रविवार, 21 मार्च 2010

पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं

तीस की उम्र में पचास की लगती हैं  
पहाड़ की औरतें  उदास सी लगती हैं
 
काली हथेलियाँ, पैर बिवाइयां
पत्थर हाथ, पहाड़ जिम्मेदारियां 
चांदनी में अमावस की रात लगती हैं
 
कड़ी मेहनत सूखी रोटियाँ
किस माटी की हैं ये बहू, बेटियाँ
नियति का किया मज़ाक लगती हैं
 
दिन बोझिल, रात उदास
धुँआ बन उड़ गई हर आस
भोर की किरण में रात की पदचाप लगती हैं 
 
पीली आँखें, सूना चेहरा
आठों पहर दुखों का पहरा
देवभूमि को मिला अभिशाप लगती हैं
 
 
तीस की उम्र में पचास की लगती हैं  
पहाड़ की औरतें  उदास सी लगती हैं
 
 
 

32 टिप्‍पणियां:

  1. शेफाली जी

    तीस की उम्र में पचास की लगती हैं
    पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं
    शायद इसी को सार्थक लेखन कहा जाता है, जहां तक मुझे आभास है.
    बधाई.
    - विजय तिवारी " किसलय "

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  2. उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेशों के भ्रमण के दौरान मैंने बहुत गहराई से पहाड़ की नारी की पीर का अनुभव किया। फिर लगा कि शायद जलवायु, भूगोल और समाज संरचना में बहुत अंतर होने के कारण हो सकता है कि मैं अतिरंजित रूप से सोच रहा हूँ। ..आज यह पढ़ा तो सब कुछ आँखों के आगे फिर से घूम गया।
    दु:खद स्थिति है।

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  3. बिल्‍कुल सत्‍य कह रही हैं जबकि कविता में कल्‍पना की जाती है पर आप सच्‍चाई बतला जाती हैं व्‍यंग्‍यकार हैं न ?

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  4. तीस की उम्र में पचास की लगती हैं
    पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं


    -बहुत उम्दा रचना!

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  5. बहुत दर्द हैं कविता में

    पर अभिशापित तो मत कहिये

    वो बहुत सुन्दर भी होती हैं ------ पहाड़ की औरते

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  6. एक शिक्षिका की नज़रों से आपने पहाड़ी औरतों का सही विश्लेष्ण किया है!मैंने भी अक्सर उन्हें देख कर ऐसी ही कल्पना की थी,उनकी आँखें हमेशा कुछ कहती सी प्रतीत होती है...अच्छी रचना!!!

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  7. दुखद सत्य को उकेरती प्रभावशाली रचना को रचने के लिए बहुत-बहुत बधाई

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  8. शेफ़ाली जी,
    सच है कि पहाड़ की औरते दिन रात खटती है,
    गृहस्थी के जंजाल मे, पुरे घर की जिम्मेदारी इनके कंधों पर ही होती है।
    देखा और अनुभव किया है मैने।

    पीर को उजागर करती कविता
    आभार

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  9. पहाड़ की स्त्रियाँ इसलिए उदास सी होती है,
    क्योंकि
    पीठ पर अपनी पहाड़ जैसी जिन्दगी ढोती है !

    बढ़िया रचना के लिए बधाई !

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  10. सभी स्त्रियों की जिन्दगी कठिन होती है, पहाड़ की शायद और कठिन होती है।
    मैं उत्तराखण्ड की कल्पना इज्राइल जैसे सशक्त राष्ट्र/राज्य के रूप में करता था/हूं। मेहनत और श्रम की कमी नहीं है। संसाधन तो उद्यमिता से जन्म लेते हैं।
    कमी है तो शायद ऑंत्रेपिन्योरशिप की है।
    मैने आज अपनी पोस्ट में कच्छ में काम कर रही महिलाओं और "सेवा" के प्रॉजेक्ट्स का लिंक दिया है। कुछ वैसा ही चाहिये उत्तराखण्ड में।

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  11. यह कविता हकीकत का दस्तावेज है, पहाड़ की औरत पर।

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  12. नारी है इस देश की राष्ट्रपति,
    क्या चंपा का घर में अपमान बंद हो गया है,
    क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...

    शेफाली बहना, बहुत खूब कहने की मेरी आदत नही है, लेकिन आज तुम्हें पढ़ने के बाद मेरे मन में क्या भाव है, बस खुद ही समझ लेना...

    @विजय तिवारी 'किसलय' जी
    शायद क्या, सार्थक लेखन का इससे भी ऊंचा और कोई पैमाना हो सकता है क्या...

    जय हिंद..

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  13. 20 years back even i felt the same way....now the situation has changed a lot..

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  14. बहुत मार्मिक लिखा है।
    पहाड़ गए युग बीत गए हैं। कल फिर बुलावा आया था। यदि जा पाती तो देखती कि काकी का जीवन अब कैसा है। अब लगभग मेरी ही उम्र की हो चुकी भाभियों को पहली बार देखना भी हो जाता।
    घुघूती बासूती

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  15. पहाड़ी स्त्रियों के दर्द को (जिस से शायद वे भी अनभिज्ञ हैं...क्यूंकि इसे ही वे जीवन मान बैठी हैं)....बड़ी अच्छी तरह शब्दों में पिरो दिया है.

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  16. सच्चाई का सामना करा दिया आपने । पहाड़ी औरतो की व्वथा का सही चित्रण किया आपने ।

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  17. शैफाली ! पहाड़ कि औरत का दर्द समेटा है तुमने ..वहां औरत सिर्फ घर ही नहीं संभालती बल्कि खेतों में भी वही काम करती है
    ..यानि कि सारा बोझ सिर्फ और सिर्फ औरत के ही कन्धों पर होताहै..

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  18. यह हाल इस देश की सारी ग्रामीण मेहनतकश महिलाओं का है .
    मुख्य कारण कुपोषण है

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  19. तीस की उम्र में पचास की लगती हैं
    पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं
    अच्छी रचना है।
    पसंद आई।

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  20. तीस की उम्र में पचास की लगती हैं
    पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं
    बहुत सच्चाई है इन बातों में ..

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  21. 30 years back I left hills, the journey is still on, I am also as well educated as any other phari women, get up early in the morning, work hard in the house, in my office and again back in my house. I have seen all the crests and falls in my work life. But am still moving ahead, probably it is the spirit of pahari women which gives me strength to climb the hill despite falling again and again. You have really written a beautiful poem. Congratulations from all pahari women to you.

    Vasudha Joshi

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  22. अपने आस पास को पढ़ना और उसे बेबाकी से लिखना तो फिर भी आसान है मगर कविता में ढालना बहुत कठिन।आपने पहाड़ की औरतोँ का ज़िन्दगीनामा बखूबी लिखा।बधाई!
    omkagad.blogspot.com

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  23. आपकी कविता एक लाजवाब कविता है। जो भाव आप पाठक के मन में पैदा करना चाहती हैं वह मन भर के पैदा होता है। कम से कम मेरे मन में तो ऐसा ही हुआ। बस एक लाइन चुभ गयी जिसमे आपने लिखा है " देवभूमि को मिला अभिशाप लगती है " । यह समझ नहीं आया? पहाड़ की औरत कभी अभिशाप नहीं हो सकती । चलिए अपनी इस बात को संतुलित करने के लिए पहाड़ की स्त्री के रूप सोंदर्य पर भी एक कविता लिखने का प्रयास कीजिये जिसमे उनके गालोँ की लाली का वर्णन हो , उनकी बड़ी सी नथ का वर्णन हो, उनके रसीला गीतों का वर्णन हो। मैं शब्दों से चित्रण नहीं कर पाउगा बस मेरा भाव समझिये की आपकी कविता पढ़ कर मन थोडा सा उदास हो गया है इसको संतुलित करना है।

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  24. ज़िम्मेदारियों का पहाड़ जो होता है उन पर ।

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  25. पहाडी आैरतों का दर्द आपने सही बयां किया है। पहाड की सारी अर्थव्यवस्था वहीं चलाती है। पहाडी ढाल पर कमर पर बोझा लेकर चलना उन्ही के बस की बात है।पहाड के जवान ज्यादातर फोज में है,उनके पीछे घ्रर ग्रहस्थी आेर खेत को संभालना उन्ही के बूते की बात है।
    शानदार रचना के लिए बधाई

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  26. दिन बोझिल, रात उदास
    धुँआ बन उड़ गई हर आस
    भोर की किरण में रात की पदचाप लगती हैं


    बेहद अर्थवान रचना!!

    शीर्षक से ही कविता स्वर पा मुखर हो जाती है.

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  27. Oh ! Kya gazab rachana hai!Aksar maidani ilaqome rahne walon ko pahadi sundarta ke bareme galat fehmiyan hoti hain..

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  28. तीस की उम्र में पचास की लगती हैं
    पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं
    ...sach mein pahad jitne sundar dikhte hain pahadon mein jeene waalon kee jindagi bhi pahad se ho jaatee hai....
    Auraton ko ghar-pariwar ka achha saath mile to yah udasi kaafi had tak door ho sakti hai.... kaash aisa ho paata...
    Aapka abhaar

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  29. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  30. कड़ी मेहनत,सूखी रोटियाँ
    इस माटी की,ये बहू बेटियाँ
    नियति का किया मज़ाक सी लगती हैं.

    रचना बहुत अच्छी हो सकती थी मगर आपने इतने से ही संतोष कर लिया.फिर भी बधाई !!

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