शुक्रवार, 23 जून 2017

आमदनी और सफाई ; एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

मेरी ज़िंदगी में ऐसे कई लोग आए, जिनके व्यवहार के आधार पर मैंने कुछ सूत्रों और कहावतों का निर्माण किया है | इन सूत्रों में से एक सूत्र यह रहा - ''ज्यों - ज्यों इंसान की आमदनी बढ़ती जाती है त्यों - त्यों उसके घर में होने वाली सफाई का ग्राफ भी बढ़ता जाता है''| 

इस सूत्र को मैं एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करूंगी | 
  
बहुत साल पहले मेरी एक सहेली हुआ करती थी | तब वह मेरे जैसी निम्न वर्गीय थी | हफ्ते में दो बार झाड़ू और एक बार पोछा लगाया करती थी | उसके घर में चप्पल - जूते पहिनकर कहीं भी घूम सकते थे | मैं उस बेतरतीब, बिखरे हुए घर में जब भी जाती थी, कपड़ों के ढेर को हटाकर अपने बैठने के लिए स्वयं जगह बनाती थी | वह हंस कर कहती थी, ''जगह तो दिल में होनी चाहिए ''| दिल की बात पर भला कौन सहमत नहीं होगा | 

ऐसे ही एक बार उसके बिस्तर पर रखे हुए कपड़ों के ढेर को सरकाकर, बैठे हुए हम दोनों दुनिया जहान की बातें कर रहे थे | गलती से बिस्तर का गद्दा मुझसे सरक गया | मैंने उसे ठीक करने की कोशिश करी तो क्या देखती हूँ गद्दे के नीचे पूरा एक लोक बसा हुआ है | मुझे देश के वैज्ञानिकों पर तरस आया कि वे बिला वजह चाँद और मंगल पर रहने की जगह ढूंढ रहे हैं अगर उन्हें इस गद्दे के नीचे की दुनिया का दीदार करवा दिया जाता तो वे अपने अन्य ग्रहों पर जीवन ढूंढने के अभियान को तिलांजलि दे देते |  

उस गद्दे के नीचे किताबें, अखबार, ज़रूरी कागज़, होम्योपैथी की खाली शीशियां, दवाई के रेपर, पुरानी चिट्ठियां, महिलाओं की पत्रिकाएं, शादी के कार्ड, कपडे, मोज़े, चम्मचें, सुई धागा, बिजली - पानी के बिल, लिपस्टिक, पाउडर, बिंदी, रूमाल, पर्स, कैसेट, कंगन, कटे हुए नाखून, बालों के गुच्छे, पॉलीथिनों का ढेर जो तकिया होने का भरम दे रहा था, इसके अलावा भी कई वस्तुएं थीं जिन्हें मैं एक नज़र में नहीं देख पाई | मैंने इतने दिव्य दर्शन से घबराकर गद्दा वापिस ठीक से लगा दिया और उसके ऊपर बैठ गयी | दोस्त को कोई फर्क नहीं पड़ा | वह हँसती रही | मैंने मन ही मन अपनी दोस्त को प्रणाम किया उसके गद्दे को नमन किया जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में समेटे हुए था | 

उनके घर में मक्खी - मच्छर, मकड़ियों के बड़े - बड़े जाले, काक्रोच ,चूहे, छुछुंदर, खटमल सारे कीट - पतंगे वसुधैव कुटुम्बकम वाले भाव से रहते थे | सब के सब उनके स्नेह की डोरी से बंधे हुए रहते थे | इनमे से किसी की भी हत्या उसे पाप लगता था | '' इस दुनिया में सबको रहने का अधिकार है'', यह उसका प्रिय वाक्य था |   

उसका घर मुझे बहुत प्यारा था | उस घर का कोना - कोना अतिथियों का स्वागत करता सा लगता था | उन बेजान दीवारों से स्नेह टपकता था और छत से अपनत्व की बरसात | जब भी वहां जाना होता था वह मिन्नतें करके दो - तीन दिन रोक ही लेती थी | 

उसकी रसोई भी एक नमूना थी | रसोई के अधिकतर डिब्बे ढक्कन विहीन होते थे | डिब्बों में इतनी चिकनाई लगी होती थी कि हाथ से पकड़ते ही फिसल कर नीचे गिरने का डर रहता था | कहीं आटा बिखरा रहता था तो कहीं सब्जियों के छिक्कल पड़े रहते थे | मसाले के डिब्बे में सारे मसाले एक - दूसरे से मिलकर ''मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा'' गाते थे | एक कटोरी निकालो तो दो गिलास नीचे गिर जाते थे | कपों में दरारें पडी होती थीं, किसी - किसी का तो हैंडल ही नहीं होता था | पूरी रसोई में कहीं किसी किस्म का कोई पर्दा नहीं | कोई दुराव - छिपाव नहीं | है तो सामने है, नहीं है तब भी सामने है | 

उसके घर जाओ और खाली नमकीन, बिस्किट खाकर आ जाओ ऐसा कभी नहीं हो सकता | अपनी बिखरी, गंदी, धूल - धक्कड़ से भरी हुई रसोई में जब वह जाती थी तो आधे घंटे के अंदर दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, रायता, चटनी, सलाद ,खीर के साथ ही बाहर आती थी | खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि पेट ही नहीं भरता था | पेट भर जाने पर भी वह ठूंस - ठूंस कर पेट के फटने तक खिलाती रहती | घर के लिए मिनटों में बिना बताए डिनर भी पैक कर के हाथ में थमा देती थी | 

उस खाने की ख़ास बात यह होती थी अगर उसे बनते समय देख लिया तो एक कौर भी मुंह के अंदर नहीं जाएगा | अगर कोई गलती से खाना बनाने के दौरान उनकी रसोई में चला जाता था तो उसे लगता था कि अभी- अभी कोई सूनामी यहाँ से होकर गुज़री है | सारे बर्तन एक दूसरे से टकराए हुए इधर - उधर गिरे पड़े रहते थे | कॉकरोच यहाँ से वहाँ रेस लगाते थे | नाली में पानी जमा होकर आस - पास के इलाके तक फ़ैल जाता था | उस पानी में कई जीव - जंतु विचरण करते दिख जाते थे | गैस का चूल्हा पहचानना मुश्किल होता था | 

उस खाने में स्नेह था | गंदगी दिख कर भी महसूस नहीं होती थी | वे दिन बहुत प्यारे थे | 

कुछ समय बाद हमारा दूसरे शहर में स्थानांतरण हो गया | वह उसी शहर में रही | 

उसका समय बदला | भाग्य ने करवट ली | उनके पति का प्रमोशन होता गया | पद बढ़ते गया | घर में लक्ष्मी छप्पर फाड़ कर ही नहीं दीवारों को लांघ कर, खिड़कियों, रोशनदानों और दरवाज़ों को तोड़ कर घर - आँगन में प्रवाहित होने लगी | 

हर प्रमोशन के साथ मेरी मित्र का सफाई का शौक बढ़ता गया | घर में कई नौकर - चाकर आ गए | सुबह, दिन, शाम यहाँ तक की रात को भी डिटॉल वाला पोछा लगने लगा | काम वालियों को दिन में दो बार डस्टिंग का आदेश दे दिया गया | वह स्वयं मेज़ पर हाथ फिर कर धूल चैक करती थी | धूल का एक भी कण अंगुली में चिपका तो समझो क़यामत आ गयी | गुस्से के मारे वह बौखला जाती | पागलों जैसा बर्ताव करने लग जाती | 

झाड़ू - पोछे की क्रिया के दौरान घर वालों की हर किस्म की क्रिया पर बैन लग जाता था | पोछे के पाने में ज़रा सी गन्दगी देख कर उसका ब्लड प्रेशर हाई होने लग जाता था और चीखने की आवाज़ पूरे घर में गूँज जाती थी | काम वालियों को दोबारा नहा कर ही घर के अंदर घुसने का आर्डर था | घर का कोना - कोना बैक्टीरिया प्रूफ हो चुका था | लिपस्टिक, पावडर के डिब्बे तक रोज़ डिटॉल से धुलने लगे | 

भूले से भी कोई मय चप्पलों के अंदर नहीं आ सकता | आगंतुकों के लिए डिटॉल से धुली चप्पलें दरवाज़े के बाहर रखी रहती थी | 

खुलकर हंसना में भी उन्हें खटका लगा रहता था की कहीं बैक्टीरिया अपने दल - बल समेत आक्रमण न कर दे |  

किसी के खांसने व छींकने भर से उसे वायरल का खतरा मंडराता दिखता था | 

उसकी समृद्धि और सफाई के चर्चे इधर - उधर से कभी - कभार सुनाई दे जाते थे | मन में उससे मिलने की उत्कंठा ने एक दिन बहुत ज़ोर मारा और मैं पुरानी दोस्ती को याद करके मैं उससे होली मिलने चली गयी | मैंने हाथों में गुलाल लेकर उसके गाल में मलना चाहा तो उसे करंट मार गया, ''छिः छिः यह क्या कर रही हो ? सब जगह गन्दा हो गया', अब फिर से सारी सफाई करनी पड़ेगी'' | मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया | मैं ''सॉरी- सॉरी कहकर पीछे हट गयी | 

वह इतना गुस्सा हो गयी कि सामान्य शिष्टाचार तक भूल गयी और दनदनाती हुई घर के अंदर चली गयी | मैं अपराधिनी की तरह सिर झुकाए हुए उलटे पैरों लौट गयी | 

सुनती हूँ कि उसके बच्चे दीपावली में पटाखे नहीं जला सकते | दिए जलाना उन्होंने कब का छोड़ दिया क्योंकि इससे उनके बेशक़ीमती फर्श पर गंदगी हो जाती है | होली पर गेट के बाहर ताला लगाकर वे सपरिवार अंदर बैठ कर टी. वी. देखते हैं | 

उसके दोस्त या रिश्तेदार उसकी शान - औ - शौकत, धन - दौलत इत्यादि बात से प्रभावित होकर उसके घर आना चाहते हैं, रुकना चाहते हैं, पर वह किसी को रोकने की तो छोड़ ही दो आधे घंटे से अधिक अगर वह बैठ गया तो स्वयं अंदर चली जाती है | 

अब उसके बिस्तर गद्दे को उठाना तो दूर कोई उस पर बैठ भी नहीं सकता | 

घर जाने पर अब चाय ही मिल जाए तो अहो भाग्य समझो | बेशक अलमारी में सजी हुई बेशकीमती क्रॉकरी आप देख सकते हैं, सराह सकते हैं पर उस पर कुछ परोसा जाएगा यह सोचना मूर्खता होगी |  

वह गर्व से सबको बताती है कि मेरे घर का फर्श इतना चमकता है कोई अपना चेहरा देख सकता है, लेकिन लोग हैं कि उसके घर उसके फर्श पर अपना चेहरा देखने जाते ही नहीं | 

वह अमीर घर के लोगों से मेल - जोल बढ़ाना चाहती है लेकिन वे लोग उसे घास नहीं डालते | वे लोग उस से मिलते ही याद दिलाते हैं '' तुम्हे याद है तुम पहले कैसे रहती थी ? अब तुम्हारे दिन कितने बदल गए हैं, सच ही कहा गया है कि घूरे के भी दिन फिरते हैं ''| घूरा सुनकर उसके माथे पर बल पड़ जाते हैं | 

वह बहुत परेशान रहती है | पुराने लोगों को भूल जाना चाहती है लेकिन पुराने लोग उसे नहीं भूलते | 

वह उन गरीबी के दिनों दिनों को भूल जाना चाहती हैं लेकिन अमीर लोग उसे भूलने नहीं देते |   


मंगलवार, 20 जून 2017

गर्म फुल्का ---- लघु कथा


आज चौथा दिन है जब मधु बिना रोटी बनाए सो गयी | रोज़ - रोज़ ब्रेड खाकर पेट नहीं भरा जा सकता | मानता हूँ कि वह भी नौकरी करती है और मेरे बराबर तनख्वाह पाती है, लेकिन वह अकेले ही तो नौकरी नहीं करती | कई औरतें नौकरी करती हैं और घर का काम भी करती हैं | बच्चे भी संभालती हैं | अभी तो हमारा बच्चा भी नहीं है | बच्चा होने के बाद कैसे मैनेज करेगी मधु ? 

रात नौ बजे ही उनींदी हो जाती है मधु | कहती है, सब्जी बन गयी है जब रोटी खानी हो तो उठा देना | गर्म - गर्म फुल्के सेंक दूंगी | फिर घनघोर नींद में डूब जाती है | अब उसे नींद से कैसे उठाऊं ? इतनी मासूम लगती है सोते हुए | एकदम किसी छोटे बच्चे की तरह | उसको उठाना पाप लगता है | रोज़ - रोज़ भूखा भी नहीं सोया जाता | मधु तो ऑफिस से आकर ही खाना खा लेती है फिर रात को कुछ नहीं खाती | उसका मानना है कि दिन ढलने तक भोजन कर लेना चाहिए इससे खाना अच्छी तरह पच जाता है | मैं ऐसा नहीं कर सकता | मुझे दस बजे से पहले भूख ही नहीं लगती | 

आज बात करनी ही पड़ेगी चाहे इसके लिए मुझे उसे नींद से ही क्यों न उठाना पड़े | मैंने कब चाहा कि मुझे खाने में गर्म फुल्का ही चाहिए ? मैं तो बस पेट भरना चाहता हूँ फिर चाहे फुल्का गर्म हो या ठंडा | क्या फर्क पड़ता है ? मैं कई बार कह चुका हूँ कि रोटी बनाकर सोया करो लेकिन उसकी वही ज़िद ''गर्म फुल्का सेंक दूंगी, उठा देना''| जानती है वह कि मैं नहीं उठाऊंगा फिर भी कहती है | 
 
इससे तो पापा का ठीक रहा | मनपसंद खाना न मिलने पर थाली पटक देते थे | माँ दोबारा खाना बनाती थी | पापा की इस गंदी आदत को देखकर मैंने बचपन से ही यही निश्चय कर लिया था कि खाने के लिए कभी अपनी पत्नी को तंग नहीं करूँगा | लेकिन अपनी इस अच्छी आदत से मुझे क्या मिला ? पिछले चार दिनों से बिना रोटी के सब्जी खा रहा हूँ | ऐसा हफ्ते में तीन दिन तो होता ही होगा | ऑफिस में सब पूछते हैं कि क्या बात है बहुत सुस्त लग रहे हो ? मैं फीकी सी हंसी हंस देता हूँ | 

नहीं ! मुझे नहीं चाहिए इसकी नौकरी | इतनी तनख्वाह तो मुझे मिलती ही है कि घर का खर्च चला सकूं | नहीं रहेंगे शान - शौकत से | नहीं खरीदेंगे अपना घर, गाड़ी | इनके बिना क्या लोग दुनिया में रहते नहीं हैं ? हम भी रह लेंगे |  

''मधु ! उठो मधु ! मुझे तुमसे बहुत ही ज़रूरी बात करनी है''|   
मधु ने आँखें मिचमिचाई | 
''ओह ! तुम हो | क्या बात है ? खाना खा लिया ''?
''नहीं ! तुम फुल्के .... ''| 
''ओह ! सॉरी डार्लिंग ! मैं फुल्के नहीं बना पाई | क्या करूँ ? इतना थक जाती हूँ कि बिस्तर देखते ही नींद आ जाती है | बस में बैठे - बैठे पैरों में इतना दर्द हो जाता है कि उठा ही नहीं जाता | मन करता है कि छोड़ दूँ ऐसी नौकरी को''| 
''चलो जाने दो | रात को खाना न भी खाया तो कोई हर्ज़ नहीं | तुम अपने पैरों का इलाज कराओ | अभी से इतना दर्द होना ठीक नहीं ''| मैं क्या कहना चाहता था और क्या कह रहा था | 
''हाय मेरे तलवे'' मधु ने लेटे -लेटे ही अपने पैरों की अंगुलिया घुमाई | 
''लाओ मैं दबा देता हूँ '' मेरे हाथ अपने आप ही उसके तलवों की ओर बढ़ गए | 
'' तुम कितने डार्लिंग हो यार ''| मधु बड़बड़ाई और थोड़ी ही देर में घुर्र - घुर्र करके सो गयी | 
'' गर्म फुल्का ..... '' मैं बड़बड़ाता हूँ | 

सोमवार, 19 जून 2017

पिता तुम्हारा साथ --- [नौ साल पहले पन्नों पर उतारे गए लफ्ज़ अब की बोर्ड के हवाले ]


माता - पिता की मृत्यु के पश्चात उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने के रिवाज़ का पालन तो सारी दुनिया करती है परन्तु मेरा मानना है कि अगर जीते जी हम उन्हें उनके स्नेह, वात्सल्य, संरक्षण एवं त्याग के लिए कृतज्ञता अर्पित करें तो उनका शेष जीवन शायद चैन से बीतेगा | 
आज लगभग पांच या छह वर्षों से लगातार [ अब नौ साल और जोड़ दीजिये - स्थिति वही की वही ] वैवाहिक जीवन के झंझावातों को झेलने के उपरान्त जब मैंने हाथ में कलम उठाई तो सबसे पहले अपनी नई ज़िंदगी लिए अपने पिता को धन्यवाद देने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई और मैं अपने रोम - रोम से लिखती चली गयी | 

मेरे पिता, रिटायर्ड विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग |  त्याग, समर्पण, कर्तव्य निर्वहन की जीती - जागती मिसाल हैं | उनका सम्पूर्ण जीवन सादगी व् ईमानदारी का अनूठा व अनुपम उदाहरण है | कोई अजनबी उनसे पहली बार मिलने पर आश्चर्य से ठगा रह जाता है | मुझे याद है कुछ साल पहले पापा को किसी कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने हेतु आमंत्रित करने के लिए एक सज्जन हमारे घर आए | पापा के कई बार विश्वास दिलाने पर कि वे ही प्रो हरि कुमार पंत हैं, तब जाकर उन सज्जन ने पापा को आयोजन का निमंत्रण पत्र सौंपा | पापा का ऐसा ही व्यक्तित्व है | कृष काय शरीर, सूखा, पिचका चेहरा, खिचड़ी बाल, बढ़ी हुई दाड़ी, पुराने रंग उड़े बेमेल कपडे, बिवाई पड़ी हुई एड़ियां, उस पर हाथ से जगह - जगह से सिली हुई घिसी हुई चप्पलें | किसी के लिए भी विश्वास करना मुश्किल होता | पापा के समकालीन प्रो जहाँ सूट - बूट में लकदक, महंगी गाड़ियों में सवार एवं चमचमाते चेहरे वाले होते वहीं पापा इस मूल्यहीन, स्वार्थी और दिखावटी जमात से एकदम अलग | अक्सर हमें टोकते रहते हैं, '' क्यों कपड़ों की दौड़ में शामिल होते हो ? इसका कहीँ कोई अंत नहीं मिलेगा | कपडे किसी के व्यक्तित्व का आईना कभी नहीं बन सके ''| 

जहाँ तक पापा की विद्व्ता का प्रश्न है हम बच्चे जिससे भी कहते हैं कि हम ' हरि कुमार पंत उर्फ़ होरी' के बच्चे हैं, तुरंत यही सुनने को मिलता है '' तुम्हारे पापा बहुत विद्वान व्यक्ति हैं''| साथ ही यह भी सुनते थे कि वे अपने जवानी के दिनों में बहुत अप - टू - डेट रहते थे | उनके ऊपर उनकी कई शिष्याएँ जान छिड़का करती थीं | अब यह समझ में आता है कि शायद पापा ने अपने बच्चों के अंदर सादगी का संस्कार भरने के लिए ही अपने व्यक्तित्व को इस सांचे में ढाला होगा | 

पापा, गोदान के नायक ' होरी ' की तरह ऐसे इंसान हैं, कठोर परिश्रम ही जिसकी ज़िंदगी का एकमात्र उद्देश्य है | आज तिहत्तर [अब बयासी ] वर्ष की उम्र में जहाँ भी जाते हैं पैदल ही जाते हैं | बस कहने भर की देर होती है, ''पापा मेरा फॉर्म जमा करना है या फलाने बैंक का ड्राफ्ट बनवाना है', कड़कती धूप की उन्हें परवाह नहीं होती न घनघोर बारिश की फ़िक्र | किसी भी गाड़ी की सवारी बनना उन्हें पसंद नहीं | लोग उन्हें ' कंजूस, मक्खी चूस' जैसी अन्य कई उपाधियों से समय - समय पर अलंकृत करते रहे, लेकिन उन्हें किसी ताने का कोई फर्क नहीं पड़ा | आज लगता है कि पापा हम बच्चों से कहीं ज़्यादा स्वस्थ हैं | मेरे घुटने तैंतीस [अब बयालीस] की उम्र में दर्द [ अब तीव्र ] करते हैं, बहिन की सीढ़ियां चढ़ने में सांस फूलती है, भाई को चक्कर आने का रोग है तो माँ डाइबिटीज़ व हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से ग्रसित है | कभी - कभार 104 डिग्री बुखार आने पर भी मात्र एक पैरासीटामोल की गोली और कई गिलास गर्म पानी पीकर स्वयं को स्वस्थ कर लेते हैं पापा | आराम करने को कहा जाए तो टका सा जवाब मिलता है '' मुझे अपाहिज मत समझो'|
 
एक क्षण को भी फ़ालतू बैठना या गप्पें मारना पापा को पसंद नहीं है | उनके हाथों को हमेशा कुछ न कुछ करते रहने की आदत है | वाशिंग मशीन के होते हुए भी अपने कपडे अपने हाथ से धोते हैं | कामवाली बाई है लेकिन मौका मिलते ही जूठे बर्तन धोने जुट जाते हैं | झाड़ू लगा देते हैं | काम वालों के लिए ज़्यादा काम न हो जाए इसका वे बहुत ख्याल रखते हैं | समाज के निचले तबके के लोगों के प्रति उनका स्नेह जग - जाहिर है | सुरेंद्र प्रेस वाला, राजन पान वाला, बबलू नाई उनके परम मित्र हैं | ये लोग दोस्ती के बहाने पापा से अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश नहीं करते शायद इसीलिए उनके आत्मीय हैं | इसके विपरीत कोई उच्च पदस्थ रिश्तेदार या परिचित उनसे मिलने घर आता है और अपने पद या शक्ति की डींग हांकता है तब पापा बिना कोई लिहाज़ किए बैठक से उठ कर चले जाते हैं और दोबारा अंदर नहीं आते | कारण पूछने पर हंसकर कहते हैं, '' मैं अगाथा क्रिस्टी की तरह आदमी के दिमाग में बैठ जाता हूँ और जान जाता हूँ कि कौन किस मकसद से आया है''|

पापा अपने कर्तव्य पालन में कभी पीछे नहीं हटे | मुझे याद है जब माँ के पैर में फ्रेक्चर हुआ था और वह दैनिक निवृत्ति विशेष प्रकार की कुर्सी में करती थी जिसमे पॉट बना होता था | एक दिन वह पॉट टॉयलेट में ले जाकर मुझे साफ़ करना पड़ा तो पूरा दिन उबकाई आती रही | उसके बाद माँ ने मुझे कभी नहीं आवाज़ दी | पापा तुरंत उस पॉट को टॉयलेट ले जाकर बिना किसी परेशानी के साफ़ कर देते | बाद में मैंने स्वयं को बहुत धिक्कारा पर पापा ने यह कहकर मुझे उस पॉट को हाथ नहीं लगाने दिया '' यह मेरा कर्तव्य है | मैं तेरी माँ का जीवन साथी हूँ | अगर मुझे कुछ होता तो यह कार्य तेरी माँ कर रही होती'' | यहाँ तक कि मेरी नन्ही बेटी नव्या [ अब तेरह साल ] भी मेरी अनुपस्थिति में पापा को ही आवाज़ लगाती है,'' नानाजी पॉटी कर ली, धुला दो''| 

बचपन से ही हम तीनों भाई - बहिनों को पापा की यह बात बहुत ही खराब लगती थी कि वे हमें जेब खर्च नहीं देते थे | हमारे कई मित्र लोग हमसे निम्न आर्थिक स्टार के होते हुए भी खूब चाट - पकौड़ी खाते और सैर - सपाटा करते | हम लोग अपना मन मसोस कर रह जाते और पापा को कोसने का कार्यक्रम सामूहिक रूप से करते | पापा का उदार चेहरा हमने तब देखा जब हमारी नानी दुर्घटनावश जल कर अस्पताल में भर्ती हुई | उस समय पापा ने पैसे खर्च करने में अपने उदार ह्रदय का परिचय दिया और तब भी जब मुझ पर विवाहोपरांत परिस्थितिजन्य आर्थिक विषमताओं ने आघात किया था | ससुराल में बीमार सास, पति द्वारा नौकरी छोड़ना, उस पर गर्भ में जुड़वां बच्चे | किसी को भी मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देने के लिए काफी था, परन्तु जब - जब मुझे ज़रुरत पडी उन्होंने अपना रक्त - संचित धन देने में कतई संकोच नहीं किया | 
भाई, जो पापा की कंजूसी का अक्सर अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों के बीच मज़ाक उड़ाया करता था, एक दुर्घटना के चलते कई दिनों तक महंगे प्राइवेट अस्पताल में भर्ती रहा, तब जाकर पापा के दृष्टिकोण को सही ढंग से समझ पाया | अब उसे भी पैसों के मामले में पापा के नक्शेकदम पर चलते देखकर बहुत प्रसन्नता होती है |  
   
माँ से ऊंची आवाज़ में बात करना या उसका अपमान करना पापा ने कभी गवारा नहीं किया | माँ के प्रति उनके मन में जो प्रेम है उसकी कोई सीमा नहीं | हम बच्चों के सामने ही पापा अक्सर माँ को '' डार्लिंग'' कहकर सम्बोधित करते हैं | '' यह मेरे जीवन की धुरी है | ये न होती तो मेरा पता नहीं क्या होता ''| पापा से यह सुनकर मेरे भाई 'रोहित' की पत्नी 'पंकजा' उससे अक्सर कहती है '' तुम अपने पापा से क्यों नहीं सीखते पत्नी को प्यार करना ''| 

माँ का बताया छोटे से छोटा काम करने को पापा हमेशा तत्पर रहते हैं | मैं कभी - कभी झल्ला कर माँ से झगड़ उठती, ''तुम पापा को इतना क्यों दौड़ाती हो ''? पापा के चेहरे पर शिकन का नामोनिशान तक नहीं मिलता | एक छोटा सा वाक्य हमारी बहस की इतिश्री कर देता,''ये गृहस्थी के प्रति मेरे कर्तव्य हैं बेटा ''|  
 
पापा के अंदर भरे हुए धैर्य को देखकर कभी - कभी हमें कोफ़्त होने लगती है | कभी कोई अर्जेन्ट काम के आ जाने पर भी पापा अपना काम पूरा करके ही उठते हैं | परन्तु इसी धैर्य के चलते वे किसी भी रस्सी या ऊन पर पडी बड़ी से बड़ी गांठों को बिना किसी परेशानी के घंटों तक बैठकर सुलझा लिया करते हैं | ग्रामर का कोई सूत्र समझ में न आने पर तब तक समझते रहते हैं जब तक कि वह दिमाग में अच्छी तरह से घुस नहीं जाए | पापा का यह धैर्य चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न हों, हमेशा उनके साथ रहता है | कभी रात को जब हम भाई - बहिनों को घर लौटने में देर हो जाती थी तो माँ चिंता में व्याकुल हो उठती थी, पर पापा का चित्त एकदम स्थिर होता, ''अभी आ जाएंगे लौट के, चिंता मत करो'' | 

पापा के इस धैर्य का एक और उदाहरण हमने तब देखा, जब उन्हें पेंशन व फंड मिलने में ढाई साल लग गए, उस पर उनको कई हज़ार रुपयों का नुकसान भी उठाना पड़ा परन्तु उन्होंने सरकारी बाबुओं को रिश्वत देना उचित नहीं समझा | उन्होंने हमसे यही कहा, ''अपने खून- पसीने की कमाई को लेने के लिए मैं रिश्वत का सहारा नहीं लूंगा''| उन ढाई वर्षों की आर्थिक तंगी ने हम तीनों भाई - बहिनों को आत्मनिर्भर होने की तरफ अग्रसर किया | वह तंगी हमने न झेली होती तो शायद हम जीवन - संग्राम में संघर्ष करना सीख न पाते |  
  
पापा ने हमें ऐशो - आराम से भरपूर ज़िंदगी भले ही न दी हो परअपने स्नेह व वात्सल्य से हमेशा सराबोर रखा | नकचढ़ी, गुस्सैल व् ज़िद्दी होने के कारण बचपन में कई बार मैं बिना खाना खाए सो जाती तो पापा मुझे घंटों तक मनाते रहते और हाथ में खाने की थाली पकडे खड़े रहते थे | जब तक मैं खाना न खा लूँ, सामने से हटते नहीं थे, कहते, ''अगर मुझसे गुस्सा हो तो मुझे चाहे जितने घूंसे मार लो, पर खाना मत छोडो''| जाड़ों में बच्चों को  ज़ुकाम या बुखार न हो जाए इसके लिए वे हमें अपने हाथों से शहद और बादाम खिलाते थे |

''तुम तीनों मेरे कलेजे के टुकड़े हो '' | ऐसे मौकों पर यह उनका प्रिय वाक्य होता | हम तीनों को रोज़ रात को कहानियां सुनाना, अंगुली पकड़कर सैर पर ले जाना, हमारे साथ हमारे खेलों में शामिल होना उन्हें बहुत अच्छा लगता था | पहली - पहली बार जब मैं एम.एड.करने के लिए घर से निकल कर हॉस्टल रहने के लिए गयी तब माँ बताती है कि पापा ने उस रात खाना नहीं खाया और उनकी आँख में आंसू भी थे | वे बार - बार कह रहे थे,'' इतनी ठंड में अल्मोड़ा कैसे रहेगी बेचारी ''?    

न केवल अपने पत्नी, बच्चों वरन छोटे - छोटे जानवरों पर भी समय - समय पर उन्होंने अपना स्नेह - सागर उड़ेला | एक बार हमारे घर में एक बिल्ली अपने दो बच्चों को छोड़ कर चलेगी | हमने उन्हें भागने की बहुत कोशिश करी पर असफल रहे | उन्हें पालना हमारी मज़बूरी बन गयी | जब उन्हें पाला तो वे भी हमारे घर का एक हिस्सा बन गए | बिल्ली को ''छम्मो '' और बिल्ले को ''फुल्लो '' नाम दिया गया | पापा दोनों को अपनी थाली के पास बैठाकर खिलाते | उन बच्चों के दांतों को चबाने में कष्ट न हो इसके लिए रोटी के टुकड़ों को अच्छी तरह मसलकर उनके आगे रखते | बाद में बड़े - बड़े बिल्ले उन बच्चों को मारने के लिए घर के चक्क्र काटने लगे तो पापा उनकी रखवाली किया करते थे | घर में उनकी सुरक्षा के लिए ग्रिल व्  दरवाज़े भी पापा ने लगवाए | 

पापा ने अपनी जीभ की गुलामी कभी स्वीकार नहीं करी | माँ, खाने - खिलाने की शौक़ीन होने के कारन अक्सर उनसे पूछती,'' कैसा बना है खाना ''? पापा का सपाट उत्तर होता,''खाने के बारे में इतनी बातें करना ठीक नहीं है |  जीने के लिए खाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना चाहिए''| हम लोगों द्वारा खाने में पड़े नमक, मिर्च सम्बन्धी शिकायत करना भी पापा को सख्त नापसंद था | पापा खाने - पीने के लिए कभी किसी की दावत या शादी - ब्याह में शामिल नहीं हुए | घर पर रहकर दो रोटी नमक के साथ खाना उन्हें अच्छा लगत है | इकलौते पुत्र के विवाह के अवसर पर जहाँ लोग लड़की वालों को खसोटना अपना परम धर्म समझते हैं,पापा ने खाना तक नहीं खाया | दान - दहेज़ लेना तो दूर की बात है |  

मेरा विवाह जब तय हुआ था तो मेरे पति उच्च पद पर बहुराष्ट्रीय बैंक में कार्यरत थे | बिना किसी दान - दहेज़ के मेरा विवाह संपन्न हुआ था | विवाह पूर्व मेरी दोनों ननदें, जो मेरे पति से बड़ी थीं, विभिन्न विषयों पर मेरी राय जानने व अपने घर - परिवार से अवगत कराने हेतु मुझसे मिलने आई थीं | पापा से जब उन्होंने पूछा कि उन्हें कैसे दामाद की अपेक्षा है ? पापा ने बस इतना ही कहा, ''लड़की को दो रोटी खिलाने वाला होना चाहिए बस''|  ननदें, जो उच्च पदों पर आसीन थीं, आश्चर्य करने लगी,'' क्या सिर्फ दो रोटी खाने तक ही इंसान की ज़िंदगी सीमित होती है ?इसके आगे क्या कुछ नहीं चाहिए ? यह तो पशुवत जीवन के सामान होगा ''|  

मेरे ससुराल में काफी समय तक पापा की दो रोटी वाली वाली बात हंसी - मज़ाक का केंद्र - बिंदु बनी रही | परन्तु विधाता के खेल को कौन जान सका है ? परिस्थितियों की मार से एक दिन ऐसा भी आया कि हमें दो रोटी के तक लाले पड़ गए | मुझे मायके वापिस आकर एक बार फिर से नौकरी ढूंढनी पड़ी | कुछ समय प्राइवेट नौकरी करने के बाद माध्यमिक शिक्षा में मेरी नियुक्ति हो गयी | प्राथमिक की सरकारी नौकरी मैं शादी से पहले छोड़ चुकी थी | अब दो रोटी का इंतज़ाम मैंने किया | कठिन से कठिन क्षणों में पापा के सदा संघर्षरत चेहरे को ध्यान में रखकर मैंने अपने अंदर नई ऊर्जा अनुभव की है | 

कभी - कभी मैं अपने पति से कहती हूँ, '' इंसान को हमेशा पापा की तरह ज़मीन पर खड़े होकर बात करनी चाहिए, हवा में नहीं ''| 

आज पापा ने मुझे, मेरे पति और बच्ची को अपने घर में आश्रय दिया हुआ है [ दस साल बाद पिछले वर्ष अपने स्वयं के घर में प्रस्थान ]| 
      
यह उनकी ही दी हुई हिम्मत है जो हम दोनों अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू कर रहे हैं  आर्थिक विपन्नता ने मुझे इतना तोड़ दिया था कि मौत और ज़िंदगी के बीच कुछ ही क़दमों का फासला रह गया था | [ लखनऊ में किराए के तिमंजिले मकान की छत से अपनी बेटी को लटका कर पता नहीं किस घड़ी में हाथ वापिस खींच लिया ] 
  
किसी ऐसे ही उदास दिन बहिन ने परसाई की किताब पकड़ाई | मैं उसे पढ़कर चमत्कृत हुई | दुःख का ताज उतार फेंका | अपने अवसाद के खजाने को छोड़कर बाहर निकली और तब से मैंने ज़िंदगी के ऊपर व्यंग्य करना शुरू कर दिया |
  
एक अंग्रेज़ी के प्रोफेसर को आपने कम ही 'कप' को 'प्याला' कहते सुना होगा | पर पापा ऐसे ही व्यक्ति हैं | कॉलेज, घर हो या बाहर उन्होंने कभी अपने अंग्रेज़ी ज्ञान या पांडित्य का प्रदर्शन नहीं किया | ' अंग्रेज़ी सिर्फ मेरी रोज़ी - रोटी है मेरी आत्मा नहीं '', कहकर वे अपने काम में जुट जाते हैं | 
अनावश्यक धन का अर्जन उन्होंने कभी उचित नहीं समझा | यही कारण है कि रिटायरमेंट के पश्चात कई लोग ट्यूशन के लिए पूछने आए तो पापा ने उन्हें विनीत स्वर में मना कर दिया | अपने पूर्व साथी के बेहद आग्रह करने पर संविदा में पढ़ाने के लिए खटीमा गए लेकिन छह महीने के बाद वापिस आ गए | पेंशन नहीं, फंड नहीं, तीनों बच्चे बेरोजगार |  हम चिढ़ जाते और कहते,'' पापा ट्यूशन ही कर लेते तो हम सब आराम से रहते''| पापा निरपेक्ष स्वर में कहते,''मैंने तुम लोगों को पढ़ा - लिखा कर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया अब अपने लिए स्वयं अर्जित करना सीखो'' |    

पापा ने कभी भी लड़का व लड़की में भेद नहीं किया अपितु भाई अक्सर यह शिकायत करता कि पापा हम बहिनों को ज़्यादा प्यार करते हैं |
 
पापा ने अपनी मर्ज़ी अपने बच्चों या अपनी पत्नी पर थोपना कभी उचित नहीं समझा | हम भाई - बहिनों ने जो चाहा, वह किया | जिसने जो विषय चुनने चाहे, चुनने दिए | परीक्षा के दिनों में भी कभी न सुबह पढ़ने के लिए उठाया न रात को पढ़ने के लिए बाध्य किया | मनचाहे कपडे पहिनने, सजने - संवरने, लड़कों से दोस्ती, उनके साथ घूमने - फिरने पर भी उन्होंने कभी एतराज़ नहीं किया | मेरे विवाहोपरांत सरकारी नौकरी छोड़ने जैसा कदम जो बाद में आत्मघाती सिद्ध हुआ या भाई द्वारा बी.एस.एफ़.की कठिन नौकरी चुनने पर भी उन्होंने आपत्ति नहीं दर्ज की | 

स्वयं शुद्ध शाकाहारी होते हुए, माँ व भाई द्वारा निरामिष भोजन पकाकर खाने पर पापा ने कभी नाक - भौं नहीं सिकोड़ी | 

पापा ने कभी भी माँ के साथ एक आम पति की तरह व्यवहार नहीं किया | पापा रिटायर्ड थे और माँ प्राइवेट स्कुल में पढ़ाती थी | माँ के सुबह - सुबह स्कूल चले जाने के बाद बिखरा हुआ घर समेटते थे | आज माँ भी रिटायर्ड है तब भी घर के हर छोटे - बड़े काम में बड़े मनोयोग से माँ का हाथ बंटाते हैं | सुबह उठकर बिस्तर लगाना, पूजा के लिए फूल लाना, छोटे - छोटे बर्तनों को धोना, दूध उबालना, कपडे सुखाना उनका नित्य का कर्म है | 

माँ बताती है कि जब हम छोटे थे तो पापा हमारे मल -मूत्र वाले कपडे धो देते थे | रिश्तेदार और पड़ोसी उन्हें देखते और 'जोरू का गुलाम '' कहकर हंसी उड़ाते | पापा ऐसे लोगों की परवाह करना जाया करना समझते थे | पापा सच्चे अर्थों में आधुनिक प्रगतिशील पुरुष कहे जा सकते हैं | 
कहने को पापा का जन्म उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ है लेकिन वे मूर्ति पूजा, मंत्रोचारण, धार्मिक कर्मकांडों में कभी नहीं उलझे | माँ के बहुत आग्रह करने पर कभी - कभी पूजा घर के सामने खड़े होकर हाथ जोड़ भर लेते हैं | एक दिन मैंने पापा से कहा,'' पापा ! मम्मी के साथ बद्री - केदार हो आइये''| पापा ने जो जवाब दिया वह यह है,'' मेरा कर्तव्य ही मेरी पूजा है यह घर ही मेरा तीर्थ स्थान है''| 

सुबह की पहली किरण का स्वागत पापा ने हमेशा हाथ जोड़कर व सिर झुकाकर किया है | खाने की थाली से पहला कौर मुँह के अंदर रखते ही भगवान को धन्यवाद देना वे कभी नहीं भूलते | अपने हर कर्तव्य को भगवान् का कार्य समझने वाले पापा सच्चे अर्थों में धार्मिक हैं |
 
संन्यास लेने लोग घर से बाहर वनों व तीर्थ स्थलों को चले जाते हैं, पर पापा ने घर - गृहस्थी में रहते हुए भी अपने शरीर को सन्यासियों कीतरह साध रखा है | कितनी ही भीषण गर्मी क्यों न हो, उन्हें पंखा या कूलर की आवश्यकता नहीं होती है | कंपकंपाते हुए जाड़े में भी वे अपने एकमात्र घिसे हुए बीसियों साल पुराने स्वेटर को ही पहनते हैं कि '' यह मेरी बहिन 'बानू' ने मेरे लिए अपने हाथ से बुना था''| इसके अलावा कोई मोज़े, मफलर इनर या दस्ताने इत्यादि पहिनने का तो प्रश्न ही नहीं उठता |   

पापा को किसी वस्तु को बर्बाद करना पसंद नहीं है | छोटी से छोटी वस्तु भी अगर काम की हो तो पापा उसे तुरंत संभाल देते हैं | कई बार हमें लगता है कि वे घर को कबाड़खाना बना दे रहे हैं परन्तु जब हमें किसी मामूली सी वस्तु की ऐन मौके पर ज़रूरत पड़ती है तो पापा जिन्न की तरह एक ही पल में उसे हाज़िर कर देते हैं | तब हमें उनकी इस आदत के महत्व का पता चलता है | 

पापा ने कभी कोई गलत काम करने पर हमें मारा - पीटा या डांटा नहीं | उनका एक ही अस्त्र हमें घायल कर जाता था | हमारी आत्मा को झकझोर देता था | बुरा सा मुंह बना कर बस वे इतना ही कहते थे,''छिः छिः तुम्हें लज्जा नहीं आती ऐसा काम करते हुए ''? पापा की वह धिक्कारती मुखमुद्रा कई दिनों तक हमारा पीछा करती रहती और हम दोबारा गलती करने की हिम्मत नहीं करते थे | 

छोटी बहिन क्षिप्रा अक्सर मुझसे कहती है,''दीदी ! भगवान् पापा जैसे इंसान को किस मिट्टी से बनाता होगा, जो कभी भी अपने विषय में नहीं सोचते, जो अपने बीवी - बच्चों में ही अपनी ज़िंदगी जीते हैं, जिन्हें सबकी छोटी से छोटी ज़रुरत का ध्यान रहता है ''| 

कभी भी आप उनसे मिलेंगे तो उन्हें अपने छोटे - छोटे कामों में तल्लीन पाएंगे | वे या तो किसी किताब में सिर गड़ाए [अब नहीं,९ साल में नज़रें कमज़ोर हो गयी हैं ] मिलेंगे या खेत के किसी कोने में घास - पट्टी को साफ़ करते हुए मिलेंगे | 

संसार का कोई ऐसा इंचटेप नहीं होगा जो उनके हिमालय से ऊंचे व सागर से गहरे व्यक्तित्व को नाप सके | हम तीनों भाई बहिन उनकी सादगी, कर्तव्यनिष्ठा, धैर्य, समर्पण, स्नेह एवं वात्सल्य के समक्ष नतमस्तक हैं | हम भगवान् से प्रार्थना करते हैं की वे स्वस्थ रहें, सानंद रहें और अपने आशीर्वाद से हम बच्चों अभिसंचित करते रहें |            
              

शनिवार, 10 जून 2017

छुट भैये और बड़ भैये ------


हमारे देश में नेता और नारी पर जितना लिखा जाए कम है | नारी पर लिखने के लिए मेहनत चाहिए नेता पर लिखने के लिए हिम्मत | 

बड़ा नेता यानि कि वह इमारत जिसकी बुनियाद छुट भैयों से बनती है | वह इबारत जो छुट भैये की छाती पर लिखी जाती है और पढ़ी बड़ भैया की शान में जाती है | 

बड़ भैया साँप हैं तो छुट भैया वह पत्ता, जिन पर सांप सरसराता चलता है | बड़ भैया नाव है तो छुट भैया पोखर का पानी जिस पर बड़ भैया ठाठ से पतवार चलाता है | बड़ भैया चील है तो छुट भैया वह पत्थर जिस पर चील शिकार खाता है | बड़ भैया गिरगिट है तो छुट भैया वह पेड़ की डाल जिस पर गिरगिट छिपा रहता है | बड़ भैया मकड़ा है तो छुट भैया वह दीवार जिस पर मकड़ा जाल बुनता है | 

छुट भैया वह चीज़ होता है जो अपने बड़ भैया के लिए जान न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहता है | चुनाव के दौरान बड़ भैया के लिए वोटों का जुगाड़ करता है | कॉलेज के लड़कों से लेकर खोखे, फड़ वालों, मजदूरों तक को भीड़ में, जुलूस में, नारे लगाने में शामिल करता है | सबका हमदम सबका दोस्त छुट भैया | 

एक दूसरे पर आश्रित बड़ भैया और छुट भैया | 

बड़ भैया, छुट भैया पर चुनाव जीतने के बाद वरदहस्त रख देते हैं तो वह किसी न किसी परिषद् का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, उपमंत्री, सहमंत्री, मंत्री कुछ भी बन जाता है | 
 
बड़ भैया पहले से ही शादीशुदा होते हैं जबकि छुट भैये की शादी बहुत मुश्किल से होती है क्योंकि कोई भी लड़की वाले इतने बड़े दिल के नहीं होते कि अपनी लड़की एक सेवक को सौंप दें | भला हो बड़ भैया की इमेज का कि कोई न कोई लड़की वाला आखिरकार फंस ही जाता है | ऐसे छुट भैये की जब शादी होती है तब बड़ा ही रोचक दृश्य उपस्थित हो जाता है | 

बारात के दिन जहाँ अन्य साधारण दूल्हे अपने को राजा से कमतर नहीं समझते, घमंड से गर्दन ऊंची तनी रहती है, किसी का भी अभिवादन करना उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगता है, वहीं छुट भैया अपनी खुद की शादी में भी सबको झुक - झुककर नमस्ते करता है, कि कहीं कोई नाराज़ न हो जाए | सबके पास व्यक्तिगत रूप से जाकर खीसें निपोरता है | 'खाना खाया कि नहीं', ड्रिंक आई या नहीं, भाभीजी और बच्चों को क्यों नहीं लाए, अम्मा की तबीयत कैसी है, भाई की नौकरी लगी या नहीं ? आदि आदि | अपनी शादी के दिन भी वह सबकी फ़िक्र में घुला रहता है |  
बड़ भैया जहाँ सिर्फ वोट मिलने तक ही हाथ जोड़ते हैं वहीं छुट भैये की जनता के आगे हाथ जोड़े रखने की मजबूरी होती है | क्योंकि यह जनता उसी का गला पकड़ती है | बड़ भैय्या तो हाथ आने से रहे | 

छुट भैये की शादी में बड़ भैये को अनिवार्य रूप से शामिल होना होता है | यह छुट भैये की इज़्ज़त का सवाल होता है | छुट भैया अपनी शादी की तिथि ग्रह, मुहूर्त, नक्षत्र, मौसम, रिश्तेदारों की सुविधा, परीक्षा की तिथि और बैंकट हॉल की उपलब्धता के आधार पर न करके बड़ भैये की उपरोक्त दिन की उपलब्धता के आधार पर पक्की करवाता है | बड़ भैया उसकी शादी की बारात में शामिल होकर बारात की रौनक बढ़ाने के काम आता है |

बारात में भी लोग अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते | जबरन उन्हें नाचने पर विवश कर देते हैं | बाराती उनका हाथ पकड़कर जबरन बैयां मरोड़ने की कोशिश करते हैं | वे प्रयास करते हैं कि किसी तरह से इनकी कमर [ रा ] हिल जाए या एक हाथ ज़रा सा मुड़ जाए ताकि वीडिओ में ऐसा लग सके कि बड़ भैया बारात में नाचते भी हैं | थोड़ी देर यूँ ही जबरदस्ती हाथ - पैर हिला कर बड़ भैया पैदल चलने लगते हैं | 

बड़ भैया का चेहरा दिखाकर छुट भैया का विवाह पक्का करवाने वाले बिचौलियों की दृष्टि में लड़की वालों पर रोआब गांठने के लिए बारात में बड़ भैया की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है | हांलाकि बड़ भैया के शादी में शामिल होने से एक पैसे की भी बचत नहीं होती उलटे तीस चालीस पिछलग्गुओं के भोजन और टीके का खर्चा अलग से बढ़ता है | इसका बस एक ही फायदा है कि जनता के मध्य यह सन्देश पहुंच जाता है कि बड़ भैया चुनाव जीतने के बाद भी आम लोगों की तरह रहते हैं | जान - सामान्य की शादी - विवाह में सम्मिलित होते हैं | सबके साथ खड़े होकर दावत भी खा लेते हैं | 

उधर दुल्हन के घरवाले दूल्हे का स्वागत करना भूल जाते हैं | सालियाँ तक जूता चुराना भूल जाती हैं | सारे आगंतुक दूल्हे को छोड़कर बड़ भैया के साथ फोटो खिचवाने में व्यस्त हो जाते हैं | दूल्हे को देखने में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती | शादी की सारी रौनक बड़ भैया चुरा ले जाते हैं | छुट भैया को आज अपना होना सार्थक लगने लगता है | वह बार - बार अपनी भीग आई आँखों को पोछता है |   

अपनी शादी के समय छुट भैया कभी - कभी भाव - विभोर होकर इतना विनीत हो जाता है कि अपनी दूल्हे वाली शाही कुर्सी को बड़ भैया के आते ही छोड़ देता है, और दुल्हन के बगल में बड़ भैया को बैठने के लिए कह देता है, मानो कहना चाह रहा हो '' बड़ भैया ! किसी भी तरह की कुर्सी पर चाहे वह शादी की ही क्यों न हो, बैठने का पहला हक आपका ही है' | बड़ भैया गद - गद हो जाते हैं | जब तक बड़ भैया स्टेज से उतर नहीं जाते, वह खड़ा ही रहता है | 

छुट भैया कई बार भूल जाता है कि यह उसकी शादी का मंडप है और दूल्हा वह है | 

दुल्हन जब उसके गले में जयमाला डालने के लिए खड़ी होती है तो वह शर्मिन्दा हो जाता है '' काश ! इस समय बड़ भैया होते ! माला तो उन्हीं के गले में शोभा पाती है'' | वह इधर - उधर नज़र दौड़ाता है, बड़ भैया दूर - दूर तक नज़र नहीं आते तो मजबूरन माला पहिनने के लिए सिर झुका देता है | 

शादी के बाद दुल्हन जब अपनी एल्बम देखती है तो पाती है कि एक चौथाई फोटुओं पर बड़ भैया का कब्ज़ा है | उसका हज़ारों का मेकअप, लहंगा, उसकी बहनों के हेयर स्टाइल, दोस्तों के डिज़ाइनर कपडे, रिश्तेदारों के जड़ाऊ जेवरात, सब नेपथ्य में चले गए हैं | दुल्हन सिर पकड़कर रह जाती है | 


गुरुवार, 8 जून 2017

वह बहुत आगे जाएगा |

वह बहुत आगे जाएगा | आगे जाने की सारी कलाओं वह निपुण हो चुका है | वह आगे नहीं जाएगा तो और कौन जाएगा ?

वह जहाँ रहता है उस कस्बे में एक इंजीनियरिंग कॉलेज है | इंजीनियरिंग कॉलेज के पास पूरी फैकल्टी नहीं है | अपनी बिल्डिंग नहीं है | संसाधन नहीं है | पूंजी नहीं है | लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है ? अगर कोई यह सोचता है कि बिना इन मूलभूत सुविधाओं कोई संस्थान कैसे खोला जा सकता है तो यह उसकी समस्या है सरकार की नहीं | सरकार ने संस्थान खोलने की घोषणा करी थी और उसे पूरा कर दिया यही क्या कम बात है ? बाकी संस्थान नामक थान से निकलने वाले इंजीनियर जाने और उन्हें नौकरी पर रखने वाले जानें |

गौर इस बात पर करिये कि संस्थान के खुलने की घोषणा होते ही कई छोटे - बड़े रेस्त्रां, चंद स्टेशनरी की दुकानें, ढेरों चाय के फड़, दो तीन बड़े - बड़े जनरल स्टोर खुल गए और दिन दूनी रात चौगुनी गति से दौड़ने लगे | संस्थान अलबत्ता घिसट - घिसट कर चलने लायक हो गया था | 

ऐसे वातावरण में उसने वह खोला जिसे न तो पूरी तरह रेस्त्रां कहा जा सकता था और न होटल | इन दोनों के बीच की एक कड़ी कहना उपयुक्त होगा | इसके बिना इंजीनियरिंग या किसी तरह के संस्थान की कल्पना करना बेमानी होगा | देश में कहीं भी कॉलेज खुलने की घोषणा बाद में होती है, आस - पास की ज़मीनें पहले बिक जाती हैं |  

उसकी उम्र यही कोई पच्चीस से अट्ठाईस साल होगी | अपने इस होटल नुमा रेस्त्रां में उसका मेन्यू भी कुछ इस तरह का है, जिसमे चाइनीज़, साउथ इंडियन, नार्थ इंडियन, कॉन्टिनेंटल सब स्वाद स्थानीय तड़के के साथ चौबीस घंटे हाज़िर रहते हैं | इस कॉलेज के हॉस्टल के छात्र, फेकल्टी, बिल्डिंग, संसाधनों के न होने से ज़रा भी परेशान नहीं होते हैं | छात्र हॉस्टल के खाने से असंतुष्ट रहने की सनातन परंपरा का निर्वहन करते हुए दिन भर इस रेस्त्रां में अड्डा जमाए रहते हैं | घर से विभिन्न प्रकार की स्टडी व किताबों के लिए पैसा मंगवाते हैं और यहाँ बैठकर प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं पर और प्रेमिकाएं अपने प्रेमियों पर घंटों तक स्टडी करते हैं | अपने इस रेस्त्रां नुमा होटल में उसने इस तरह की अनिवार्य स्टडी के लिए अलग से केबिन बना रखे हैं, जहाँ को - स्टडी को अमली जामा पहनाया जाता है | यहाँ घंटों के हिसाब से किराया लिया जाता है | इन केबिनों से हुई आमदनी से वह अब रेस्त्रां में दूसरी मंज़िल उठाने जा रहा है | 

इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए जितना सामान्य ज्ञान चाहिए होता है वह उसमे अपडेट रहता है | छात्र - छात्राओं को एक - दूसरे के बारे में निःशुल्क जानकारियाँ उपलब्ध करवाता है मसलन कौन - कौन लड़का किस किस - लड़की के साथ यहाँ कब - कब आता है, कितनी देर बैठता है, क्या आर्डर करता है, कितना बिल आता है, इत्यादि इत्यादि | जिसको जानकारी चाहिए वह आए, खाए, पैक कराए,बिल चुकाए और जानकारी मुफ्त ले जाए |  

इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ कैसे सोशल इंजीनियरिंग की जाती है वह सारे फॉर्मूले जानता है | उसकी दिशा बिलकुल सही है | बाजार पर उसकी पकड़ का कोई जवाब नहीं | छात्राओं से निःसंकोच हाथ मिलाता है | काफी देर तक मिलाता है | छात्रों से गले मिलता है | देर तक नहीं मिलता | सबका दोस्त है | सबका ख़ास है | 

उसका चेहरा चिकना चुपड़ा है जिसे वह हर हफ्ते पार्लर जाकर दुरुस्त करवाता है, ताकि उसका सलोनापन बरक़रार रहे | अभी वह शादी भी नहीं करेगा क्योंकि इससे लड़कियों के मध्य उसका क्रेज़ ख़त्म हो जाएगा | लड़कियों के हॉस्टल में उनके बर्थडे केक की डिलीवरी भी नौकरों को न भेजकर खुद करता है | मालिक के खुद कष्ट करके केक लाने के और ''हैप्पी बर्थ डे टू यू'' गाने के अंदाज़ पर लड़कियां निहाल हो जाती हैं | इससे केक के ऑर्डर भी दोगुने हो जाते हैं | 

वह ज़माने की नब्ज़ अच्छी तरह पहचानता है | छोटे बच्चे किस तरह अपने माँ बाप की नब्ज़ कैसे पकड़ते हैं, वह समझता है | इसीलिए छोटे बच्चों को देखते ही उसकी बांछें खिल जाती हैं | वह बच्चों को उनकी माँ - बाप की गोदी से छीन लेता है | उनके ऊपर स्नेह वर्षा कर देता है | माँ - बाप इस बात से अनजान रहते हैं कि इस वर्षा के बाद जो बाढ़ आएगी वह उनकी जेब में मौजूद नकदी को बहा ले जाएगी | पचास पैसे का गुब्बारा खुद फुला कर देता है | पांच रूपये का मास्क, दस रूपये की चॉकलेट थमा देता है | बच्चे उसको सांता क्लॉज़ समझते हैं और खुश हो जाते हैं | बच्चों को खुश देखकर उनके माँ - बाप खुश | खुशी जल्दी ही दुःख में  बदल जाती है | माँ - बाप को शर्मिंदा होकर हज़ार - पांच सौ की शॉपिंग करनी पड़ती है | बाजार बच्चों से चलता है | यह फॉर्मूला उसने रट रखा है | बच्चे उसके प्रेम से अभिभूत होकर उसे बताने लगते हैं -
''अंकल अंकल मेरा बर्थडे आने वाला है''|  
''बर्थडे आने वाला है, अरे वाह ! यह लो पूरा डिब्बा चॉकलेट का'' | वह ताली बजाकर बच्चों जैसा अभिनय करता है | 
''यह तो बहुत महंगा है | आठ सौ का ! बाप रे !', नहीं बेटा ! यह नहीं ले सकते ''| पिता दयनीय स्वर में कहता है |   
''नहीं पापा ! मुझे यह चाहिए | मम्मा प्लीज़ ! ले लो ना !''
''ले लीजिये ! अब तो यह मानने से रहा''| माँ तो हथियार पहले से ही डाले  रहती है | 
वह बच्चे को तरह - तरह के आइटम दिखाता रहता है | बच्चा हर आइटम पर जान देने लगता है | इधर माँ - बाप की आधी जान निकल जाती है | जेब से नोट निकालना मजबूरी हो जाता है | 

इससे भी बढ़कर उसकी खासियत है सेवा के लिए तत्पर रहना | उसके जैसा सेवक कोई दूसरा नहीं हो सकता | मेज़ गंदी है तो कपडा लेकर खुद ही पोछ देता है | कस्टमर अगर गाड़ी से उतरने में तनिक विलम्ब कर दे तो दौड़ जाता है और उनके स्वागत के लिए अदब से खड़ा हो जाता है | उनसे चाभी मांगकर कार की लाइट बंद कर देता है | कार को खुद ही पार्क कर देगा | कार में कोई बुजुर्ग हो भाव - विभोर होकर उसका हाथ पकड़कर ससम्मान अपने रेस्त्रां नुमा होटल तक ले आता है | बुजुर्ग उसपर दुआओं की बरसात कर देते हैं और एक डिब्बा चॉकलेट खरीद कर ही जाते हैं | 

उसका बिछाया हुआ जाल इतना आकर्षक होता है कि अगर किसी ने महज़ रास्ता पूछने लिए गाड़ी रोकी हो तब भी वह वह बिना कुछ खरीदे या खाए नहीं जा पाता है | '' कैसा लगा ? कोई कमी हो तो ज़रूर बताइये | अपना अमूल्य सुझाव दीजिये'' | ग्राहक के सामने नतमस्तक खड़ा होकर पूछता है | ग्राहक अगर कोई सुझाव दे तो कहता है, अगली बार यह डिश आपके नाम से बनेगी'' | ग्राहक फूल कर कुप्पा | ''मेरे नाम की डिश ! वाह ! मैं कितना वी.आई.पी.| 

तभी तो मैं फिर कहती हूँ कि वह आगे नहीं जाएगा तो और कौन जाएगा ? 

शुक्रवार, 2 जून 2017

फेल, पास, फर्स्ट क्लास, टॉपर्स और हमारा ज़माना......

आज नंबरों की इस आपा - धापी के बीच अगर मुझे अपना ज़माना याद आ रहा है तो बच्चे मेरी हंसी उड़ाने लग जा रहे हैं | उस ज़माने में फर्स्ट आना ही मुश्किल होता था और नब्बे प्रतिशत अंक तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे | पर मेरा ज़माना इन अर्थों में अलग था कि कोई बच्चा कम नंबर आने या फेल होने की वजह से समाज में नीचा या ऊंचा नहीं सिद्ध होता था | 

मेरे ज़माने में फर्स्ट आने वाले को दूसरे ग्रह का प्राणी मान लिया जाता था | फर्स्ट के घर कोई एक आध ही बधाई देने जाता था | अधिकतर लोग रास्ते चलते ही 'बधाई' उछाल देते थे | 

सेकण्ड या थर्ड वाले गठबंधन वाली सरकार की तरह मिल - जुल कर रहते थे | थर्ड वाला भी कम सम्माननीय नहीं होता था, शान से कहता था '' दो - दो बॉडीगार्ड मिले हैं अगल - बगल | फर्स्ट का क्या है कोई इधर से पिचकाएगा तो कोई उधर से'' |  

बच्चों को आजकल की तरह नंबरों से कोई नहीं तोलता था कि, 'वह देखो उसके 89 % हैं या उसके 92 %आए हैं | बस ' पास हो गए' कह देने भर से ही काम बन जाता था | पूछने वाला समझ जाता था कि फर्स्ट डिवीज़न विथ टू बॉडीगार्ड मिले होंगे | सेकेण्ड आने वाला ज़रूर इत्तिला देता था, 'मैं सेकण्ड आया हूँ''| पचपन प्रतिशत वाला गर्व से सर उठाए कहता था '' गुड़ सेकेण्ड आई है, एक नंबर से फर्स्ट क्लास रुक गई''|   

पूरा मोहल्ला फेल होने वाले को सांत्वना देने आता था | तब लगता था कि फेल होना कितना कठिन काम है | फर्स्ट आने वालों को तो आता ही होगा | वो बिना पढ़े ही फर्स्ट आ जाते होंगे | लेकिन फेल होने वाला, फेल होने के लिए बहुत मेहनत करता होगा | फेल होने वाला भी शान से बताता था, ''बस एक ही नंबर से रह गया'' | अधिकतर फेल होने एक ही नंबर से फेल होते थे |

एक नंबर हमारे समय का महत्वपूर्ण नंबर हुआ करता था | 

हमारे समय में फेल होने वाले के लिए बहुत सुविधा थी | घरवाले ढाल बन जाते थे | रिश्तेदार मरहम होते थे | पड़ोसी कवच का कार्य करते थे |  

फेल होने वाले बच्चों की माएँ मिल - जुलकर दुःख साझा करती थीं | 

पहली माँ - ''आजकल तो रट के आ जाती है फर्स्ट क्लास | हमारा मुन्ना रट नहीं सकता इसीलिए रह गया | रटना भी किस काम का हुआ जब समझ में ही नहीं आ रहा है | रटने वाला तो तोता होता है | हमारा मुन्ना पाठ को अच्छी तरह समझने में यकीन रखता है | वैसे इंटेलीजेंट तो बहुत है हमारा मुन्ना | बस मेहनत ही नहीं करता | ज़रा मेहनत कर लेता तो सीधे टॉप करता | कौन सी बड़ी बात है टॉप करना''| 

''हाँ हाँ बहिन! तुम बिलकुल सही कह रही हो | जिसको देखो उसके ही ढेर सारे नंबर आ जा रहे हैं | भला यह भी क्या बात हुई ? नंबर न हुए मुफ्त का माल हो गया | हमारे ज़माने में तो दस - दस साल तक फर्स्ट क्लास नहीं आती थी किसी की | सेकेण्ड आने वाले को ही फर्स्ट की जैसी इज़्ज़त मिलती थी''| 

दूसरी माँ - ''नक़ल हो रही थी खुलेआम |  हमारे मुन्ना ने बताया | मुन्ना सीधा - साधा हुआ | नक़ल नहीं करूँगा कहा उसने चाहे फेल हो जाऊं | 
प्रेक्टिकल में भी कम नंबर दिए टीचर ने | थियोरी में तो फुल थे | मुन्ने से चिढ़ता था टीचर | ट्यूशन नहीं पढ़ा इसीलिए कम नंबर दिए''| 

''सही कहती हो बहिन ! नक़ल का सहारा कब तक लेंगे | इस साल नहीं तो अगले साल लुढ़क जाएंगे | ऊपर वाला कहीं न कहीं हिसाब बराबर कर ही देता है'' | 

सारी माएं ऊपर की ओर देखने लगती थीं | ऊपर वाला निश्चित रूप से इतनी जोड़ी आँखों को अपनी ओर ताकता देखकर डर जाता होगा कि अभी तो हिसाब - किताब का पिछला बैकलॉग ही नहीं निपटा और नया काम आ गया |  

तीसरी माँ - ''अपना मुन्ना तो ऐन एग्जाम के समय बीमार पड़ गया था | उसकी बचपन से ही किस्मत खराब हुई | मैंने तो मना भी किया कि मत देने जा पेपर | माना ही नहीं | अरे ! तबीयत ज़्यादा ज़रूरी है कि एग्जाम | लड़खड़ाते हुए एग्जाम देने गया | दो जनों ने इसे पकड़ा और कुर्सी पर बैठाया | अब ऐसे में क्या पास होता ? हमने भी कहा '' कम से कम एग्जाम तो देने की हिम्मत तो की तूने | हमारे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है | हमारा मुन्ना तो चलो बीमार हो गया था लेकिन मार्किन इतनी हार्ड हुई कि मुन्ना के आगे पीछे की सारी लाइन गायब है | सब लुढ़क गए | मुन्ना बता रहा था कि क्लास का सबसे होशियार लड़का, सब जवाब देने वाला भी फेल हो गया ''|  

'' शर्म की बात है बहिन ! मार्किंग करने वालों के अपने बच्चे नहीं होते होंगे क्या जो दूसरों के बच्चों को ऐसे फेल कर दिया''| 

चौथी माँ - ''हमारे जेठ की साली का लड़का है बहुत्ती होशियार | बचपन से टॉपर | नौकरी लगी विदेश चला गया | ऐसा हाई - फाई हो गया की माँ - बाप को ही नहीं पूछता | शक्ल भी नहीं दिखाता | फोन भी बहुत मुश्किल से करता है | कहता है काम बहुत है | कम्पनी ने बांड भरवा रखा है कि इतने साल तक यहीं रहना है | मैं तो कहती हूँ कि बच्चों को ज़्यादा अक्लमंद नहीं होने चाहिए | बेवकूफ बच्चा सदा माँ - बाप के साथ रहता है | बुढ़ापे में सेवा करता है | अपना राजू दो बार और फेल हो जाए तो परचून की दुकान खुलवा देंगे उसके लिए | जब मन चाहे बैठे | किसी की धौंस नहीं है कि मन हो न हो काम करना ज़रूरी है | 

''बिलकुल सही कह रही हो बहिन | क्या चाहिए हो रहा फिर ऐसा होशियार लड़का | इससे तो अपना बेवकूफ ही भला '' |  

पांचवी माँ -- ये जो मेरा चचेरा देवर है ना ! पता है... यह हाईस्कूल में तीन बार फेल हुआ था | आज कितना बड़ा अफसर बन चुका है, और मेरी जेठानी का छोटा भाई है न वह तो लगातार हर साल हर क्लास में दो - दो साल फेल होता था | रिकॉर्ड हुआ उसका | आज कितना सफल बिज़नसमैन है | इससे भी बड़ा एक और उदाहरण है | मेरे हसबैंड के साथ स्कूल में एक बहुत ही होशियार लड़का होता था | फर्स्ट से नीचे कुछ आता ही नहीं था | आज वह उसी बैंक में कैशियर है जहाँ मेरे हसबैंड रोज़ हज़ारों रुपया जमा करने जाते हैं | बेचारा उन्हें देख कर खिसिया जाता है''| 

छठी माँ --बहुत होशियार बच्चों को बाद में डिप्रेशन हो जाता है | बच्चों को ज़्यादा बुद्धिमान नहीं होना चाहिए | याद है न हमारे पड़ोस वाले गिरजा कक्का का सुरेश ! हमेशा हर क्लास में टॉप करता था | बाद में किसी कम्पटीशन में नहीं निकला तो डिप्रेशन में आ गया | मानसिक अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | बाद में कुछ ठीक हुआ तो घर ले आए लेकिन वह घर से भी भाग गया | बीस साल हो गए अभी तक न अता न पता | अब क्या करना हुआ ऐसे टॉपर का ? बताओ तो | 

'आग लगे ऐसी फर्स्ट क्लास'' | 

सातवीं माँ एक फेल लड़की की --''फर्स्ट आए चाहे थर्ड, पकानी सबको रोटियां ही हैं | वैसे भी ज़्यादा होशियार या फर्स्ट आने वाली लड़की ससुराल में हमेशा दुखी रहती है | फेल होने वाली बुद्धू लड़कियां ठाठ करती हैं पति उनकी मुट्ठी में रहता है | सास चूं नहीं करती | ममता को ही देख लो तिवारी जी की, तीन बार में पास हुई हाईस्कूल में | आज देखो ! क्या मज़े से कट रही है | हर महीने नया ज़ेवर खरीदती है और नई साड़ी खरीदती है | अरे ! लड़कियों को तो घर के काम में एक्सपर्ट होना चाहिए'' | 

''ससुराल में जो पूछ रहा फर्स्ट क्लास को ''| 

''ही ही ही ही''  
''हा हा हा हा'' 
''हो हो हो हो'' 
''खी खी खी खी''

सारी माओं की समवेत हंसी चारों ओर घुल जाया करती थी  | 

मोहल्ले के फेल हुए सारे बच्चों की माएँ मिलकर निम्न बिंदुओं पर सहमति की मोहर लगाती थीं -----

'कोई बात नहीं | इस साल रह गया तो अगले साल पास हो जाएगा' | 
'जो होता है अच्छे के लिए होता है | इस साल इसीलिए फेल हुआ होगा ताकि अगले साल फर्स्ट आ पाए' | 
'पास - फेल तो लगा ही रहता है'|  
'ज़िंदगी के इम्तहान में फेल नहीं होना चाहिए' | 
'फर्स्ट डिवीज़न को चाटना हो रहा क्या ? पास हो जाना चाहिए' | 
'सभी पास हो जाएंगे तो फेल कौन होगा' ?
'फर्स्ट आने से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है अच्छा इंसान बनना' | 
'फर्स्ट आने वाले या टॉप करने वाले कम्पटीशन में नहीं निकल पाते हैं' | 
'जो बचपन में बहुत होशियार होता है बाद में गधा हो जाता है' 
'जो शुरू में गधे होते हैं बाद में सफलता के झंडे गाड़ देते हैं'|   
'फर्स्ट आने वाले का मन जल्दी ही पढ़ाई से ऊब जाता है' | 
'कौन पूछता है बाद में फर्स्ट आया था कि थर्ड' | 
'फर्स्ट आने वाले कौन सा कद्दू में तीर मार देते हैं' ?

माओं की ऐसी बातें सुनकर, आत्महत्या किस चिड़िया का नाम होता है तब के समय में कोई बच्चा नहीं जानता था |