शनिवार, 27 मई 2017

बिना शीर्षक ----व्यंग्य की जुगलबंदी ३५


एक दिन ऐसा भी हुआ कि सारे अखबारों में से मोटे - मोटे अक्षरों में छपने वाले शीर्षक गायब हो गए | सारा दिन न्यूज़ चैनलों से ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश नहीं हुई | व्हाट्सप्प से एक भी हिंसक वीडियो वायरल नहीं हुआ | 

पृथ्वी के फलाने - फलाने दिन खत्म होने की भविष्यवाणी नहीं हुई | मौसम बस मौसम की तरह आया किसी डरावने राक्षस की तरह नहीं आया कि जिसके आने से पहले चेतावनी देनी पड़े | 

गर्मी का मौसम आया तो बिना डराए हुए निकल गया | 'जल्दी ही खत्म हो जाएगा पानी' | 'प्यासे मरेंगे धरती वासी'|'और झुलसाएगी गर्मी'|'आने वाले दिनों में तापमान बढ़ता ही जाएगा' | लू के थपेड़े झेलने के लिए तैयार रहें '| 'अभी और तपेगी धरती' जैसे भयानक समाचार नहीं सुनाई पड़े | 
गर्मी बचपन के दिनों की तरह आई | जितनी बार चाहा नहा लिया | नहाने में डर नहीं लगा न ग्लानि हुई कि मैंने नहा कर धरती का सारा पानी खत्म कर दिया | बिना कैलोरी की टेंशन किये दिन में चार बार अलग - अलग किस्म के शरबत पिए | 'लू लग जाएगी' कहकर किसी पड़ोसन ने डराया नहीं और नंगे पैर मोहल्ले भर की ख़ाक छानती रही | भरी दोपहरी में दोस्तों के साथ आई स्पाय या सेवन टाइम्स का खेल खेला | गूलों में बिना गन्दगी या बैक्टीरिया की टेंशन के दल - बल के साथ दिन भर घुसे रहे | जब तक मम्मी डंडा लेकर मारने के लिए नहीं आ गयी तब तक निकले ही नहीं | रात को छत पर कई बाल्टियां पानी डालकर, दरी बिछाकर, ओडोमॉस लपेटकर, गप्पें मारकर सो गए | बिजली के आने न आने की परवाह नहीं करी | ए. सी. लगाने के बाद मीटर के दौड़ने का तनाव नहीं हुआ और चैन से नींद आई | दिन में हज़ार बार फ्रिज खोला और दिन भर बर्फ निकाल कर चूसते रहे | इंफेक्शन, खांसी, जुखाम का भय नही | सस्ती आइसक्रीम के ठेले पर टूट पड़े | गन्दा पानी, इंफेक्शन, कीटाणु जैसे शब्द हमारी डिक्शनरी से बाहर हो गए | 


जाड़े का मौसम जब आया तब आनंद ही आनंद लेकर आया  | 
किसी ने आकाशवाणी नहीं करी | जम जाएगी धरती | हिम युग आने वाला है | ब्रेन स्ट्रोक, ब्लडप्रेशर वाले रहें सावधान | जम जाएगा नलों का पानी | खाने - पीने की वस्तुओं के दाम आसमान पर | कौन बचाएगा धरती को | पूरी सर्दी किसी मौसम वैज्ञानिक ने जनता को सावधान नहीं किया | सब असावधानी से रहे और चैन से रहे | 

जाड़ा बचपन की तरह आया | एक पतला सा स्वेटर पहने हुए, न इनर , न जूते, न मोज़े, न टोपी, न मफलर, न कफ सीरप,न डॉक्टर के चक्कर लगे | नाक बहती रही, खांसी खुद ब खुद बोर होकर बिना दवाई के ठीक हो गयी | बिना हीटर और ब्लोवर के एक ही रजाई में सारे भाई - बहिन सो गए | सन टेनिंग, त्वचा का शुष्क होना, होंठ और गाल फटना इत्यादि छोटी मोटी समस्याओं की टेंशन से दूर सारा दिन धूप में खेलते - कूदते हुए गुज़ार दिया | जाड़े के मौसम में यह न खाएं, वह न पीएं ऐसा किसी डाइट एक्सपर्ट ने नहीं बताया | 

बरसात जब आई तो पानी लेकर आई | बाढ़ आएगी तो कहाँ- कहाँ विनाश होगा | बाँध टूटेंगे तो कहाँ तक के शहर डूब जाएंगे | भूस्खलन से सावधान | बह जाएगी एक दिन दुनिया |  आकाश से बरसी आफत जैसे खतरनाक बमवर्षक शब्दों की बमबारी नहीं हुई | 

बचपन की तरह बरसी बरसात | छत के पाइप के रास्ते से आने वाले गंदे पानी की बौछारों के नीचे सिर लगाकर खड़े हो गए | जिधर ज़रा सा पानी जमा हुआ देखा उधर कागज़ की नाव बनाकर तैरा दी | ज़ोर - ज़ोर से उस पर खड़े होकर छप - छप करी और एक दूसरे को उस पानी से भिगाने का सुख महसूस किया | पानी में मेंढक बनकर उछले | सांप बनकर रेंगे | चिड़िया बनकर मुँह खोलकर बारिश में खड़े हो गए |  मूसलाधार बारिश के दिन छाता और बरसाती दोनों एक साथ लेकर पड़ोस में रहने वाली मौसियों और चाचियों के घर जाकर उन्हें अचंभित किया | ओले बटोरे और उन्हें मटके में भरा | कभी हथेली में उठा कर उसके पिघलने तक इंतज़ार किया | हाथ सुन्न पड़ जाने पर हाथों को बगल में दबाकर गर्म करने की कोशिश करी |  सड़क किनारे खड़े ठेले से गोलगप्पे खाने में पेट में कभी इंफेक्शन नहीं हुआ | मच्छर, डेंगू, मलेरिया नामक बीमारियों की दुनिया से परे शरीर से खून चूसते मच्छरों को पट - पट करके मारा | 'किसने कितने मच्छर मारे' के आधार पर उस दिन का विजेता घोषित किया | 

दिन जब एक साधारण दिन की तरह आया  | 
किसी ने नहीं डराया कि तृतीय विश्वयुद्ध किस बात पर होगा ? कौन बन रहा है महाशक्ति ? परमाणु हथियार किसने कर रखे हैं तैयार ?अगर परमाणु हमला हुआ तो कहाँ तक असर होगा ? कितने लोग मारे जाएंगे ? आने वाली पीढ़ियां इस हमले की वजह से कितनी बीमारियां झेलेगी ? कितने राष्ट्र नेस्तनाबूद हो जाएंगे | किसका मिट जाएगा नामोनिशान ? कितने सालों तक तबाहियाँ होती रहेंगी ? कौन - कौन देश एक साथ लड़ेंगे ? किस - किस हथियार से युद्ध लड़ा जाएगा ? 

दिन आया तो बचपन की तरह | खेला - कूदा | खाया - पिया | दौड़े - भागे | सोए - उठे | उठे - सोए | मार - पीट | लड़ाई - झगड़ा | कट्टी - सल्ला | सुलह - सफाई | छुप्पन - छुपाई | सुबह रंगोली | शाम चित्रहार | गुड़िया की शादी | अपनी रसोई | छोटी - छोटी पूरियां | गाना - बजाना | नाच | मम्मी की साड़ी और लिपस्टिक | पापा का चश्मा | नानाजी की लाठी | नानी की कहानियां | रामलीला का खेला खेलते दिन बीत गया |  

रात को मैंने बच्चों से पूछा, '' आज दिन भर में कुछ भी डरावना नहीं हुआ बच्चों | किसी अखबार मे रेप, दुष्कर्म, अपहरण, आतंकवाद, हत्या की खबर नहीं है | सारे चैनल सुनसान पड़े हैं | आज तुम परियों की कहानी सुनना चाहोगे ?
 

रविवार, 21 मई 2017

व्यंग्य की जुगलबंदी ३२ - हवाई चप्पल

हवाई चप्पल ----

एक राम किशोर हैं | अस्सी साल से ऊपर के रिटायर्ड मास्टर | झुकी हुई कमर | कमज़ोर नज़रें | दुबले इतने कि ज़ीरो फिगर वाली लड़कियां शर्मा जाएं | वे इंसान के खाली बैठने को दुनिया का सबसे बड़ा पाप मानते है | 

राम किशोर की आवश्यकताएं बेहद सीमित हैं | रोटी, कपड़ा और मकान के बाद सबसे आवश्यक जिसको मानते हैं वह है हवाई चप्पल | अगर घर के अंदर कोई नंगे पैर चलता दिख जाए तो उसकी शामत आ गयी समझो | पहले उससे नंगे पैर चलने का कारण पूछा जाएगा | अगर उसके मुंह से ' चप्पल नहीं मिल रही ' जैसा कुछ निकल गया तो टॉर्च लेकर चप्पा - चप्पा छान मारेंगे | किसी की चप्पलें खो जाएं तो उनका चेहरा खिल जाता है | खोई हुई चप्पलों को ढूंढने के लिए खाना - पीना छोड़ तक छोड़ देते हैं | चप्पल खोज के सघन अभियान के दौरान बीच - बीच में आकर लेटेस्ट अपडेट भी देते रहते हैं  -

''सारा घर छान मारा'' | 
''हर कोने में देख लिया''
''बिस्तर के नीचे डंडा डालकर भी देखा'' | 
''सोफे के नीचे तक ढूंढ लिया'' | 
''कहीं नहीं मिली''|  
''आकाश - पाताल एक कर दिया''|  

कई घंटों की मशक्कत के बाद अंततः उन्हें चप्पल ढूंढो अभियान में सफलता मिल ही जाती है | चप्पलें शू रैक में करीने से लगी हुई बरामद होती हैं | ऐसा कभी कभार ही होता है कि चप्पलें अपनी निर्धारित जगह पर रखी हुई हों | 

कभी उनकी चप्पल इधर - उधर हो गयी तो भौंहों में बल डालकर गुस्से में कहते हैं ''लगता है कोई उठा ले गया | घर में कौन - कौन आया था'' ?

बच्चे-----
''ही ही ही,  पापा आपकी चप्पल कौन उठाएगा''?
''आपकी चप्पलों की हालत देखकर तो उसका मन करेगा कि आत्महत्या कर ले'' | 
''अगर आत्महत्या नहीं कर पाया तो अपनी चप्पल छोड़ कर खुद नंगे पैर चला जाएगा'' |
''ग्लानि से भर कर चोरी ही छोड़ देगा'' |  
पत्नी -----
''सब चोर ही आते हैं इस घर में '' 

तरह - तरह के मज़ाक भी उन्हें उनके उद्देश्य से विचलित नहीं कर पाते | 

राम किशोर की चप्पल भी इतनी जबरदस्त होती है कि देखने वाला देखते रह जाए | घिसते - घिसते असली रंग दिखने लगता है | फीते टूट जाते हैं तो पहले खुद फीतों को सिलने की कोशिश करते हैं | मोटी सुई और धागा माँगा जाता है | घंटों तक जद्दोजहद करने के बाद जब किसी भी तरह से सिल नहीं पाते तो मोची का पता पूछते हैं |  

बच्चे ----
'' पापा मोची ने मना कर रखा है कि इस चप्पल को लेकर मत आना ''| 
''अगर आप इस चप्पल को लेकर गए तो वह अपने आपको आपको गोली मार देगा | 
'' वह अपना धंधा छोड़ देगा ''| 
पत्नी -----
'' क्या हो गया है आपको ? कितने दिन चलेंगी ये ?नई चप्पलें क्यों नहीं खरीद लेते''?

राम किशोर हार नहीं मानते,'' तुम लोग बहाने बनाते हो | सब के सब निकम्मे हो | मैं खुद ही ले जाऊँगा अपनी चप्पल ''| 

वे झुकी हुई पीठ और टूटी हुई चप्पलों को लेकर नुक्कड़ के मोची के पास जाते हैं | लौटते समय उनकी चाल में गज़ब की अकड़ आ जाती है | झुकी हुई पीठ सीधी हो जाती है | बहती हुई बीमार आँखों में चमक देखते ही बनती है |
   
''तुम लोग झूठ बोलते थे | मोची ने फटाफट दूसरे फीते डाल दिए | उसने कहा कि टाँके नहीं लग पाएंगे तब मैंने कहा कि अगर ऐसा है तो फिर फीते ही बदल दो | वह तो बहुत ही भला इंसान निकला | उसने बस दस ही रूपये लिए | कहने लगा ''आजकल हवाई चप्पलों में फीते डलवाता ही कौन है ? महीने में एक - आध बार ही ऐसे ग्राहक आते हैं ''| 

बच्चे ---
''आपको सम्मानित नहीं किया उसने''?
'' ऐसा कहकर वह आपकी मज़ाक बना रहा था''| 
'' आपका फोटो खींचकर सोशल मीडिया में अपलोड करेगा ''| 
पत्नी --
'' पता नहीं क्या सुख मिलता है इन्हें लोगों को ऐसा दिखाकर'' | 

असंख्य टाँके लगने और दो - तीन बार फीते बदलने के बाद जब तला इतना घिस जाता है कि चप्पल आधी रह जाती है तब वे दानवीर कर्ण बनकर उन्हें बाहर रख देते हैं ''कोई गरीब ले जाएगा ''| 

बच्चे ----

''बिना तले की चप्पलें पहिनने वाला गरीब इस दुनिया में एक ही है'' |
''उसे चप्पल मत कहिये पापा'' |
''लोग मज़ाक उड़ाते हैं पापा'' | 
पत्नी -----
''तेरे पापा शौक है अपने को गरीब दिखाने का'' |

''मैं क्या किसी की मज़ाक से डरता हूँ ? और चप्पल बिलकुल ठीक है अभी | आराम से छह महीने और चल सकती है | तुम्हारे जैसे लोगों की फ़िज़ूलख़र्ची ने देश को बर्बाद कर दिया है'' |  

ऐसा नहीं है कि राम किशोर अपनी उन हद दर्ज़े तक घिसी चप्पलों से फिसलते नहीं हैं | फिसलते हैं और तुरंत सम्भल जाते हैं | इकहरे शरीर और पैंतालीस किलो वजन वाले अपने शरीर पर उनको काफी घमंड है | उनको फिसलता देखकर घरवालों की लॉटरी लग जाती है | 

बच्चे ----
'और पहनो घिसी चप्पल ''| 
''अशर्फियों पर लूट और कोयलों पर मुहर ''| 
''किसके लिए बचा रहे हैं पैसा ''?
''अभी कुछ हो जाता तो हज़ारों की चपत लग जाती'' | 
पत्नी ------
''इनसे तो कुछ कहना ही बेकार है ''

वे तुरंत बचाव की मुद्रा अख्तियार कर लेते हैं ''कमज़ोरी के कारण चक्कर आ गया था | चप्पल में कोई खराबी नहीं है''| 

उनकी पत्नी हर छह महीने में शोरूम से नई चप्पल खरीदती है | चल कर भी देखती है | अजीब सी बात है कि कोई भी नई चप्पल एक या दो बार ही पहिन पाती है | 

''अच्छी नहीं है, बेकार है, जबरदस्ती भिड़ा दी दुकानदार ने | शोरूम की तड़क - भड़क के चक्कर में आ गए | आगे से चुभ भी रही है, दुकान में तो ठीक ही लग रही थी, घर आकर पता नहीं क्या हो गया '', कहकर काम वाली को दे देती है | उनके पैरों में नई चप्पलें देखकर काम वाली समझ जाती है कि एक - दो हफ्ते के अंदर उसे फिर से नई चप्पलें मिलने वाली हैं | 

पत्नी नई से नई चप्पलों में भी फिसल जाती है | दो बार एड़ी में बाल आ चुका है | ऐसे में वे खुद पर गर्व करते हैं, ''देखा तुमने ! मैं हमेशा कहता हूँ कि सारा खेल दिमाग का है | दिमाग संतुलित रहे तो चप्पलें भी संतुलित रहती हैं, चप्पलों के घिस जाने का फिसलने से कोई ताल्लुक नहीं है ''| 
 
लाख दलीलों के बावजूद पत्नी की आँखों में खटकती हैं उनकी हवाई चप्पलें | गुस्से की मात्रा जब बहुत बढ़ जाती है तो वे पति के लिए नई ब्रांडेड चप्पलें खरीद कर ले आती है | राम किशोर गंदा सा चेहरा बनाकर उन्हें अलमारी के ऊपर रख देते हैं | 

''मैंने क्या करना है नई चप्पलें पहिनकर | बेटा पहिनेगा | जब आता है चप्पलें ढूंढता रहता है'' | अपने लिए आई हुई सारी नई चीज़ें और उपहार वे अलमारी के ऊपर रख देते हैं | बनियान, रूमाल, मोज़े, शर्ट, कुर्ते, स्वेटर सब | 

ब्रांडेड पहिनने वाला बेटा उस ओर नज़र भी नहीं डालता | सालों साल वे वस्तुएं उसी अवस्था में पडी रहती हैं | 

चप्पलों के मामले में बेटा उनका भी उस्ताद है | जो चप्पल उसके लिए रखी जाती है उसे छोड़कर सब में पैर डाल लेता है | दो अंगुलिया फँसाई, निकल पड़ा, बाकी पैर बाहर रहे या अंदर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता | 

हर दीवाली में उनकी चप्पलों पर ही सबकी नज़र रहती है कि कैसे सफाई के नाम पर उनको बाहर किया जाए | दीपावली के सफाई वाले दिनों के दौरान वे अत्यंत चौकन्ने हो जाती हैं | वे अपनी चप्पलों के आस - पास ही मंडराते रहते हैं | जैसे ही उनकी चप्पलों को कबाड़ के सामान के साथ फेंका जाता है, वे बिजली की गति से दौड़ कर आते हैं और हवाई चप्पलों को उठा ले जाते हैं | 

''मेरी मेहनत की कमाई की है''|  
''खून - पसीना लगता है एक -एक पैसा कमाने में'' |  
 
खून - पसीना उनका मनपसंद जुमला है | वे बदल - बदल कर दोनों जुमलों का उपयोग करते हैं | ज़्यादा गुस्सा आने पर खून - पसीना का उपयोग करते हैं | 

राम किशोर को शादी - विवाह या अन्य किसी सामजिक कार्यक्रम में जाना पसंद नहीं आता, क्योंकि तब उन्हें घरवालों के भीषण दबाव का सामना करना पड़ता है जिसके अंतर्गत उन्हें अपनी प्रिय हवाई चप्पल उतार कर सेंडिल या जूते पहनने पड़ते हैं, जिससे बहुत तकलीफ होती है | इससे बचने के लिए उन्होंने सालों से कहीं भी जाना बंद कर रखा है | 

बच्चे चाहते हैं कि उनके पिता कहीं घूमने - फिरने के लिए जाएं | बची हुई ज़िंदगी में कम से कम एक बार हवाई यात्रा का आनंद उठा लें | 
 
बच्चे ----
'' पापा एक बार हवाई जहाज में बैठ जाओ न हमारे कहने से ''| 
''ऊपर से नीचे की दुनिया को देखना पापा | बड़ा मज़ा आता है'' | 
''पापा प्लीज़ जाइये ना, कभी तो हमारा कहना मान लिया करिये ''| 
पत्नी ----
''चलिए हम दोनों साथ घूमने चलते हैं | जवानी में तो तुमने घुमाया नहीं, अब बच्चे टिकट भी करा के दे रहे हैं, अब तो चले चलो  ''| 
राम किशोर ----
''अब मैं बस ऊपर वाले के हवाई जहाज में ही बैठूंगा '' कहकर ऊपर की ओर उंगली उठा देते हैं | 

ऐसी स्थिति में जब पी.एम. अपने 'मन की बात' में कहते हैं कि उनका सपना है कि 'हवाई चप्पल पहिनने वाले भी एक दिन हवाई जहाज में बैठ सकेंगे' तब विश्वास नहीं होता कि राम किशोर अपनी हवाई चप्पलों के साथ हवाई जहाज में बैठने के लिए राज़ी हो पाएंगे |   
  

बुधवार, 10 मई 2017

व्यंग्य की जुगलबंदी - 'कड़ी निंदा '


वे बन्दूक की गोली के सामान फुल स्पीड में आए | गुस्से से लबालब भरे हुए | मिसाइल की तरह मारक | तोप की तरह गरजने को तैयार | बम की तरह फटने को बेकरार |

''जब देखो तब कड़ी निंदा, भर्त्सना, विरोध | सुन - सुन कर कान पक गए हैं'' | 

''फिर क्या करना चाहिए उन्हें'' ?

''करना क्या है ? हमला करें सीधे - सीधे | युद्ध की घोषणा करें | मुंह छुपा कर कब तक बैठेंगे | कब तक सहते रहेंगे ? सहने की भी हद होती है | दुनिया थूक रही है हम पर | अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन यह देश हाथ से चला जाएगा | मुझे तो कहीं मुंह दिखाते शर्म आती है'' |

''लेकिन अभी तो आप मल्टीप्लेक्स से 'बाहुबली' देख कर आ रहे हैं कई लोगों ने आपका मुंह देख लिया होगा'' |

''देखिये बात को घुमाइए नहीं | आप ही बताइये कि कड़ी निंदा से क्या बिगड़ रहा है पाकिस्तान का'' ? 

''तो क्या करे सरकार ? विकल्प सुझाइये''| 

''युद्ध | हाँ ! अब यही एकमात्र विकल्प बचा है | पता नहीं इतनी देरी क्यों हो रही है ? युद्ध हो गया होता तो अभी तक तो फैसला हो भी गया होता'' | 

''युद्ध बहुत कड़ा शब्द नहीं हो गया'' ?

''नहीं बिलकुल नहीं | युद्ध से कम अब कुछ स्वीकार नहीं होगा, हमारे गोला बारूद किस दिन काम आएँगे ? कब से युद्ध भी नहीं हुआ है, मैं कहता हूँ कि बहुत जल्दी जंग लग जाएगा हमारे अस्त्र - शस्त्रों में | 

''लेकिन युद्ध से किसी समस्या का समाधान नहीं होता | युद्ध के बाद भी बातचीत करनी पड़ती है''|  

''न हो समाधान | कम से कम कलेजे पर ठंडक तो पड़ेगी | हमारे ही मर रहे हैं हमारे ही कट रहे हैं | उनके भी इतने ही मरने चाहिए तब जाकर मज़ा आएगा'' | 

''यह ठीक कहा आपने | मज़ा चाहिए दरअसल आपको'' | 

''मेरे कहने का वह मतलब नहीं है | मैं तो यह चाहता हूँ कि पकिस्तान को ज़ोरदार सबक सिखाना चाहिए | मैं अगर पी.एम. होता तो कबका हमला कर दिया होता'' | 

''तभी तो आप पी.एम.न हुए'' | 

''क्या मतलब'' ?

''कुछ नहीं | अच्छा यह बताइये कि आपके अंदर वीरता की भावना इतनी कूट - कूट कर भरी है | मुझे लगता है कि आपके घर में ज़रूर कोई फ़ौज में होगा'' | 

''नहीं जी | मेरे दादाजी बहुत बड़े ज़मींदार थे | पिताजी बैंक में थे | एक भाई एल.आई.सी.में है और दूसरा सरकारी विभाग में क्लर्क है''| 

''तब तो ज़रूर आपके बच्चे फ़ौज में जाना चाहते होंगे'' | 

''कैसी बात कर रही हैं आप? मेरा एक ही बेटा है | वह भला क्यों जाएगा फ़ौज में ? हाँ कभी - कभी कहता है लेकिन हम नहीं चाहते कि वह फ़ौज में जाए | एक बार उसने चुपके - चुपके फॉर्म भरा भी था लेकिन हमने उसका कॉल लेटर छुपा दिया था | उसे आज तक यह पता नहीं है कि कॉल लेटर क्यों नहीं आया | क्या कमी है उसके लिए ? उसे तो मैं इंजीनियर बनाऊंगा | मैंने उसके लिए बहुत सारा पैसा जमा कर रखा है | डोनेशन भी दे दूंगा'' |  
 
''आप अपने बेटे का कॉल लेटर छुपा सकते हैं और चाहते हैं कि किसी और के बेटे युद्ध करें और मारे जाएं ? फौजियों के परिवार नहीं होते क्या'' ?

''अजी उनका काम है देश की सेवा करना | जैसे हम देश के अंदर सेवाएं देते हैं, वैसे ही वे देश की सीमा पर अपनी सेवाएं देते हैं ''| 

''लेकिन आपके काम में जान का खतरा नहीं है'''| 

''अजी यह क्या बात हुई ? उनको उनकी जान का मोटा पैसा मिलता है | अभी हमारे ऑफिस में काम करने वाले चपरासी का बेटा शहीद हुआ है | मालूम है कितना पैसा मिला उनको''?

''कितना''?

''पूरे पचास लाख | साथ में पैट्रोल पम्प | बच्चे को सरकारी नौकरी | पढ़ाई मुफ्त | फ़ौज की नौकरी तो बहुत ही मज़े की है | ज़िंदगी भर कैंटीन की सुविधा | इलाज फ्री | वैसे वे करते भी क्या हैं ? साल भर तो मक्खी मारते हैं | फ्री की दारु उड़ाते हैं | मुर्गा खाते हैं | कभी - कभी ही तनाव के दिन होते हैं इनके | इनके तो मरने में भी लॉटरी लग जाती है''| 

''आप नहीं चाहते कि आपकी भी लॉटरी खुले ?आपके बेटे को भी इतना सब मिल जाता | आपने उसका कॉल लैटर छुपा कर ठीक नहीं किया | भेजना चाहिए था उसे फ़ौज में'' | 


''आपको इतनी तकलीफ क्यों हो रही है ? आपके घर में भी तो कोई नहीं है फ़ौज में''| 

''आप संजय को नहीं जानते होंगे''| 
''नहीं''|  
''आप प्रमोद को भी नहीं जानते होंगे''|  
''नहीं''|  
''ये हमारे स्कूल के बच्चे थे | इंटर पास करते ही फ़ौज में भर्ती हो गए थे | दोनों बहुत होशियार थे | प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण | घर से बेहद गरीब थे | सुबह - सुबह दस किलोमीटर की दौड़ लगाते थे | इंजीनियर बन सकते थे लेकिन घर में खाने के लिए बहुत मुश्किल से हो पाता था | एक दिन भर्ती में गए और चुन लिए गए | घर में खुशी की लहर | भरपेट खाने के लिए अन्न आने लगा | देखा - देखी गाँव के और लड़के भी तैयारी करने लगे | संजय पिछले साल शहीद हो गया | शादी हुए तीन ही महीने हुए थे उसके | गर्भवती थी उसकी पत्नी | आपके शब्दों में उसकी लॉटरी लग गयी थी | अब सारी ज़िन्दगी उसे एक विधवा के रूप में अपने बच्चे के साथ अकेले गुज़ारनी है | आपको पता नहीं होगा कि गाँव देहात में ऐसी ज़िंदगी गुज़ारना कितना मुश्किल होता है | दूसरा लड़का प्रमोद है | दुनिया भर की मनौतियों के बाद पैदा हुआ | छह बहिनों का इकलौता भाई | उसके पिता बहुत पहले ही शराब पी कर ख़त्म हो गए थे | आजकल उसके घर वालों की भी ऐसे ही बम्पर लॉटरी लगी है | उसकी माँ ने इस लॉटरी निकलने की खुशी में खाना - पीना छोड़ कर प्राण त्याग दिए | लोग लॉटरी निकलने पर तरह - तरह से मज़े उड़ाते हैं, और बताइये उन्होंने अपनी जान ही दे दी''| 

''आप तो देशद्रोहियों के जैसी बातें कर रही हैं | आपको शर्म आनी चाहिए | आपके जैसे लोगों को हिंदुस्तान में रहने का कोई हक नहीं है | मैं आपके`इस रवैये की कड़ी निंदा करता हूँ ''| 

''मैं आपके इस देशप्रेम की निंदा करती हूँ | और आपके इस युद्ध करने के शौक की कड़ी निंदा करती हूँ''|  


रविवार, 7 मई 2017

लाल बत्ती उतरे हुए नेता का साक्षात्कार ---


कैसा लग रहा है लाल बत्ती के जाने के बाद ------
लगना कैसा है जी ? हम देख रहे हैं कि हमें लाल बत्ती के उतरने की तकलीफ कम है और जनता, मीडिया को खुशी ज़्यादा है | जनता हमारी तकलीफों से खुश होती है यह तो हम पहले से ही जानते थे | इसीलिये हम भी जनता की तकलीफों से दुखी नहीं होते थे | जनता की असलियत अब खुलकर सामने आ गयी है इसीलिये अच्छा ही लग रहा है | कहते भी हैं कि मुसीबत के समय ही अपने - परायों की पहचान होती है | 


पहली बार जब लाल बत्ती मिली थी तब कैसा लगा था ?
उस समय की याद दिला कर ज़ख्मों पर नमक छिड़क दिया आपने | फिर भी बताते हैं | जब पहली बार लाल बत्ती लगी गाड़ी मिली थी तो लगा था ''मैं ही मैं हूँ दूसरा कोई नहीं ''| सड़कों पर मेरी गाड़ी गुज़रती थी तो जनता अचकचा जाती थी | सब दाएं, बाएं खड़े हो जाते थे | जो जहाँ खड़ा रहता था वहीं चिपका रह जाता था | लोग गाड़ी के अंदर झांकते थे | उनकी आँखों में ऐसा भाव होता था जैसे कि मैं किसी दूसरे ग्रह का प्राणी होऊं | उन्हें क्या खुद मुझे भी ऐसा लगता था | लोग सिर झुका लेते थे | हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे | ऐसी फीलिंग आती थी जैसे कि पुराने ज़माने में राजा लोग अपने रथ पर बैठ कर सड़क से गुज़र रहे हों और जनता पुष्प वर्षा कर रही हो | जयकारा लगा रही हो | 

लाल बत्ती से क्या फायदा महसूस किया आपने ?
अजी एक फायदा हो तो गिनाऊँ | फायदे ही फायदे थे | लोग पहले लाल बत्ती लगी गाड़ी को देखते थे, फिर लाल पट्टी उसके बाद गाड़ी के अंदर झाँक कर हमारी शक्ल के साक्षात दीदार किया करते थे | अखबार और टी वी के अलावा इसी लाल बत्ती गाड़ी के अंदर जनता हमारे दर्शन करती थी | हमारे चेहरे टी.वी. और अखबार से कितने अलग दिखते हैं या बिलकुल उस जैसे ही दिखते हैं यह बात गर्व के साथ औरों को भी बताती थी | हममें से कुछ को लाल बत्ती वाले पद मिलते थे तो कुछ के लिए लाल बत्ती वाले पद बनाए जाते थे | ऐसे असंख्य पदों की जानकारी से जनता का सामान्य बढ़ता था | रात को जब लाल बत्ती लगी गाड़ियां सड़कों पर दौड़ती थीं तो स्ट्रीट लाइट की ज़रुरत नहीं रहती थी | रात को होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आ गई थी | इस पर किसी ने गौर नहीं किया | 

क्या किया लाल बत्ती का ?
क्या करते ? आप ही बताइये | इतने सालों से जिसे गाड़ी में मुकुट की तरह सजाए रखा उसे फेंक कैसे देते ? अपने बेड रूम में लगा दी है नाइट बल्ब के बदले | कम से कम एहसास ही बना रहे कि कभी हम वी.आई.पी.थे | बिना लाल बत्ती के घरवाले भी आम आदमी वाली नज़र से देखने लगे हैं | 

क्या लगता है किसका षड्यंत्र होगा इसके पीछे ?
आप ही बताइये किसका होगा ? उसी का जो हमें चुनती है | हाँ उसी जनता का किया धरा है सब | क्या बिगाड़ रही थी हमारी छोटी सी लाल बत्ती किसी का ? बताइये | हम किसके सेवक हैं ? जनता के ही ना ! उसकी सेवा करने में हमें लाल बत्ती गाड़ी से आसानी हो जाया करती थी | जाम में नहीं फंसना पड़ता था | लोग हकबकाकर रास्ता दे देते थे | हमारा भला क्या लाभ था बताइये ? लेकिन जनता को कौन समझाए ? जनता को कितनी सुविधाएं मिलतीं हैं हमने तो कभी ऐतराज़ नहीं किया | 

जनता से कुछ कहना है ?
मैं जनता से यही कहना चाहता हूँ कि हमने उसे इतने आश्वासन दिए और उसने हमें उन आश्वासनों के बदले क्या दिया ? अभी भी सुधरने का समय है वरना एक दिन ऐसा भी आएगा कि भारत - भूमि नेताओं से खाली हो जाएगी | अकाल पड़ जाएगा | वी.आई.पी.मात्र अटैचियों पर लिखा रहेगा | हाथ जोड़ेगी जनता लेकिन कोई नेता बनने के लिए तैयार नहीं होगा | लाल बत्ती का मुवावज़ा भी काम नहीं आएगा |  

कभी याद आती है लाल बत्ती की ?
जब जनता हमारी गाड़ी देखकर मुंह फेर लेती है तब उन सुनहरे दिनों की याद आ जाती है | पहले हम उसकी उपेक्षा करते थे अब वह हमें देख कर भी अनदेखा करती है  हमने तो अब जान - बूझकर जनता की ओर देखना शुरू कर दिया है कि शायद वह हमें पहचान कर थोड़ी श्रद्धेय हो जाए | लोग पहचान लेते हैं लेकिन श्रद्धेय नहीं होते बल्कि उपहास सा उड़ाते हैं | समय - समय का फेर है | कभी लाल बत्ती जनता पर तो कभी जनता लाल बत्ती पर सवार हो जाती है | 

सरकार से नाराज़गी है ?
अब नाराज़गी से किसी को कोई फर्क पड़ता नहीं है | वैसे हम तो अपने आप को बहू समझते हैं | यह सास पर निर्भर करता है कि वह अपनी बहू को किस रूप में देखना चाहती है ? कुछ सासें चाहती हैं कि उसकी बहुएं सोलह - श्रृंगार में रहें | ज़ेवरों से लक - दक करती रहें, ताकि अन्य सासों के सीने पर सांप लोटे | कुछ सासों का सोचना अलग होता है कि बहू इतने ज़ेवरों से लदी रहेगी तो लोग क्या कहेंगे ? नज़र लगाएंगे | चोर पीछा करेंगे | इस समय हमारी सास नहीं चाहती है कि हम लाल बत्ती से सजे - धजे रहें | हो सकता है कल दूसरी सास आए और हमें अपने हाथों - लाल बत्ती का गहना पहनाए | इस समय बहुमत मिलने के कारण हम रूठ नहीं सकते वरना तो लालबत्ती खुद चलकर हमारे दरवाज़े पर आ जाती | मैं तो जनता से अपील करूंगा कि अगली बार किसी को बहुमत न दे | बहुमत हमारे लिए अभिशाप है | बहुमत नहीं होता है तो हर किसी को लाल बत्ती देनी पड़ जाती है | हमें तो बहुमत ने मारा है | 

क्या लाल बत्ती उतरने का स्वास्थ्य पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है ?
ऐसा है कि लाल बत्ती मनुष्य के रक्त में पाए जाने वाले वाले हीमोग्लोबीन की तरह होती है | हीमोग्लोबीन कम होने से जब इंसान तकलीफ में आ जाता है तो लाल बत्ती के ख़त्म होने से नेता तकलीफ में आएगा कि नहीं ? हमने हँसते - हँसते लाल बत्ती उतारी लेकिन हम जानते हैं कि हमारा दिल कितना रो रहा था | रातों की नींद उड़ गयी | नींद की गोली की डोज़ डबल हो गयी है | अपनी तो कोई बात नहीं | बत्ती मिलेगी तो उतरेगी भी और जब उतरेगी तो फिर से मिलेगी भी | मुझे दुःख तो अपनी इस गाड़ी को देखकर होता है | मोहल्ले वाले बच्चे तक हमारी गाड़ी को देखकर रास्ता नहीं देते | पहले लोग गाड़ी छूने की सपने में तक नहीं सोचते थे और अब इसके जिस्म पर जहाँ - तहाँ खरोंच पडी हुई दिख जाती है | जाम में फंस गयी तो घंटों तक फंसी रह जाती है | बत्ती क्या उतरी इसकी शान उतर गयी लगती है | गम में डूबकर पेट्रोल ज़्यादा पीने लगी है | चलते - चलते अचानक रुक जाती है | ब्रेक मारते समय झटका देती है | कहीं पर भी पंचर हो जाती है | हॉर्न बजाने पर कई बार मुझे करंट लग चुका है | मुझे कुछ नहीं हुआ लेकिन इसको गहरा सदमा लग गया है | 
   
भविष्य के नेताओं को कोई सन्देश देना चाहेंगे ?
ज़रूर देना चाहूंगा | अब जो लोग राजनीति में आना चाहते हैं उन्हें आगाह करना चाहता हूँ | अभी लाल बत्ती बंद हुई है | कुछ दिनों बाद लाल पट्टी का नंबर आएगा | फिर केंटीन के सस्ते खाने पर गाज गिरेगी | पेंशन - भत्ते ख़त्म हो जाएंगे | सिक्योरिटी छीन ली जाएगी | मुफ्त उड़ान और यात्रा पर बैन लगेगा | सरकारी आवास छिनेगा | पाई - पाई पर नज़र रखी जाएगी | सी.सी.टी.वी. के माध्यम से प्रत्येक हरकत कैद करी जाएगी | उनमें और आम जनता के बीच कोई फर्क नहीं रह जाएगा | इसीलिये अभी भी समय है कोई और काम - धंधा पकड़ लो | हम तो फंस चुके हैं और कोई यहाँ आने से पहले सौ बार सोचे |