मंगलवार, 4 जून 2013

मैं और मेरी इनकम्प्लीट फैमिली ......

मैं और मेरी इनकम्प्लीट फैमिली ......
 
जिस तरह भारत वर्ष में ज़िंदा रहने के लिए विवाह करना जितना अनिवार्य  है,  ठीक उसी प्रकार विवाह होने के उपरान्त बच्चा पैदा करना उतना ही अनिवार्य है । आपको कोई कुंवारा रहने नहीं देगा और शादी के बाद बिना बच्चे के जीने नहीं देगा । 
 
इधर विगत कुछ वर्षों से समाज में दो तरह के लोग आपसे टकराते हैं, एक वे हैं जो पहली संतान के विषय में बेधड़क होकर कहते हैं '' पहला  बच्चा कोई भी हो चलेगा ।'' कोई भी से मतलब यह ना निकाला जाए कि चूहा, बिल्ली या कोई भी जानवर पैदा हो जाए और ये उसे अपना लेंगे । कोई भी का मतलब यहाँ लड़की से होता है ।  ये बहुत बड़े दिल वाले होते हैं । ऐसे लोगों की वजह से ही शायद संसार में लड़कियों का जन्म हो पाता है  । 
 
दूसरे  वे लोग हैं जो ज़िंदगी में किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेते ।'' पहला तो लड़का ही होना चाहिए, दूसरा चाहे कोई भी हो जाए ''  यहाँ भी कोई भी का  मतलब कीड़ा - मकौड़ा, पक्षी या जानवर नहीं बल्कि लडकी से ही है । ऐसे लोग शुरू में भले ही परेशान हो लें लेकिन बाद में स्वयं को सुखी महसूस करते हैं । 
 
ये दूसरी तरह के लोग बड़े ही स्मार्ट किस्म के होते हैं । इधर स्त्री ने गर्भधारण किया नहीं उधर ये अल्ट्रा साउंड सेंटरों की खोज में आकाश - पाताल एक कर देते हैं । इन सेंटरों में, जहाँ बाहर से बड़े - बड़े अक्षरों में लिखा होता है '' गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करना कानूनन अपराध है '' और अन्दर सब जगह अलिखित रूप से लिखा रहता है '' यहाँ ये अपराध इत्ते रुपयों में खुशी - खुशी किया जाता है '' । 
 
अगर आपकी पहली लडकी है और आप दूसरी संतान की इच्छा रखती हैं और कई साल बाद दोबारा गर्भधारण करतीं हैं तो समाज में बड़ी ही विचित्र परिस्थितियाँ जन्म लेने लगती हैं । आपसे मिलने आने वाली आपकी हर मित्र, रिश्तेदार या किसी भी पड़ोसी महिला को जाने किस गुप्त विधि से यह पता होता है कि आपके गर्भ में निश्चित रूप से लड़का है । सिर्फ आपको ही नहीं पता होता बाकी सबको पता  होता है । कह सकते हैं '' जाने तो बस एक गुल ही ना जाने, बाग़ तो सारा जाने है ''। आप उन्हें कितना ही यकीन दिलाने की कोशिश करें कि वाकई आपको बच्चे का लिंग नहीं पता या आपने डॉक्टर पूछने की ज़रुरत ही नहीं समझी है, उन्हें किसी भी सूरत में यकीन नहीं होता है । आपकी हर कोशिश को काटने के यन्त्र इनके पास मौजूद रहते हैं । 
 
वे फ़ौरन पूछती हैं '' अल्ट्रा साउंड नहीं करवाया क्या ?'' आप कहेंगी '' सात या आठ बार करवाया है ,'' '' तब झूठ क्यूँ बोल रही हो कि नहीं पता '' अगर आप कहती हैं '' वह तो  बस बच्चे की ग्रोथ जानने के लिए डॉक्टर ने करवाए थे ''। किसी भी सूरत में वे इस बात को नहीं मानतीं कि अल्ट्रा साउंड गर्भ में पल रहे शिशु का विकास देखने के लिए भी किया जाता है । वे चुनौती देने लगतीं हैं '' हम भी देख लेंगे जब लड़का होगा, अभी देखो कितनी एक्टिंग कर रही है, जैसे की हमें कुछ पता नहीं ।  इतने साल बाद क्यों याद आई दूसरे बच्चे की ''। कैसी आश्चर्य की बात है कि वे आपसे ज्यादा बेसब्री से आपके होने वाले बच्चे का इंतज़ार करने लगतीं हैं कि लड़का हो और वे आपसे खुलेआम कह सकें '' हमने तो पहले ही कहा था, ऐसा कौन बेवकूफ होगा जिसकी पहली लडकी हो और उसने दूसरे बच्चे का लिंग नहीं पता किया हो ''। 
 
तब आपको अपने आस - पास के अनेक लोग याद आने लग जाते हैं, जिनकी पहली संतान लड़की है और जो साल में दो - तीन बार प्राइवेट नर्सिंग होम्स के चक्कर काटते हैं और शिकायत करते हैं '' बहुत परेशान हैं, पता नहीं क्या हो गया, दूसरा बच्चा नहीं हो रहा, कितना ही इलाज करा लिया '' अगर आप उन्हें किसी इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट का पता बताती हैं तो वे आपकी बात पर बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं । यह बाद में पता चलता है कि  दरअसल इलाज से उनका मतलब गर्भपात से और दूसरे बच्चे से उनका मतलब सिर्फ और सिर्फ लड़के से होता है, जो ना जाने कितनी गर्भपात के बाद भी पैदा होने का नाम ही नहीं लेता । धर्म संकट शायद इसे ही कहते हैं कि परिवार भी छोटा रखना है और फैमिली भी कम्प्लीट होनी चाहिए । ये वही पहले प्रकार के लोग होते हैं जो कहते थे '' पहला कुछ भी चलेगा ''। अब ये लोग अपने पुराने निर्णय पर पछताते और हाथ मलते हैं कि काश ! पहली बार में ही लिंग का पता कर लिया होता । 
 
इधर आपके पेट का आकार बढ़ने लगता है और उधर आपके आस - पास समाज में मौजूद कई तरह की चलती - फिरती अल्ट्रा साउंड मशीनें सक्रिय होने लगती हैं । कोई आपके पेट का आकार देखकर लड़का पैदा होने की भविष्यवाणी करेगी तो कोई चेहरे की रंगत देखकर । कोई आपसे कैटवॉक करवाके  आपके चलने के अंदाज़ से जान लेती है तो कोई पहली लड़की के सिर के बालों के बीचों - बीच में पड़ने वाले भंवर को देखकर अनुमान लगा लेती है । एक आध मशीनें तो इतनी ज्यादा बेतकल्लुफ हो जाती हैं कि आपकी नाभि का आकार तक देख लेती हैं, उनके अनुसार  इसके संकुचन की दिशा से एकदम सटीक अंदाज़ा लगाया जा सकता है । गौर करने वाली बात ये होती है कि सारी की सारी भविष्यवाणियाँ सिर्फ लड़के के लिए होती हैं । मौसम वैज्ञानिकों ने शायद इस बाद का अध्ययन नहीं किया होगा कि लड़का होने का भी एक मौसम होता है जिसके द्वारा ये मशीनें आने वाले बच्चे के लिंग का पूर्वानुमान कर लेती हैं । खट्टा या  मीठा खाने की इच्छा उगलवाकर हर दूसरी औरत भविष्यवक्ता होने का दावा पेश कर देती है । 
 
अगर इन मशीनों के सामने आपके मुंह से निकल गया '' लडकी भी तो हो सकती है '' फ़ौरन आपके मुंह पर हाथ रख दिया जाएगा '' शुभ - शुभ बोलते हैं  । ऐसा नहीं कहते । कहते हैं दिन भर के चौबीस घंटे में से एक बार माँ सरस्वती जुबान पर बैठती है, अतः इन दिनों हमेशा  शुभ - शुभ बोलना चाहिए ''। माँ सरस्वती ! आप सब सुनतीं हैं ना ?
 
 
जैसे - जैसे आपके दिन बढ़ते जाते हैं आपकी  शुभचिंतक महिलाएं, जो आपकी बेहद करीबी होती हैं, जिन्हें आप तर्क के द्वारा नहीं हरा सकती हैं,  आपके घर में तरह - तरह के श्लोक, भांति - भांति  के भगवानों  की स्तुति, चालीस प्रकार की चालीसाएँ, सैकड़ों प्रकार के सहस्त्रनामों की फोटोकॉपी पहुँचाने में जुट जाते हैं । इन सब का एक ही निचोड़ होता है कि इन सबके द्वारा आपको अवश्य ही पुत्र रत्न प्राप्त होगा । आपके सिरहाने मन्त्र चिपका दिए जाते हैं , ताकि आप सुबह - शाम, दिन - रात उक्त मन्त्र का जाप करते रहें । ऐसे बाबाओं के पते जिनके आशीर्वाद से सिर्फ लड़का ही होता है, आपके हाथ में छोटी सी पुर्ची बनाकर थमा  दिए जाते हैं । गंडे , ताबीज लौकेट से अलमारियां भरने लगती हैं । इनके भोलेपन पर तरस भी आता है । अगर आप कह बैठेंगी कि  '' बच्चे का लिंग तो कब के बन चुका होगा अब क्या फायदा इन्हें जापने का ''। तब भी ये हार नहीं मानतीं और कहती हैं ''चमत्कार भी तो कोई चीज़ होती है ''। इस चमत्कार को वाकई नमस्कार करने का मन करता है । 

कभी - कभी आप सोचने लग जाती हैं कि शायद लोग झूठ बोलते हैं या दुनिया की सारी रिसर्चें फर्जी होती होंगी, जो ये कहती हैं कि बच्चा गर्भ में सब कुछ सुनता है, महसूस करता है । इतनी साजिशों को जानने के बाद तो कोई भी लडकी भगवान् को अर्जी देकर गर्भ में ही अपना लिंग परिवर्तन करवा ले। इतने षड्यंत्र इसी पृथ्वी पर रचे जातीं हैं ताकि दूसरी लडकी पैदा ना हो पाए, उस पर भी लडकियां पैदा हो ही जाती हैं । लड़कियों के अन्दर वाकई बहुत जीजीविषा होती है । 
 
अगर आपकी डॉक्टर से आपकी आत्मीयता स्थापित हो गयी गई है, जो कि पर्याप्त महँगा इलाज करवाने की मजबूरी के कारण हो ही जाती है, तो वह भी आपको हिंट देने से पीछे नहीं हटेगी । तीसरे महीने के अल्ट्रा साउंड के बाद वह हँसते - हँसते कह ही देती है '' लड़का भी ज़रूरी है आजकल । करिश्मा कपूर को देख लो, इतने साल बाद हुआ ना बेटा '' इसी तरह से दो - तीन और अभिनेत्रियों के नाम वह आपके सामने रखती है । वह चाहती है की आप बच्चे का लिंग पूछे और वह अपनी फीस बताए । आप नहीं पूछतीं तो वह मन मसोस कर चुप हो जाती है ।  
 
अनुमानों की बारिश के जी भर के बरसने के बाद आपका नौ महीने का समय पूरा हो जाता है । अस्पताल जाने की तैयारियां पूरी कर ली जातीं हैं । एक बार फिर आपके द्वारा लगाई गयी अटैची को दोबारा खोल कर रखे गए कपड़ों के आधार पर बच्चे का लिंग जानने की अंतिम कोशिश की जाती है । अगर आप आधे कपडे लड़के के रखतीं हैं, और आधे लड़कियों के, तो ही इनके दिल को तसल्ली होती है कि वाकई आप सच बोल रहीं थीं । फिर अस्पताल जाने तक सांत्वना देने का अनवरत क्रम चलता रहता है '' सब अच्छा होगा , देखना पक्का लड़का ही होगा ''। 
 
ऑपरेशन की टेबल पर ले जाने से पाहिले आपका चेकअप डा.की असिस्टेंट के द्वारा किया जाता है । वह पूछती है ''पहला बच्चा क्या है ?''आप उत्तर देती हैं  '' बेटी है'' फिर उसका जवाब आता है ''एक लडकी है, दूसरा लड़का हो जाता तो फैमिली कम्प्लीट हो जाती ''। उसी डा., जिसके यहाँ घुसते ही बड़े - बड़े अक्षरों में लिखा हुआ टंगा रहता  है '' आप जिस डा.से परामर्श के लिए कतार में बैठे हैं वह भी किसी की बेटी है, अतः गर्भस्थ शिशु लड़का है या लडकी यह पूछने से पहले सोचें ''। 
 
आपके ताबूत में आख़िरी कील तब लगती है जब डा. द्वारा आपका पेट चीर के बच्चे को बाहर निकाला जाता है और बताया जाता है '' बधाई हो, लक्ष्मी आई है'' । फिर तुरंत दूसरा प्रश्न गोली की तरह छूटता है  ''पहला बच्चा क्या है आपका ? '' आप एनस्थीसिया का इंजेक्शन लगा होने के कारण अर्धनिद्रा में होती हैं और धीमे से कहतीं हैं '' बेटी है '' वो सुनती हैं '' बेटा है '' और सुनकर कहती हैं '' एक बेटा और एक बेटी हो गए। चलो फैमिली कम्प्लीट हो गयी'' । कम्प्लीट सुनते ही आपकी सुप्त हो गयी चेतना वापिस आ जाती है । आप कहतीं हैं '' बेटी है पहली '' वो तुरंत बात पलट देती हैं '' कोई बात नहीं, आजकल  तो लड़का -लडकी सब बराबर हैं , फिर भी अगर इच्छा होगी तो दो साल बाद आ जाना ''। यह सुनते ही वापिस आई हुई चेतना फिर से लुप्त हो जाती है । 
 
ऑपरेशन के बाद आपको कमरे में शिफ्ट किया जाता है । आपके साथ  मौजूद घरवालों को कोई बधाई का एक शब्द तक नहीं कहता । आपके पति के  द्वारा तैयार किये गए सौ - सौ के नोट जेब में ही फड़फड़ाते रह जाते हैं । अस्पताल का कोई भी कर्मचारी शगुन नहीं मांगने आता । सफाई करने वाली बेहद गरीब औरत भी इतनी स्वाभिमानी निकलती है कि आपके घर में दूसरी लडकी होने के बोझ को जानकार आपसे एक पैसा भी नहीं मांगती । वहीँ  दूसरी और आपके बगल के कमरे में लड़का हुआ होता है और वहां मांगने वालों का तांता लगा हुआ होता है । अस्पताल के सभी कर्मचारी वहां से वसूली करके आते हैं । इधर आपके द्वारा सबसे महंगी दूकान से मंगवाई गयी मिठाइयां पड़े -पड़े सूख जाती हैं । ऐसा लगता है जैसे पूरा अस्पताल एकाएक डाई बिटीज़ की गिरफ्त में आ गया हो । पेट की ताज़ा - ताज़ा सिलाई से उठने वाला दर्द पीड़ा नहीं देता लेकिन अब दिल पर लगे हुए घाव एकाएक टीस देने लगते हैं । आपको लगता है जैसे ज़माना फिर से सौ बरस पीछे चला गया । 
 
आप घर आती हैं । अब तक सबको खबर हो चुकी होती है । लोग आने लगते हैं । बधाई के शब्द सांत्वना की चाशनी में लपेट कर आपके सामने परोसे जाते हैं । बहाने - बहाने से आपकी आँखों में झांका जाता हैं कि कहीं से तो शायद एक कतरा दुःख का गिरे तो वे लपक लें और अपने सांत्वना के शब्द जो उन्होंने बीते कई दिनों से सहेज रखें हैं, आपके सामने उगल दें । आपके कंधे पर अपना हाथ रखकर दुःख प्रकट करें । अगर आप ऐसा कुछ भी नहीं करतीं तब भी वे रह नहीं पातीं , बैचैन होकर अपने दिल की बात कह ही डालतीं हैं, '' कोई बात नहीं, अगली बार लड़का हो जाएगा, अभी कौन सी उम्र चली गयी है । तीन ऑपरेशन तो आजकल साधारण बात हैं '' आप अगर कह दें '' तीसरी बार की क्या गारंटी है की लड़का ही होगा '' वे कहती हैं '' नहीं अबकी ज़रूर लड़का होगा '' ऐसे कई उदाहरण आपके सामने फिर से प्रस्तुत किये जाते हैं, जिसमे तीसरी बार में जाकर लड़का हुआ ।  इस दृढ़ विश्वास पर कौन ना कुर्बान हो जाए  ।

आपके गले में बहादुरी का तमगा पहनाया जाता है । आप हिम्मती ठहराई जाती हैं । हकीकत में देखा जाए तो आप बहुत कमज़ोर किस्म की होतीं हैं ।   ह्रदय बहुत नाज़ुक होता है । गलत काम पर करने पर उपरवाले से डरतीं हैं । हिम्मती तो वे होतीं हैं जो साल में दो बार गर्भपात करवाती हैं, शरीर पर इतना ज़ुल्म सहती हैं, और चूं भी नहीं करतीं । कर्म प्रधान होने के कारण ना भाग्य से और ना ही भगवान् से डरतीं हैं ।  

 घर में ऐसी कई महिलाएं कई दिनों तक आतीं रहतीं हैं, आप इन्हें चाय पिलाती हैं और ये आपको लड़के की अनिवार्यता के विषय में लेक्चर पिलातीं  हैं । इनमें से कई महिलाएं एक ही शहर में अपने सास और ससुर से अलग घर लेकर रहती है । कई के सास - ससुर बुढापे में अपना खाना आप ही बनाते हैं । इकलौते  लड़के हाल - चाल पूछने तक नहीं जाते । लड़का ना हो पाने की सांत्वना तो वह भी देती जो है रोज़ मौका ढूंढती है और पहला मौक़ा लगते ही सास - ससुर से  अलग हो जाना चाहती है । सबसे ज्यादा अफ़सोस तब होता है जब वह भी आपको पुत्र के ज़रूरी होने की बात कहती है, जिसका खुद का लड़का साल में छह महीने मानसिक अस्पताल में भर्ती रहता  है । जब घर में रहता है उसे आए - दिन मारता रहता है । पति बीस साल पहले घर छोड़ कर चला गया था, जिंदा भी है या मर गया उसे नहीं मालूम, लेकिन वह उसके नाम के सिन्दूर से मांग भरना एक दिन भी नहीं छोडती है ।       
 
 इसके कई दिन बाद तक कई तरह के रहस्योद्घाटन आपके सामने होते रहते हैं, जिनमे से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं .......
 
दूसरी लडकी होने का मतलब है आपका पढ़ा - लिखा होना बेकार है । पढ़े - लिखे लोग ऐसी गलती नहीं करते । अब भुगतो सारी ज़िंदगी दूसरी लड़की को । आपसे तो अच्छे कम पढ़े - लिखे लोग होते हैं । धिक्कार है आपकी डिग्रियों को । इनको पहली फुर्सत में आग लगा देनी चाहिए । 
 
दूसरी लड़की पूर्वजों के अभिशाप की वजह से होती है । अगर आपने अपने अपने माँ  - बाप की इच्छा के विरूद्ध विवाह किया है तो भगवान् आपको दंडस्वरूप दो लड़कियां देता है । 
 
लड़कों की उत्पत्ति अनिवार्य रूप से जबकि लड़कियों की उत्पत्ति अपने कन्यादान के शौक को पूरा करने के लिए होनी चाहिए । जो कन्यादान करता है वह अपनी  सारी ज़िंदगी किसी भी भिखारी या मांगने वाले को कुछ भी न दे तो भी चलेगा । उपरवाला उसे कोई सजा नहीं देता क्यूंकि वह भविष्य में कन्यादान नाम का महादान करेगा  । 
 
बाज़ार में सुन्दर - सुन्दर कपडे सिर्फ़ लड़कियों के लिए मिलते हैं, इसलिए एक लडकी तो होनी ही चाहिए । बाज़ार में लड़कियों के डिज़ाईनर कपडे नहीं मिलते तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालत कितनी खराब होती । 
 
लडकियां भाई को राखी बाँधने के काम आती हैं । अच्छा हुआ कि भारतवर्ष में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है । सोचिये, अगर भारतवर्ष त्योहारों का देश ना होता तो कितनी बुरी दशा होती लिंगानुपात की । 

अगर पहली लडकी हो तो दूसरी बार भगवान् पर भूल कर भी भरोसा नहीं करना चाहिए । हाँ,  लिंग परीक्षण करवाने के उपरान्त गर्भपात सही - सलामत हो जाए इसके लिए भगवान् को हाथ ज़रूर जोड़कर जाना चाहिए । 
 
फैमिली हर हाल में कम्प्लीट होनी चाहिए, इसके लिए गर्भपातों की संख्या याद करना बंद कर देना चहिए । 
 
''कम्प्लीट फैमिली'' का मतलब सिर्फ चार लोग '' माँ, बाप एक लड़का एक लडकी होता है  '' । 
 
कम्प्लीट फैमिली में दादा - दादी, चाचा - चाची, ताऊ - ताई , बुआ या कहें कि किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं आता ।     
 

इस लेख की प्रेरणा स्रोत,  मेरी दूसरी बेटी को आज पूरे दो साल हो गए । जी भर के अपना आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दीजिये । 
 

37 टिप्‍पणियां:

  1. छुटकी को बधाई हो, जुग जुग जीए,बिटिया अपनी खुशबु से तुम्हारा आँगन महकाये,उम्मीद हैं उसमें भी हमें दूसरी शेफाली ही मिलेगी...
    वाकई तुम्हारा लेखन लाजवब है,कन्या पैदा होने पर समाज द्वारा दी जानी वाली नसीहतों की वेदना को इससे अच्छा नहीं वर्णित किया जा सकता था, सलाम तुम्हारी लेखनी को

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  2. Very nicely written.I can understand it ALL as we have 2 daughters ourselves.We are settled abroad and this social problem is one of the reasons for not going back to India.

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  3. छोटी बच्ची माने कि छोटी एबीसीडी को आशीर्वाद और मंगलकामनायें।

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  4. मार्मिक सच को व्यंग्यात्मक शैली में खूब लिखा है आपने।

    ये सहानुभूति व्यक्त करने वाले लोग न हों आसपास तो कितने ही माता-पिता हैं जिन्हें दूसरी पुत्री होने पर भी खुशी मिल सकती है।

    बिटिया को खूब आशीर्वाद..हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  5. .
    .
    .
    शेफाली जी,

    यह व्यंग्य नहीं है अपितु तमाचा है नैतिकता, अहिंसा, समभाव, समानता, विश्व की सबसे प्राचीन व उत्तम संस्कृति की बातें करने वाले हमारे आज के समाज के नाम पर... अपनी दूसरी बिटिया के जन्म पर कुछ इस ही तरह की परिस्थितियों से दो चार हुआ हूँ... सब कुछ खुद और अपनी पत्नी द्वारा भोगा हुआ है... पत्नी को तो कुछ यह भी उलाहना दे गयीं कि 'हम तो तुझे हाइली क्वालीफाइड व समझदार समझते थे, तूने ऐसी बेवकूफी कैसे कर दी'...


    ...

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  6. Aapne ek ati Mahatwapurn Vishay ka yatharh Chitran bahut hi kushal Dhang Se Kiya Hai,yadi logno ki need nahi tootti hai to unki Bhagwan hi rakchha kare.Jo log Beti ko mahatwa nahi Dete ya Bete se Doyam sthan Dete hai mai unko yaad dilana Chahta hnoo ki unka wajood sirf ek Beti se hi hai.Jo unki Mna hai.

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  7. विश्व जियेगा और गर्भरण जीते बिटिया,
    प्रथम युद्ध यह और जीतना होगा उसको,
    संततियों का मोह, नहीं यदि गर्भधारिणी,
    सह ले सृष्टि बिछोह, कौन ढूढ़ेगा किसको,

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  8. इतनी कड़वी बात को खूब व्यंग्य की चाशनी में लपेट के मारा है शेफ़ाली तुमने. बधाई. और हां, छुटकी को अशेष आशीर्वाद...तुम्हें शुभकामनाएं :)
    राज की बात-
    ---------------------
    मेरा परिवार भी इनकम्प्लीट परिवार में आता है :) :) :)

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  9. सारे कच्चे चिट्ठे खोल दिये और वो भी बहुत सलीके से :) बिटिया को बहुत बहुत आशीर्वाद और प्यार ।

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  10. आपकी बिटिया के साथ-2 आपकी धारदार व्यंग्य लेखनी को भी बधाई व शुभकामनाएँ!

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  11. शेफाली जी और उनकी बिटिया को हार्दिक बधाई।

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  12. शुरू की कुछ लाइनों के बाद व्यंग-कम-सच्चाई-ज्यादा लगा ये !

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  13. सच को इस शैली में कहना कोई आपसे सीखे माट साब ! सच में आपने जिंदगी की इस कडवी सच्चाई को हू बहू ज्यों का त्यों रख दिया है शब्दों में पिरो कर , विशेषकर मांओं और बेटियों का दर्द ,और हमारे तथाकथित आधुनिक समाज की सोच यही है आज भी , हां आज भी । आपकी नन्हीं परी को दो वर्ष पूरे होने पर असीम बधाई , स्नेह और शुभकामनाएं माट साब :)

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  14. इस व्यंग्य को रचनाकार पर यहाँ भी उद्धृत किया है -

    http://www.rachanakar.org/2013/06/blog-post_7181.html

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  15. rachnakar pr yh aalekh dekha to yahan aa gayi...aksharshah satya likha hai...par dhire dhire badlaav aa raha hai...bitia ko dheron snehashish...aapko bhi badhayi !!

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  16. aapki yah post fb par share kar rahi hun...yah bahuton ko apni kahani lagegi...padhkar shayad maansikta mein badlav bhi aaye.

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  17. आप की बेटी को जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाये और उम्मीद की जब हम सभी की बेटिया बड़ी हो तो उन्हें इस तरह के सवालो का सामन कभी न करना पड़े , उन्हें दूसरो को ये न बताना पड़े की वो अपने माता पिता के लिए "बेटे" के सामान है , वो भी अपपने घर में लाडली है , उनके घर में बेटे बेटी का भेद नहीं होता है , उन्हें उनके पिता बोझ नहीं समझते है , उन्हें कभी भाई की कमी नहीं खलती है वो अपने माता पिता का ख्याल एक "बेटे" की तरह रखती है , वो विवाह के बाद भी अपने माता पिता का "बेटे " की तरह ही ख्याल रखेंगी । उन्हें अपने बेटी होने पर किसी को कोई सफाई न देनी पड़े और न अपनी बराबरी बेटो से करनी पड़े , वो हमारी बेटिया है और सदा वही बनी रहे :) ।

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  18. एक मार्मिक सच... हार्दिक बधाई। बिटिया को शुभकामनायें |

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  19. Shafali g mein b haldwani se hee hu .... kadwa magar satch hai. Yhi humare samaaj ka asli chehra hai.

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  20. Shafali g mein b haldwani se hee hu .... kadwa magar satch hai. Yhi humare samaaj ka asli chehra hai.

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  21. शेफाली जी ; आपका ब्लॉग पढ़ा , आंखे खुल गई ! सरकार भी अब बेटी को बेटे का दर्जा देने लगी है लेकिन अफ़सोस , अभी भी इस समाज के लोगों की सोच में खोट है ! खैर छोड़िये , बिटिया को आशीर्वाद और आपकी बेखौफ लेखनी को दाद देनी होगी ! आपका दोस्त --राजकुमार शर्मा--जर्नलिस्ट , अम्बाला !

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  22. जय हो फिर से। बिटिया को आशीर्वाद।

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  23. बहुत कुछ इन स्थितियों से गुजरते जन्मी मेरी छोटी बिटिया टीनएज पार कर गयी है मगर बड़े बुजुर्ग अब तक अफ़सोस जताना नहीं भूलते !
    बिटिया को ढेर सारा प्यार और शुभकामनाये !

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  24. ये हमारे मध्यवर्ग की मानसिकता का सही चित्रण है.

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  25. भेदता हुआ सत्य कहूं या नुकिला व्यंग्य
    शानदार पोस्ट
    बिटिया के जन्म पर जब मेरे दमदमाते चेहरे और पत्नी को प्यार करते देखकर, साथ वाले बैड पर अपनी पुत्रवधू को लेकर आयी एक औरत ने मेरी मां को कहा था - आपका बेटा बहुत भोला है मतलब बुद्धु है। :-)

    कृतज्ञा को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें और ढेर सारा प्यार

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  26. आप तो कुमाउनी गुरु निकली …क्य खूब धोया है सभी को!!
    हम आपके लेख को एक ही सांस में कम्प्लीट पढ़ गये.
    आपको बहुत बहुत बधाई!

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