गुरुवार, 2 सितंबर 2010

तेरी याद .....

तेरी याद .....
आज भी जब तेरी याद
मुझको गले से लगाती है
मैं बैचैन हो जाती हूँ | 
इधर - उधर टकराकर 
खुद को चोट लगा लेती हूँ |
कभी गर्म कढ़ाई के तेल के छींटों से 
 हाथ जला लेती हूँ |
आईने के रूबरू होने से
डरती हूँ, भाग जाती हूँ | 
तुझे सोचकर, तुझे देखकर 
तुझे बोलकर, तुझे लिखकर 
तेरी यादों से खुद को लपेटकर 
तेरी हर सांस को अपने आस - पास  
महसूस करती हूँ |
काश ! तुम मेरे पास होते |
पर, अगर तुम सचमुच होते 
तो क्या मैं तुम्हें इतना प्यार कर पाती 
इतनी शिद्दत से याद कर पाती ? 

32 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह्………………सच कह दिया शायद तब ऐसा ना होता।

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  2. आपकी यह कविता पढ़कर मुझे मेरी एक पुरानी कविता याद आ गई-
    उघड़ती हैं तहें ज्‍यों ज्‍यों

    हमें यह आभास होता है
    जो तन से दूर होता है
    वही मन के पास होता है

    बहरहाल मास्‍टरनी जी ब्‍लाग की कक्षा से इतने लम्‍बे समय तक गायब रहना अच्‍छी बात नहीं है।

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  3. सही सवाल उठाया है कि क्या पास होने पर इतना प्यार और याद संभव थी?
    अच्छी प्रस्तुति

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  4. वाह ....सच को उजाकर करती रचना ...

    अगर तुम पास होते ....यही तृष्णा है हर इंसान की ..जो पास है उसकी चाहत नहीं और जो नहीं है उसीके पीछे भागना ...फितरत है इंसान की ...

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  5. कविता की तो मुझे समझ नहीं लेकिन आपका लिखा पढ़ना ज़रूर अच्छा लगता है

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  6. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. दूसरों पर व्यंग्य करना जितना आसान है खुद पर, उतना ही कठिन।
    सच्ची बात हमेशा अच्छी होती है।

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  8. इतनी गम्भीर कविता ? अच्छा है अच्छा है ।

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  9. मोहतरमा...ये मास्टरनी नामा किसके नाम है? कुछ खुलासा करेंगी। उमेश, मुंबई

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  10. जन्म दिन पर मेरी और से हार्दिक शुभकामनाएं....

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  11. महाभारत धर्म युद्ध के बाद राजसूर्य यज्ञ सम्पन्न करके पांचों पांडव भाई महानिर्वाण प्राप्त करने को अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हुए मोक्ष के लिये हरिद्वार तीर्थ आये। गंगा जी के तट पर ‘हर की पैड़ी‘ के ब्रह्राकुण्ड मे स्नान के पश्चात् वे पर्वतराज हिमालय की सुरम्य कन्दराओं में चढ़ गये ताकि मानव जीवन की एकमात्र चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हो और उन्हे किसी प्रकार मोक्ष मिल जाये।
    हरिद्वार तीर्थ के ब्रह्राकुण्ड पर मोक्ष-प्राप्ती का स्नान वीर पांडवों का अनन्त जीवन के कैवल्य मार्ग तक पहुंचा पाया अथवा नहीं इसके भेद तो परमेश्वर ही जानता है-तो भी श्रीमद् भागवत का यह कथन चेतावनी सहित कितना सत्य कहता है; ‘‘मानुषं लोकं मुक्तीद्वारम्‘‘ अर्थात यही मनुष्य योनी हमारे मोक्ष का द्वार है।
    मोक्षः कितना आवष्यक, कैसा दुर्लभ !
    मोक्ष की वास्तविक प्राप्ती, मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या तथा एकमात्र आवश्यकता है। विवके चूड़ामणि में इस विषय पर प्रकाष डालते हुए कहा गया है कि,‘‘सर्वजीवों में मानव जन्म दुर्लभ है, उस पर भी पुरुष का जन्म। ब्राम्हाण योनी का जन्म तो दुश्प्राय है तथा इसमें दुर्लभ उसका जो वैदिक धर्म में संलग्न हो। इन सबसे भी दुर्लभ वह जन्म है जिसको ब्रम्हा परमंेश्वर तथा पाप तथा तमोगुण के भेद पहिचान कर मोक्ष-प्राप्ती का मार्ग मिल गया हो।’’ मोक्ष-प्राप्ती की दुर्लभता के विषय मे एक बड़ी रोचक कथा है। कोई एक जन मुक्ती का सहज मार्ग खोजते हुए आदि शंकराचार्य के पास गया। गुरु ने कहा ‘‘जिसे मोक्ष के लिये परमेश्वर मे एकत्व प्राप्त करना है; वह निश्चय ही एक ऐसे मनुष्य के समान धीरजवन्त हो जो महासमुद्र तट पर बैठकर भूमी में एक गड्ढ़ा खोदे। फिर कुशा के एक तिनके द्वारा समुद्र के जल की बंूदों को उठा कर अपने खोदे हुए गड्ढे मे टपकाता रहे। शनैः शनैः जब वह मनुष्य सागर की सम्पूर्ण जलराषी इस भांति उस गड्ढे में भर लेगा, तभी उसे मोक्ष मिल जायेगा।’’
    मोक्ष की खोज यात्रा और प्राप्ती
    आर्य ऋषियों-सन्तों-तपस्वियों की सारी पीढ़ियां मोक्ष की खोजी बनी रहीं। वेदों से आरम्भ करके वे उपनिषदों तथा अरण्यकों से होते हुऐ पुराणों और सगुण-निर्गुण भक्ती-मार्ग तक मोक्ष-प्राप्ती की निश्चल और सच्ची आत्मिक प्यास को लिये बढ़ते रहे। क्या कहीं वास्तविक मोक्ष की सुलभता दृष्टिगोचर होती है ? पाप-बन्ध मे जकड़ी मानवता से सनातन परमेश्वर का साक्षात्कार जैसे आंख-मिचौली कर रहा है;
    खोजयात्रा निरन्तर चल रही। लेकिन कब तक ? कब तक ?......... ?
    ऐसी तिमिरग्रस्त स्थिति में भी युगान्तर पूर्व विस्तीर्ण आकाष के पूर्वीय क्षितिज पर एक रजत रेखा का दर्शन होता है। जिसकी प्रतीक्षा प्रकृति एंव प्राणीमात्र को थी। वैदिक ग्रन्थों का उपास्य ‘वाग् वै ब्रम्हा’ अर्थात् वचन ही परमेश्वर है (बृहदोरण्यक उपनिषद् 1ः3,29, 4ः1,2 ), ‘शब्दाक्षरं परमब्रम्हा’ अर्थात् शब्द ही अविनाशी परमब्रम्हा है (ब्रम्हाबिन्दु उपनिषद 16), समस्त ब्रम्हांड की रचना करने तथा संचालित करने वाला परमप्रधान नायक (ऋगवेद 10ः125)पापग्रस्त मानव मात्र को त्राण देने निष्पाप देह मे धरा पर आ गया।प्रमुख हिन्दू पुराणों में से एक संस्कृत-लिखित भविष्यपुराण (सम्भावित रचनाकाल 7वीं शाताब्दी ईस्वी)के प्रतिसर्ग पर्व, भरत खंड में इस निश्कलंक देहधारी का स्पष्ट दर्शन वर्णित है, ईशमूर्तिह्न ‘दि प्राप्ता नित्यषुद्धा शिवकारी।31 पद
    अर्थात ‘जिस परमेश्वर का दर्शन सनातन,पवित्र, कल्याणकारी एवं मोक्षदायी है, जो ह्रदय मे निवास करता है,
    पुराण ने इस उद्धारकर्ता पूर्णावतार का वर्णन करते हुए उसे ‘पुरुश शुभम्’ (निश्पाप एवं परम पवित्र पुरुष )बलवान राजा गौरांग श्वेतवस्त्रम’(प्रभुता से युक्त राजा, निर्मल देहवाला, श्वेत परिधान धारण किये हुए )
    ईश पुत्र (परमेश्वर का पुत्र ), ‘कुमारी गर्भ सम्भवम्’ (कुमारी के गर्भ से जन्मा )और ‘सत्यव्रत परायणम्’ (सत्य-मार्ग का प्रतिपालक ) बताया है।
    स्नातन शब्द-ब्रम्हा तथा सृष्टीकर्ता, सर्वज्ञ, निष्पापदेही, सच्चिदानन्द , महान कर्मयोगी, सिद्ध ब्रम्हचारी, अलौकिक सन्यासी, जगत का पाप वाही, यज्ञ पुरुष, अद्वैत तथा अनुपम प्रीति करने वाला।
    अश्रद्धा परम पापं श्रद्धा पापमोचिनी महाभारत शांतिपर्व 264ः15-19 अर्थात ‘अविश्वासी होना महापाप है, लेकिन विश्वास पापों को मिटा देता है।’
    पंडित धर्म प्रकाश शर्मा
    गनाहेड़ा रोड, पो. पुष्कर तीर्थ
    राजस्थान-305 022

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  12. <
    <
    ईसा के द्वारा दी हुई शिक्षा जिसे ईसाई मानते और करते है। नीचे लिंक देखें।
    जरुर देंखें हकीकत
    http://www.youtube.com/results?search_query=benny+hinn+fire&aq=9sx

    http://www.youtube.com/results?search_query=tb+joshua+miracles&aq=1sx


    >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<

    >> <<

    हजरत मुहम्मद की दी हुई शिक्षा जिसे मुसलमान लोग मानते और उसे अन्जाम देते है। नीचे लिंक देखें। हकीकत
    www.truthtube.tv/play.php?vid=2008
    दुनिया 21 वीं सदी में प्रवेश कर चुकी है।
    ये कथा कहानियों का दौर नही है।
    ये प्रमाण है।

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  13. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
    जूझने के लिए प्रेरित किये है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामना!!
    दीप उत्सव की बधाई...........

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  14. काश ! तुम मेरे पास होते |
    पर, अगर तुम सचमुच होते
    तो क्या मैं तुम्हें इतना प्यार कर पाती
    इतनी शिद्दत से याद कर पाती ?
    यही तो इंसान की फितरत है जो उसके पास होता है उसकी वो कदर नहीं करता , और जो उसे मिल नहीं पता उसके लिए बैचेन रहता है ....! सुंदर भावनाएं ...धन्यवाद

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  15. संवेदनशील यादे
    खुश्नसीब है वो जिनके पास यादो का खजाना है
    कभी ये हँसने का कभी रोने का बहाना है

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  16. बेहतरीन रचना है ये आपकी...आपने लिखना अचानक बंद क्यूँ कर दिया?
    नीरज

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