, खटमल सारे कीट - पतंगे वसुधैव कुटुम्बकम वाले भाव से रहते थे | सब के सब उनके स्नेह की डोरी से बंधे हुए रहते थे | इनमे से किसी की भी हत्या उसे पाप लगता था | '' इस दुनिया में सबको रहने का अधिकार है'', यह उसका प्रिय वाक्य था |   

उसका घर मुझे बहुत प्यारा था | उस घर का कोना - कोना अतिथियों का स्वागत करता सा लगता था | उन बेजान दीवारों से स्नेह टपकता था और छत से अपनत्व की बरसात | जब भी वहां जाना होता था वह मिन्नतें करके दो - तीन दिन रोक ही लेती थी | 

उसकी रसोई भी एक नमूना थी | रसोई के अधिकतर डिब्बे ढक्कन विहीन होते थे | डिब्बों में इतनी चिकनाई लगी होती थी कि हाथ से पकड़ते ही फिसल कर नीचे गिरने का डर रहता था | कहीं आटा बिखरा रहता था तो कहीं सब्जियों के छिक्कल पड़े रहते थे | मसाले के डिब्बे में सारे मसाले एक - दूसरे से मिलकर ''मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा'' गाते थे | एक कटोरी निकालो तो दो गिलास नीचे गिर जाते थे | कपों में दरारें पडी होती थीं, किसी - किसी का तो हैंडल ही नहीं होता था | पूरी रसोई में कहीं किसी किस्म का कोई पर्दा नहीं | कोई दुराव - छिपाव नहीं | है तो सामने है, नहीं है तब भी सामने है | 

उसके घर जाओ और खाली नमकीन, बिस्किट खाकर आ जाओ ऐसा कभी नहीं हो सकता | अपनी बिखरी, गंदी, धूल - धक्कड़ से भरी हुई रसोई में जब वह जाती थी तो आधे घंटे के अंदर दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, रायता, चटनी, सलाद ,खीर के साथ ही बाहर आती थी | खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि पेट ही नहीं भरता था | पेट भर जाने पर भी वह ठूंस - ठूंस कर पेट के फटने तक खिलाती रहती | घर के लिए मिनटों में बिना बताए डिनर भी पैक कर के हाथ में थमा देती थी | 

उस खाने की ख़ास बात यह होती थी अगर उसे बनते समय देख लिया तो एक कौर भी मुंह के अंदर नहीं जाएगा | अगर कोई गलती से खाना बनाने के दौरान उनकी रसोई में चला जाता था तो उसे लगता था कि अभी- अभी कोई सूनामी यहाँ से होकर गुज़री है | सारे बर्तन एक दूसरे से टकराए हुए इधर - उधर गिरे पड़े रहते थे | कॉकरोच यहाँ से वहाँ रेस लगाते थे | नाली में पानी जमा होकर आस - पास के इलाके तक फ़ैल जाता था | उस पानी में कई जीव - जंतु विचरण करते दिख जाते थे | गैस का चूल्हा पहचानना मुश्किल होता था | 

उस खाने में स्नेह था | गंदगी दिख कर भी महसूस नहीं होती थी | वे दिन बहुत प्यारे थे | 

कुछ समय बाद हमारा दूसरे शहर में स्थानांतरण हो गया | वह उसी शहर में रही | 

उसका समय बदला | भाग्य ने करवट ली | उनके पति का प्रमोशन होता गया | पद बढ़ते गया | घर में लक्ष्मी छप्पर फाड़ कर ही नहीं दीवारों को लांघ कर, खिड़कियों, रोशनदानों और दरवाज़ों को तोड़ कर घर - आँगन में प्रवाहित होने लगी | 

हर प्रमोशन के साथ मेरी मित्र का सफाई का शौक बढ़ता गया | घर में कई नौकर - चाकर आ गए | सुबह, दिन, शाम यहाँ तक की रात को भी डिटॉल वाला पोछा लगने लगा | काम वालियों को दिन में दो बार डस्टिंग का आदेश दे दिया गया | वह स्वयं मेज़ पर हाथ फिर कर धूल चैक करती थी | धूल का एक भी कण अंगुली में चिपका तो समझो क़यामत आ गयी | गुस्से के मारे वह बौखला जाती | पागलों जैसा बर्ताव करने लग जाती | 

झाड़ू - पोछे की क्रिया के दौरान घर वालों की हर किस्म की क्रिया पर बैन लग जाता था | पोछे के पाने में ज़रा सी गन्दगी देख कर उसका ब्लड प्रेशर हाई होने लग जाता था और चीखने की आवाज़ पूरे घर में गूँज जाती थी | काम वालियों को दोबारा नहा कर ही घर के अंदर घुसने का आर्डर था | घर का कोना - कोना बैक्टीरिया प्रूफ हो चुका था | लिपस्टिक, पावडर के डिब्बे तक रोज़ डिटॉल से धुलने लगे | 

भूले से भी कोई मय चप्पलों के अंदर नहीं आ सकता | आगंतुकों के लिए डिटॉल से धुली चप्पलें दरवाज़े के बाहर रखी रहती थी | 

खुलकर हंसना में भी उन्हें खटका लगा रहता था की कहीं बैक्टीरिया अपने दल - बल समेत आक्रमण न कर दे |  

किसी के खांसने व छींकने भर से उसे वायरल का खतरा मंडराता दिखता था | 

उसकी समृद्धि और सफाई के चर्चे इधर - उधर से कभी - कभार सुनाई दे जाते थे | मन में उससे मिलने की उत्कंठा ने एक दिन बहुत ज़ोर मारा और मैं पुरानी दोस्ती को याद करके मैं उससे होली मिलने चली गयी | मैंने हाथों में गुलाल लेकर उसके गाल में मलना चाहा तो उसे करंट मार गया, ''छिः छिः यह क्या कर रही हो ? सब जगह गन्दा हो गया', अब फिर से सारी सफाई करनी पड़ेगी'' | मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया | मैं ''सॉरी- सॉरी कहकर पीछे हट गयी | 

वह इतना गुस्सा हो गयी कि सामान्य शिष्टाचार तक भूल गयी और दनदनाती हुई घर के अंदर चली गयी | मैं अपराधिनी की तरह सिर झुकाए हुए उलटे पैरों लौट गयी | 

सुनती हूँ कि उसके बच्चे दीपावली में पटाखे नहीं जला सकते | दिए जलाना उन्होंने कब का छोड़ दिया क्योंकि इससे उनके बेशक़ीमती फर्श पर गंदगी हो जाती है | होली पर गेट के बाहर ताला लगाकर वे सपरिवार अंदर बैठ कर टी. वी. देखते हैं | 

उसके दोस्त या रिश्तेदार उसकी शान - औ - शौकत, धन - दौलत इत्यादि बात से प्रभावित होकर उसके घर आना चाहते हैं, रुकना चाहते हैं, पर वह किसी को रोकने की तो छोड़ ही दो आधे घंटे से अधिक अगर वह बैठ गया तो स्वयं अंदर चली जाती है | 

अब उसके बिस्तर गद्दे को उठाना तो दूर कोई उस पर बैठ भी नहीं सकता | 

घर जाने पर अब चाय ही मिल जाए तो अहो भाग्य समझो | बेशक अलमारी में सजी हुई बेशकीमती क्रॉकरी आप देख सकते हैं, सराह सकते हैं पर उस पर कुछ परोसा जाएगा यह सोचना मूर्खता होगी |  

वह गर्व से सबको बताती है कि मेरे घर का फर्श इतना चमकता है कोई अपना चेहरा देख सकता है, लेकिन लोग हैं कि उसके घर उसके फर्श पर अपना चेहरा देखने जाते ही नहीं | 

वह अमीर घर के लोगों से मेल - जोल बढ़ाना चाहती है लेकिन वे लोग उसे घास नहीं डालते | वे लोग उस से मिलते ही याद दिलाते हैं '' तुम्हे याद है तुम पहले कैसे रहती थी ? अब तुम्हारे दिन कितने बदल गए हैं, सच ही कहा गया है कि घूरे के भी दिन फिरते हैं ''| घूरा सुनकर उसके माथे पर बल पड़ जाते हैं | 

वह बहुत परेशान रहती है | पुराने लोगों को भूल जाना चाहती है लेकिन पुराने लोग उसे नहीं भूलते | 

वह उन गरीबी के दिनों दिनों को भूल जाना चाहती हैं लेकिन अमीर लोग उसे भूलने नहीं देते |   


मंगलवार, 20 जून 2017

गर्म फुल्का ---- लघु कथा


आज चौथा दिन है जब मधु बिना रोटी बनाए सो गयी | रोज़ - रोज़ ब्रेड खाकर पेट नहीं भरा जा सकता | मानता हूँ कि वह भी नौकरी करती है और मेरे बराबर तनख्वाह पाती है, लेकिन वह अकेले ही तो नौकरी नहीं करती | कई औरतें नौकरी करती हैं और घर का काम भी करती हैं | बच्चे भी संभालती हैं | अभी तो हमारा बच्चा भी नहीं है | बच्चा होने के बाद कैसे मैनेज करेगी मधु ? 

रात नौ बजे ही उनींदी हो जाती है मधु | कहती है, सब्जी बन गयी है जब रोटी खानी हो तो उठा देना | गर्म - गर्म फुल्के सेंक दूंगी | फिर घनघोर नींद में डूब जाती है | अब उसे नींद से कैसे उठाऊं ? इतनी मासूम लगती है सोते हुए | एकदम किसी छोटे बच्चे की तरह | उसको उठाना पाप लगता है | रोज़ - रोज़ भूखा भी नहीं सोया जाता | मधु तो ऑफिस से आकर ही खाना खा लेती है फिर रात को कुछ नहीं खाती | उसका मानना है कि दिन ढलने तक भोजन कर लेना चाहिए इससे खाना अच्छी तरह पच जाता है | मैं ऐसा नहीं कर सकता | मुझे दस बजे से पहले भूख ही नहीं लगती | 

आज बात करनी ही पड़ेगी चाहे इसके लिए मुझे उसे नींद से ही क्यों न उठाना पड़े | मैंने कब चाहा कि मुझे खाने में गर्म फुल्का ही चाहिए ? मैं तो बस पेट भरना चाहता हूँ फिर चाहे फुल्का गर्म हो या ठंडा | क्या फर्क पड़ता है ? मैं कई बार कह चुका हूँ कि रोटी बनाकर सोया करो लेकिन उसकी वही ज़िद ''गर्म फुल्का सेंक दूंगी, उठा देना''| जानती है वह कि मैं नहीं उठाऊंगा फिर भी कहती है | 
 
इससे तो पापा का ठीक रहा | मनपसंद खाना न मिलने पर थाली पटक देते थे | माँ दोबारा खाना बनाती थी | पापा की इस गंदी आदत को देखकर मैंने बचपन से ही यही निश्चय कर लिया था कि खाने के लिए कभी अपनी पत्नी को तंग नहीं करूँगा | लेकिन अपनी इस अच्छी आदत से मुझे क्या मिला ? पिछले चार दिनों से बिना रोटी के सब्जी खा रहा हूँ | ऐसा हफ्ते में तीन दिन तो होता ही होगा | ऑफिस में सब पूछते हैं कि क्या बात है बहुत सुस्त लग रहे हो ? मैं फीकी सी हंसी हंस देता हूँ | 

नहीं ! मुझे नहीं चाहिए इसकी नौकरी | इतनी तनख्वाह तो मुझे मिलती ही है कि घर का खर्च चला सकूं | नहीं रहेंगे शान - शौकत से | नहीं खरीदेंगे अपना घर, गाड़ी | इनके बिना क्या लोग दुनिया में रहते नहीं हैं ? हम भी रह लेंगे |  

''मधु ! उठो मधु ! मुझे तुमसे बहुत ही ज़रूरी बात करनी है''|   
मधु ने आँखें मिचमिचाई | 
''ओह ! तुम हो | क्या बात है ? खाना खा लिया ''?
''नहीं ! तुम फुल्के .... ''| 
''ओह ! सॉरी डार्लिंग ! मैं फुल्के नहीं बना पाई | क्या करूँ ? इतना थक जाती हूँ कि बिस्तर देखते ही नींद आ जाती है | बस में बैठे - बैठे पैरों में इतना दर्द हो जाता है कि उठा ही नहीं जाता | मन करता है कि छोड़ दूँ ऐसी नौकरी को''| 
''चलो जाने दो | रात को खाना न भी खाया तो कोई हर्ज़ नहीं | तुम अपने पैरों का इलाज कराओ | अभी से इतना दर्द होना ठीक नहीं ''| मैं क्या कहना चाहता था और क्या कह रहा था | 
''हाय मेरे तलवे'' मधु ने लेटे -लेटे ही अपने पैरों की अंगुलिया घुमाई | 
''लाओ मैं दबा देता हूँ '' मेरे हाथ अपने आप ही उसके तलवों की ओर बढ़ गए | 
'' तुम कितने डार्लिंग हो यार ''| मधु बड़बड़ाई और थोड़ी ही देर में घुर्र - घुर्र करके सो गयी | 
'' गर्म फुल्का ..... '' मैं बड़बड़ाता हूँ | 

सोमवार, 19 जून 2017

पिता तुम्हारा साथ --- [नौ साल पहले पन्नों पर उतारे गए लफ्ज़ अब की बोर्ड के हवाले ]


माता - पिता की मृत्यु के पश्चात उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने के रिवाज़ का पालन तो सारी दुनिया करती है परन्तु मेरा मानना है कि अगर जीते जी हम उन्हें उनके स्नेह, वात्सल्य, संरक्षण एवं त्याग के लिए कृतज्ञता अर्पित करें तो उनका शेष जीवन शायद चैन से बीतेगा | 
आज लगभग पांच या छह वर्षों से लगातार [ अब नौ साल और जोड़ दीजिये - स्थिति वही की वही ] वैवाहिक जीवन के झंझावातों को झेलने के उपरान्त जब मैंने हाथ में कलम उठाई तो सबसे पहले अपनी नई ज़िंदगी लिए अपने पिता को धन्यवाद देने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई और मैं अपने रोम - रोम से लिखती चली गयी | 

मेरे पिता, रिटायर्ड विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग |  त्याग, समर्पण, कर्तव्य निर्वहन की जीती - जागती मिसाल हैं | उनका सम्पूर्ण जीवन सादगी व् ईमानदारी का अनूठा व अनुपम उदाहरण है | कोई अजनबी उनसे पहली बार मिलने पर आश्चर्य से ठगा रह जाता है | मुझे याद है कुछ साल पहले पापा को किसी कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने हेतु आमंत्रित करने के लिए एक सज्जन हमारे घर आए | पापा के कई बार विश्वास दिलाने पर कि वे ही प्रो हरि कुमार पंत हैं, तब जाकर उन सज्जन ने पापा को आयोजन का निमंत्रण पत्र सौंपा | पापा का ऐसा ही व्यक्तित्व है | कृष काय शरीर, सूखा, पिचका चेहरा, खिचड़ी बाल, बढ़ी हुई दाड़ी, पुराने रंग उड़े बेमेल कपडे, बिवाई पड़ी हुई एड़ियां, उस पर हाथ से जगह - जगह से सिली हुई घिसी हुई चप्पलें | किसी के लिए भी विश्वास करना मुश्किल होता | पापा के समकालीन प्रो जहाँ सूट - बूट में लकदक, महंगी गाड़ियों में सवार एवं चमचमाते चेहरे वाले होते वहीं पापा इस मूल्यहीन, स्वार्थी और दिखावटी जमात से एकदम अलग | अक्सर हमें टोकते रहते हैं, '' क्यों कपड़ों की दौड़ में शामिल होते हो ? इसका कहीँ कोई अंत नहीं मिलेगा | कपडे किसी के व्यक्तित्व का आईना कभी नहीं बन सके ''| 

जहाँ तक पापा की विद्व्ता का प्रश्न है हम बच्चे जिससे भी कहते हैं कि हम ' हरि कुमार पंत उर्फ़ होरी' के बच्चे हैं, तुरंत यही सुनने को मिलता है '' तुम्हारे पापा बहुत विद्वान व्यक्ति हैं''| साथ ही यह भी सुनते थे कि वे अपने जवानी के दिनों में बहुत अप - टू - डेट रहते थे | उनके ऊपर उनकी कई शिष्याएँ जान छिड़का करती थीं | अब यह समझ में आता है कि शायद पापा ने अपने बच्चों के अंदर सादगी का संस्कार भरने के लिए ही अपने व्यक्तित्व को इस सांचे में ढाला होगा | 

पापा, गोदान के नायक ' होरी ' की तरह ऐसे इंसान हैं, कठोर परिश्रम ही जिसकी ज़िंदगी का एकमात्र उद्देश्य है | आज तिहत्तर [अब बयासी ] वर्ष की उम्र में जहाँ भी जाते हैं पैदल ही जाते हैं | बस कहने भर की देर होती है, ''पापा मेरा फॉर्म जमा करना है या फलाने बैंक का ड्राफ्ट बनवाना है', कड़कती धूप की उन्हें परवाह नहीं होती न घनघोर बारिश की फ़िक्र | किसी भी गाड़ी की सवारी बनना उन्हें पसंद नहीं | लोग उन्हें ' कंजूस, मक्खी चूस' जैसी अन्य कई उपाधियों से समय - समय पर अलंकृत करते रहे, लेकिन उन्हें किसी ताने का कोई फर्क नहीं पड़ा | आज लगता है कि पापा हम बच्चों से कहीं ज़्यादा स्वस्थ हैं | मेरे घुटने तैंतीस [अब बयालीस] की उम्र में दर्द [ अब तीव्र ] करते हैं, बहिन की सीढ़ियां चढ़ने में सांस फूलती है, भाई को चक्कर आने का रोग है तो माँ डाइबिटीज़ व हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से ग्रसित है | कभी - कभार 104 डिग्री बुखार आने पर भी मात्र एक पैरासीटामोल की गोली और कई गिलास गर्म पानी पीकर स्वयं को स्वस्थ कर लेते हैं पापा | आराम करने को कहा जाए तो टका सा जवाब मिलता है '' मुझे अपाहिज मत समझो'|
 
एक क्षण को भी फ़ालतू बैठना या गप्पें मारना पापा को पसंद नहीं है | उनके हाथों को हमेशा कुछ न कुछ करते रहने की आदत है | वाशिंग मशीन के होते हुए भी अपने कपडे अपने हाथ से धोते हैं | कामवाली बाई है लेकिन मौका मिलते ही जूठे बर्तन धोने जुट जाते हैं | झाड़ू लगा देते हैं | काम वालों के लिए ज़्यादा काम न हो जाए इसका वे बहुत ख्याल रखते हैं | समाज के निचले तबके के लोगों के प्रति उनका स्नेह जग - जाहिर है | सुरेंद्र प्रेस वाला, राजन पान वाला, बबलू नाई उनके परम मित्र हैं | ये लोग दोस्ती के बहाने पापा से अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश नहीं करते शायद इसीलिए उनके आत्मीय हैं | इसके विपरीत कोई उच्च पदस्थ रिश्तेदार या परिचित उनसे मिलने घर आता है और अपने पद या शक्ति की डींग हांकता है तब पापा बिना कोई लिहाज़ किए बैठक से उठ कर चले जाते हैं और दोबारा अंदर नहीं आते | कारण पूछने पर हंसकर कहते हैं, '' मैं अगाथा क्रिस्टी की तरह आदमी के दिमाग में बैठ जाता हूँ और जान जाता हूँ कि कौन किस मकसद से आया है''|

पापा अपने कर्तव्य पालन में कभी पीछे नहीं हटे | मुझे याद है जब माँ के पैर में फ्रेक्चर हुआ था और वह दैनिक निवृत्ति विशेष प्रकार की कुर्सी में करती थी जिसमे पॉट बना होता था | एक दिन वह पॉट टॉयलेट में ले जाकर मुझे साफ़ करना पड़ा तो पूरा दिन उबकाई आती रही | उसके बाद माँ ने मुझे कभी नहीं आवाज़ दी | पापा तुरंत उस पॉट को टॉयलेट ले जाकर बिना किसी परेशानी के साफ़ कर देते | बाद में मैंने स्वयं को बहुत धिक्कारा पर पापा ने यह कहकर मुझे उस पॉट को हाथ नहीं लगाने दिया '' यह मेरा कर्तव्य है | मैं तेरी माँ का जीवन साथी हूँ | अगर मुझे कुछ होता तो यह कार्य तेरी माँ कर रही होती'' | यहाँ तक कि मेरी नन्ही बेटी नव्या [ अब तेरह साल ] भी मेरी अनुपस्थिति में पापा को ही आवाज़ लगाती है,'' नानाजी पॉटी कर ली, धुला दो''| 

बचपन से ही हम तीनों भाई - बहिनों को पापा की यह बात बहुत ही खराब लगती थी कि वे हमें जेब खर्च नहीं देते थे | हमारे कई मित्र लोग हमसे निम्न आर्थिक स्टार के होते हुए भी खूब चाट - पकौड़ी खाते और सैर - सपाटा करते | हम लोग अपना मन मसोस कर रह जाते और पापा को कोसने का कार्यक्रम सामूहिक रूप से करते | पापा का उदार चेहरा हमने तब देखा जब हमारी नानी दुर्घटनावश जल कर अस्पताल में भर्ती हुई | उस समय पापा ने पैसे खर्च करने में अपने उदार ह्रदय का परिचय दिया और तब भी जब मुझ पर विवाहोपरांत परिस्थितिजन्य आर्थिक विषमताओं ने आघात किया था | ससुराल में बीमार सास, पति द्वारा नौकरी छोड़ना, उस पर गर्भ में जुड़वां बच्चे | किसी को भी मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देने के लिए काफी था, परन्तु जब - जब मुझे ज़रुरत पडी उन्होंने अपना रक्त - संचित धन देने में कतई संकोच नहीं किया | 
भाई, जो पापा की कंजूसी का अक्सर अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों के बीच मज़ाक उड़ाया करता था, एक दुर्घटना के चलते कई दिनों तक महंगे प्राइवेट अस्पताल में भर्ती रहा, तब जाकर पापा के दृष्टिकोण को सही ढंग से समझ पाया | अब उसे भी पैसों के मामले में पापा के नक्शेकदम पर चलते देखकर बहुत प्रसन्नता होती है |  
   
माँ से ऊंची आवाज़ में बात करना या उसका अपमान करना पापा ने कभी गवारा नहीं किया | माँ के प्रति उनके मन में जो प्रेम है उसकी कोई सीमा नहीं | हम बच्चों के सामने ही पापा अक्सर माँ को '' डार्लिंग'' कहकर सम्बोधित करते हैं | '' यह मेरे जीवन की धुरी है | ये न होती तो मेरा पता नहीं क्या होता ''| पापा से यह सुनकर मेरे भाई 'रोहित' की पत्नी 'पंकजा' उससे अक्सर कहती है '' तुम अपने पापा से क्यों नहीं सीखते पत्नी को प्यार करना ''| 

माँ का बताया छोटे से छोटा काम करने को पापा हमेशा तत्पर रहते हैं | मैं कभी - कभी झल्ला कर माँ से झगड़ उठती, ''तुम पापा को इतना क्यों दौड़ाती हो ''? पापा के चेहरे पर शिकन का नामोनिशान तक नहीं मिलता | एक छोटा सा वाक्य हमारी बहस की इतिश्री कर देता,''ये गृहस्थी के प्रति मेरे कर्तव्य हैं बेटा ''|  
 
पापा के अंदर भरे हुए धैर्य को देखकर कभी - कभी हमें कोफ़्त होने लगती है | कभी कोई अर्जेन्ट काम के आ जाने पर भी पापा अपना काम पूरा करके ही उठते हैं | परन्तु इसी धैर्य के चलते वे किसी भी रस्सी या ऊन पर पडी बड़ी से बड़ी गांठों को बिना किसी परेशानी के घंटों तक बैठकर सुलझा लिया करते हैं | ग्रामर का कोई सूत्र समझ में न आने पर तब तक समझते रहते हैं जब तक कि वह दिमाग में अच्छी तरह से घुस नहीं जाए | पापा का यह धैर्य चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न हों, हमेशा उनके साथ रहता है | कभी रात को जब हम भाई - बहिनों को घर लौटने में देर हो जाती थी तो माँ चिंता में व्याकुल हो उठती थी, पर पापा का चित्त एकदम स्थिर होता, ''अभी आ जाएंगे लौट के, चिंता मत करो'' | 

पापा के इस धैर्य का एक और उदाहरण हमने तब देखा, जब उन्हें पेंशन व फंड मिलने में ढाई साल लग गए, उस पर उनको कई हज़ार रुपयों का नुकसान भी उठाना पड़ा परन्तु उन्होंने सरकारी बाबुओं को रिश्वत देना उचित नहीं समझा | उन्होंने हमसे यही कहा, ''अपने खून- पसीने की कमाई को लेने के लिए मैं रिश्वत का सहारा नहीं लूंगा''| उन ढाई वर्षों की आर्थिक तंगी ने हम तीनों भाई - बहिनों को आत्मनिर्भर होने की तरफ अग्रसर किया | वह तंगी हमने न झेली होती तो शायद हम जीवन - संग्राम में संघर्ष करना सीख न पाते |  
  
पापा ने हमें ऐशो - आराम से भरपूर ज़िंदगी भले ही न दी हो परअपने स्नेह व वात्सल्य से हमेशा सराबोर रखा | नकचढ़ी, गुस्सैल व् ज़िद्दी होने के कारण बचपन में कई बार मैं बिना खाना खाए सो जाती तो पापा मुझे घंटों तक मनाते रहते और हाथ में खाने की थाली पकडे खड़े रहते थे | जब तक मैं खाना न खा लूँ, सामने से हटते नहीं थे, कहते, ''अगर मुझसे गुस्सा हो तो मुझे चाहे जितने घूंसे मार लो, पर खाना मत छोडो''| जाड़ों में बच्चों को  ज़ुकाम या बुखार न हो जाए इसके लिए वे हमें अपने हाथों से शहद और बादाम खिलाते थे |

''तुम तीनों मेरे कलेजे के टुकड़े हो '' | ऐसे मौकों पर यह उनका प्रिय वाक्य होता | हम तीनों को रोज़ रात को कहानियां सुनाना, अंगुली पकड़कर सैर पर ले जाना, हमारे साथ हमारे खेलों में शामिल होना उन्हें बहुत अच्छा लगता था | पहली - पहली बार जब मैं एम.एड.करने के लिए घर से निकल कर हॉस्टल रहने के लिए गयी तब माँ बताती है कि पापा ने उस रात खाना नहीं खाया और उनकी आँख में आंसू भी थे | वे बार - बार कह रहे थे,'' इतनी ठंड में अल्मोड़ा कैसे रहेगी बेचारी ''?    

न केवल अपने पत्नी, बच्चों वरन छोटे - छोटे जानवरों पर भी समय - समय पर उन्होंने अपना स्नेह - सागर उड़ेला | एक बार हमारे घर में एक बिल्ली अपने दो बच्चों को छोड़ कर चलेगी | हमने उन्हें भागने की बहुत कोशिश करी पर असफल रहे | उन्हें पालना हमारी मज़बूरी बन गयी | जब उन्हें पाला तो वे भी हमारे घर का एक हिस्सा बन गए | बिल्ली को ''छम्मो '' और बिल्ले को ''फुल्लो '' नाम दिया गया | पापा दोनों को अपनी थाली के पास बैठाकर खिलाते | उन बच्चों के दांतों को चबाने में कष्ट न हो इसके लिए रोटी के टुकड़ों को अच्छी तरह मसलकर उनके आगे रखते | बाद में बड़े - बड़े बिल्ले उन बच्चों को मारने के लिए घर के चक्क्र काटने लगे तो पापा उनकी रखवाली किया करते थे | घर में उनकी सुरक्षा के लिए ग्रिल व्  दरवाज़े भी पापा ने लगवाए | 

पापा ने अपनी जीभ की गुलामी कभी स्वीकार नहीं करी | माँ, खाने - खिलाने की शौक़ीन होने के कारन अक्सर उनसे पूछती,'' कैसा बना है खाना ''? पापा का सपाट उत्तर होता,''खाने के बारे में इतनी बातें करना ठीक नहीं है |  जीने के लिए खाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना चाहिए''| हम लोगों द्वारा खाने में पड़े नमक, मिर्च सम्बन्धी शिकायत करना भी पापा को सख्त नापसंद था | पापा खाने - पीने के लिए कभी किसी की दावत या शादी - ब्याह में शामिल नहीं हुए | घर पर रहकर दो रोटी नमक के साथ खाना उन्हें अच्छा लगत है | इकलौते पुत्र के विवाह के अवसर पर जहाँ लोग लड़की वालों को खसोटना अपना परम धर्म समझते हैं,पापा ने खाना तक नहीं खाया | दान - दहेज़ लेना तो दूर की बात है |  

मेरा विवाह जब तय हुआ था तो मेरे पति उच्च पद पर बहुराष्ट्रीय बैंक में कार्यरत थे | बिना किसी दान - दहेज़ के मेरा विवाह संपन्न हुआ था | विवाह पूर्व मेरी दोनों ननदें, जो मेरे पति से बड़ी थीं, विभिन्न विषयों पर मेरी राय जानने व अपने घर - परिवार से अवगत कराने हेतु मुझसे मिलने आई थीं | पापा से जब उन्होंने पूछा कि उन्हें कैसे दामाद की अपेक्षा है ? पापा ने बस इतना ही कहा, ''लड़की को दो रोटी खिलाने वाला होना चाहिए बस''|  ननदें, जो उच्च पदों पर आसीन थीं, आश्चर्य करने लगी,'' क्या सिर्फ दो रोटी खाने तक ही इंसान की ज़िंदगी सीमित होती है ?इसके आगे क्या कुछ नहीं चाहिए ? यह तो पशुवत जीवन के सामान होगा ''|  

मेरे ससुराल में काफी समय तक पापा की दो रोटी वाली वाली बात हंसी - मज़ाक का केंद्र - बिंदु बनी रही | परन्तु विधाता के खेल को कौन जान सका है ? परिस्थितियों की मार से एक दिन ऐसा भी आया कि हमें दो रोटी के तक लाले पड़ गए | मुझे मायके वापिस आकर एक बार फिर से नौकरी ढूंढनी पड़ी | कुछ समय प्राइवेट नौकरी करने के बाद माध्यमिक शिक्षा में मेरी नियुक्ति हो गयी | प्राथमिक की सरकारी नौकरी मैं शादी से पहले छोड़ चुकी थी | अब दो रोटी का इंतज़ाम मैंने किया | कठिन से कठिन क्षणों में पापा के सदा संघर्षरत चेहरे को ध्यान में रखकर मैंने अपने अंदर नई ऊर्जा अनुभव की है | 

कभी - कभी मैं अपने पति से कहती हूँ, '' इंसान को हमेशा पापा की तरह ज़मीन पर खड़े होकर बात करनी चाहिए, हवा में नहीं ''| 

आज पापा ने मुझे, मेरे पति और बच्ची को अपने घर में आश्रय दिया हुआ है [ दस साल बाद पिछले वर्ष अपने स्वयं के घर में प्रस्थान ]| 
      
यह उनकी ही दी हुई हिम्मत है जो हम दोनों अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू कर रहे हैं  आर्थिक विपन्नता ने मुझे इतना तोड़ दिया था कि मौत और ज़िंदगी के बीच कुछ ही क़दमों का फासला रह गया था | [ लखनऊ में किराए के तिमंजिले मकान की छत से अपनी बेटी को लटका कर पता नहीं किस घड़ी में हाथ वापिस खींच लिया ] 
  
किसी ऐसे ही उदास दिन बहिन ने परसाई की किताब पकड़ाई | मैं उसे पढ़कर चमत्कृत हुई | दुःख का ताज उतार फेंका | अपने अवसाद के खजाने को छोड़कर बाहर निकली और तब से मैंने ज़िंदगी के ऊपर व्यंग्य करना शुरू कर दिया |
  
एक अंग्रेज़ी के प्रोफेसर को आपने कम ही 'कप' को 'प्याला' कहते सुना होगा | पर पापा ऐसे ही व्यक्ति हैं | कॉलेज, घर हो या बाहर उन्होंने कभी अपने अंग्रेज़ी ज्ञान या पांडित्य का प्रदर्शन नहीं किया | ' अंग्रेज़ी सिर्फ मेरी रोज़ी - रोटी है मेरी आत्मा नहीं '', कहकर वे अपने काम में जुट जाते हैं | 
अनावश्यक धन का अर्जन उन्होंने कभी उचित नहीं समझा | यही कारण है कि रिटायरमेंट के पश्चात कई लोग ट्यूशन के लिए पूछने आए तो पापा ने उन्हें विनीत स्वर में मना कर दिया | अपने पूर्व साथी के बेहद आग्रह करने पर संविदा में पढ़ाने के लिए खटीमा गए लेकिन छह महीने के बाद वापिस आ गए | पेंशन नहीं, फंड नहीं, तीनों बच्चे बेरोजगार |  हम चिढ़ जाते और कहते,'' पापा ट्यूशन ही कर लेते तो हम सब आराम से रहते''| पापा निरपेक्ष स्वर में कहते,''मैंने तुम लोगों को पढ़ा - लिखा कर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया अब अपने लिए स्वयं अर्जित करना सीखो'' |    

पापा ने कभी भी लड़का व लड़की में भेद नहीं किया अपितु भाई अक्सर यह शिकायत करता कि पापा हम बहिनों को ज़्यादा प्यार करते हैं |
 
पापा ने अपनी मर्ज़ी अपने बच्चों या अपनी पत्नी पर थोपना कभी उचित नहीं समझा | हम भाई - बहिनों ने जो चाहा, वह किया | जिसने जो विषय चुनने चाहे, चुनने दिए | परीक्षा के दिनों में भी कभी न सुबह पढ़ने के लिए उठाया न रात को पढ़ने के लिए बाध्य किया | मनचाहे कपडे पहिनने, सजने - संवरने, लड़कों से दोस्ती, उनके साथ घूमने - फिरने पर भी उन्होंने कभी एतराज़ नहीं किया | मेरे विवाहोपरांत सरकारी नौकरी छोड़ने जैसा कदम जो बाद में आत्मघाती सिद्ध हुआ या भाई द्वारा बी.एस.एफ़.की कठिन नौकरी चुनने पर भी उन्होंने आपत्ति नहीं दर्ज की | 

स्वयं शुद्ध शाकाहारी होते हुए, माँ व भाई द्वारा निरामिष भोजन पकाकर खाने पर पापा ने कभी नाक - भौं नहीं सिकोड़ी | 

पापा ने कभी भी माँ के साथ एक आम पति की तरह व्यवहार नहीं किया | पापा रिटायर्ड थे और माँ प्राइवेट स्कुल में पढ़ाती थी | माँ के सुबह - सुबह स्कूल चले जाने के बाद बिखरा हुआ घर समेटते थे | आज माँ भी रिटायर्ड है तब भी घर के हर छोटे - बड़े काम में बड़े मनोयोग से माँ का हाथ बंटाते हैं | सुबह उठकर बिस्तर लगाना, पूजा के लिए फूल लाना, छोटे - छोटे बर्तनों को धोना, दूध उबालना, कपडे सुखाना उनका नित्य का कर्म है | 

माँ बताती है कि जब हम छोटे थे तो पापा हमारे मल -मूत्र वाले कपडे धो देते थे | रिश्तेदार और पड़ोसी उन्हें देखते और 'जोरू का गुलाम '' कहकर हंसी उड़ाते | पापा ऐसे लोगों की परवाह करना जाया करना समझते थे | पापा सच्चे अर्थों में आधुनिक प्रगतिशील पुरुष कहे जा सकते हैं | 
कहने को पापा का जन्म उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ है लेकिन वे मूर्ति पूजा, मंत्रोचारण, धार्मिक कर्मकांडों में कभी नहीं उलझे | माँ के बहुत आग्रह करने पर कभी - कभी पूजा घर के सामने खड़े होकर हाथ जोड़ भर लेते हैं | एक दिन मैंने पापा से कहा,'' पापा ! मम्मी के साथ बद्री - केदार हो आइये''| पापा ने जो जवाब दिया वह यह है,'' मेरा कर्तव्य ही मेरी पूजा है यह घर ही मेरा तीर्थ स्थान है''| 

सुबह की पहली किरण का स्वागत पापा ने हमेशा हाथ जोड़कर व सिर झुकाकर किया है | खाने की थाली से पहला कौर मुँह के अंदर रखते ही भगवान को धन्यवाद देना वे कभी नहीं भूलते | अपने हर कर्तव्य को भगवान् का कार्य समझने वाले पापा सच्चे अर्थों में धार्मिक हैं |
 
संन्यास लेने लोग घर से बाहर वनों व तीर्थ स्थलों को चले जाते हैं, पर पापा ने घर - गृहस्थी में रहते हुए भी अपने शरीर को सन्यासियों कीतरह साध रखा है | कितनी ही भीषण गर्मी क्यों न हो, उन्हें पंखा या कूलर की आवश्यकता नहीं होती है | कंपकंपाते हुए जाड़े में भी वे अपने एकमात्र घिसे हुए बीसियों साल पुराने स्वेटर को ही पहनते हैं कि '' यह मेरी बहिन 'बानू' ने मेरे लिए अपने हाथ से बुना था''| इसके अलावा कोई मोज़े, मफलर इनर या दस्ताने इत्यादि पहिनने का तो प्रश्न ही नहीं उठता |   

पापा को किसी वस्तु को बर्बाद करना पसंद नहीं है | छोटी से छोटी वस्तु भी अगर काम की हो तो पापा उसे तुरंत संभाल देते हैं | कई बार हमें लगता है कि वे घर को कबाड़खाना बना दे रहे हैं परन्तु जब हमें किसी मामूली सी वस्तु की ऐन मौके पर ज़रूरत पड़ती है तो पापा जिन्न की तरह एक ही पल में उसे हाज़िर कर देते हैं | तब हमें उनकी इस आदत के महत्व का पता चलता है | 

पापा ने कभी कोई गलत काम करने पर हमें मारा - पीटा या डांटा नहीं | उनका एक ही अस्त्र हमें घायल कर जाता था | हमारी आत्मा को झकझोर देता था | बुरा सा मुंह बना कर बस वे इतना ही कहते थे,''छिः छिः तुम्हें लज्जा नहीं आती ऐसा काम करते हुए ''? पापा की वह धिक्कारती मुखमुद्रा कई दिनों तक हमारा पीछा करती रहती और हम दोबारा गलती करने की हिम्मत नहीं करते थे | 

छोटी बहिन क्षिप्रा अक्सर मुझसे कहती है,''दीदी ! भगवान् पापा जैसे इंसान को किस मिट्टी से बनाता होगा, जो कभी भी अपने विषय में नहीं सोचते, जो अपने बीवी - बच्चों में ही अपनी ज़िंदगी जीते हैं, जिन्हें सबकी छोटी से छोटी ज़रुरत का ध्यान रहता है ''| 

कभी भी आप उनसे मिलेंगे तो उन्हें अपने छोटे - छोटे कामों में तल्लीन पाएंगे | वे या तो किसी किताब में सिर गड़ाए [अब नहीं,९ साल में नज़रें कमज़ोर हो गयी हैं ] मिलेंगे या खेत के किसी कोने में घास - पट्टी को साफ़ करते हुए मिलेंगे | 

संसार का कोई ऐसा इंचटेप नहीं होगा जो उनके हिमालय से ऊंचे व सागर से गहरे व्यक्तित्व को नाप सके | हम तीनों भाई बहिन उनकी सादगी, कर्तव्यनिष्ठा, धैर्य, समर्पण, स्नेह एवं वात्सल्य के समक्ष नतमस्तक हैं | हम भगवान् से प्रार्थना करते हैं की वे स्वस्थ रहें, सानंद रहें और अपने आशीर्वाद से हम बच्चों अभिसंचित करते रहें |            
              

शनिवार, 10 जून 2017

छुट भैये और बड़ भैये ------


हमारे देश में नेता और नारी पर जितना लिखा जाए कम है | नारी पर लिखने के लिए मेहनत चाहिए नेता पर लिखने के लिए हिम्मत | 

बड़ा नेता यानि कि वह इमारत जिसकी बुनियाद छुट भैयों से बनती है | वह इबारत जो छुट भैये की छाती पर लिखी जाती है और पढ़ी बड़ भैया की शान में जाती है | 

बड़ भैया साँप हैं तो छुट भैया वह पत्ता, जिन पर सांप सरसराता चलता है | बड़ भैया नाव है तो छुट भैया पोखर का पानी जिस पर बड़ भैया ठाठ से पतवार चलाता है | बड़ भैया चील है तो छुट भैया वह पत्थर जिस पर चील शिकार खाता है | बड़ भैया गिरगिट है तो छुट भैया वह पेड़ की डाल जिस पर गिरगिट छिपा रहता है | बड़ भैया मकड़ा है तो छुट भैया वह दीवार जिस पर मकड़ा जाल बुनता है | 

छुट भैया वह चीज़ होता है जो अपने बड़ भैया के लिए जान न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहता है | चुनाव के दौरान बड़ भैया के लिए वोटों का जुगाड़ करता है | कॉलेज के लड़कों से लेकर खोखे, फड़ वालों, मजदूरों तक को भीड़ में, जुलूस में, नारे लगाने में शामिल करता है | सबका हमदम सबका दोस्त छुट भैया | 

एक दूसरे पर आश्रित बड़ भैया और छुट भैया | 

बड़ भैया, छुट भैया पर चुनाव जीतने के बाद वरदहस्त रख देते हैं तो वह किसी न किसी परिषद् का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, उपमंत्री, सहमंत्री, मंत्री कुछ भी बन जाता है | 
 
बड़ भैया पहले से ही शादीशुदा होते हैं जबकि छुट भैये की शादी बहुत मुश्किल से होती है क्योंकि कोई भी लड़की वाले इतने बड़े दिल के नहीं होते कि अपनी लड़की एक सेवक को सौंप दें | भला हो बड़ भैया की इमेज का कि कोई न कोई लड़की वाला आखिरकार फंस ही जाता है | ऐसे छुट भैये की जब शादी होती है तब बड़ा ही रोचक दृश्य उपस्थित हो जाता है | 

बारात के दिन जहाँ अन्य साधारण दूल्हे अपने को राजा से कमतर नहीं समझते, घमंड से गर्दन ऊंची तनी रहती है, किसी का भी अभिवादन करना उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगता है, वहीं छुट भैया अपनी खुद की शादी में भी सबको झुक - झुककर नमस्ते करता है, कि कहीं कोई नाराज़ न हो जाए | सबके पास व्यक्तिगत रूप से जाकर खीसें निपोरता है | 'खाना खाया कि नहीं', ड्रिंक आई या नहीं, भाभीजी और बच्चों को क्यों नहीं लाए, अम्मा की तबीयत कैसी है, भाई की नौकरी लगी या नहीं ? आदि आदि | अपनी शादी के दिन भी वह सबकी फ़िक्र में घुला रहता है |  
बड़ भैया जहाँ सिर्फ वोट मिलने तक ही हाथ जोड़ते हैं वहीं छुट भैये की जनता के आगे हाथ जोड़े रखने की मजबूरी होती है | क्योंकि यह जनता उसी का गला पकड़ती है | बड़ भैय्या तो हाथ आने से रहे | 

छुट भैये की शादी में बड़ भैये को अनिवार्य रूप से शामिल होना होता है | यह छुट भैये की इज़्ज़त का सवाल होता है | छुट भैया अपनी शादी की तिथि ग्रह, मुहूर्त, नक्षत्र, मौसम, रिश्तेदारों की सुविधा, परीक्षा की तिथि और बैंकट हॉल की उपलब्धता के आधार पर न करके बड़ भैये की उपरोक्त दिन की उपलब्धता के आधार पर पक्की करवाता है | बड़ भैया उसकी शादी की बारात में शामिल होकर बारात की रौनक बढ़ाने के काम आता है |

बारात में भी लोग अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते | जबरन उन्हें नाचने पर विवश कर देते हैं | बाराती उनका हाथ पकड़कर जबरन बैयां मरोड़ने की कोशिश करते हैं | वे प्रयास करते हैं कि किसी तरह से इनकी कमर [ रा ] हिल जाए या एक हाथ ज़रा सा मुड़ जाए ताकि वीडिओ में ऐसा लग सके कि बड़ भैया बारात में नाचते भी हैं | थोड़ी देर यूँ ही जबरदस्ती हाथ - पैर हिला कर बड़ भैया पैदल चलने लगते हैं | 

बड़ भैया का चेहरा दिखाकर छुट भैया का विवाह पक्का करवाने वाले बिचौलियों की दृष्टि में लड़की वालों पर रोआब गांठने के लिए बारात में बड़ भैया की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है | हांलाकि बड़ भैया के शादी में शामिल होने से एक पैसे की भी बचत नहीं होती उलटे तीस चालीस पिछलग्गुओं के भोजन और टीके का खर्चा अलग से बढ़ता है | इसका बस एक ही फायदा है कि जनता के मध्य यह सन्देश पहुंच जाता है कि बड़ भैया चुनाव जीतने के बाद भी आम लोगों की तरह रहते हैं | जान - सामान्य की शादी - विवाह में सम्मिलित होते हैं | सबके साथ खड़े होकर दावत भी खा लेते हैं | 

उधर दुल्हन के घरवाले दूल्हे का स्वागत करना भूल जाते हैं | सालियाँ तक जूता चुराना भूल जाती हैं | सारे आगंतुक दूल्हे को छोड़कर बड़ भैया के साथ फोटो खिचवाने में व्यस्त हो जाते हैं | दूल्हे को देखने में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती | शादी की सारी रौनक बड़ भैया चुरा ले जाते हैं | छुट भैया को आज अपना होना सार्थक लगने लगता है | वह बार - बार अपनी भीग आई आँखों को पोछता है |   

अपनी शादी के समय छुट भैया कभी - कभी भाव - विभोर होकर इतना विनीत हो जाता है कि अपनी दूल्हे वाली शाही कुर्सी को बड़ भैया के आते ही छोड़ देता है, और दुल्हन के बगल में बड़ भैया को बैठने के लिए कह देता है, मानो कहना चाह रहा हो '' बड़ भैया ! किसी भी तरह की कुर्सी पर चाहे वह शादी की ही क्यों न हो, बैठने का पहला हक आपका ही है' | बड़ भैया गद - गद हो जाते हैं | जब तक बड़ भैया स्टेज से उतर नहीं जाते, वह खड़ा ही रहता है | 

छुट भैया कई बार भूल जाता है कि यह उसकी शादी का मंडप है और दूल्हा वह है | 

दुल्हन जब उसके गले में जयमाला डालने के लिए खड़ी होती है तो वह शर्मिन्दा हो जाता है '' काश ! इस समय बड़ भैया होते ! माला तो उन्हीं के गले में शोभा पाती है'' | वह इधर - उधर नज़र दौड़ाता है, बड़ भैया दूर - दूर तक नज़र नहीं आते तो मजबूरन माला पहिनने के लिए सिर झुका देता है | 

शादी के बाद दुल्हन जब अपनी एल्बम देखती है तो पाती है कि एक चौथाई फोटुओं पर बड़ भैया का कब्ज़ा है | उसका हज़ारों का मेकअप, लहंगा, उसकी बहनों के हेयर स्टाइल, दोस्तों के डिज़ाइनर कपडे, रिश्तेदारों के जड़ाऊ जेवरात, सब नेपथ्य में चले गए हैं | दुल्हन सिर पकड़कर रह जाती है |