सोमवार, 19 अगस्त 2013

कौन है असली स्टंटमैन ?

लोग कहते हैं आजकल के लड़के इतनी तेज़ बाइक चलाते हैं कि सड़क पर चलना दूभर हो जाता है । कहने को तो आजकल के लड़के भी कह सकते हैं कि सड़कें पैदल चलने वालों के लिए थोड़े ही बनी है । सड़कें गाड़ियां चलाने और बाइकें दौडाने के लिए बनाई जाती हैं । आज पैदल चलना एक विलासिता है जबकि बाइक चलाना अनिवार्यता ।

देशवासी अगर गंभीरता से सोचें तो पाएंगे कि ये युवा हैं और युवा का उल्टा वायु होता है । वे युवा हैं सो वायु हैं । वायु अमूर्त होती है । किसी को दिखती नहीं । वायु हल्की -हल्की बहेगी तो किसी को एहसास तक नहीं होगा । युवा दुनिया को अपने होने का एहसास करवाना चाहते हैं । जब वायु तेज़ गति से बहती है, सब सावधान रहते हैं । युवा सबको सावधान रखने का कार्य करते हैं । जब कोई युवा तेजी से बाइक चला कर बगल से गुज़रता है, किसी को नहीं दिखता । उसका एहसास भर होता है । सर्रर्रर की आवाज़ आने पर कई लोग आसमान में देखने लगते हैं कि शायद कोई हेलिकॉप्टर सर के ऊपर तेज़ी से गुज़र गया होगा । आज अगर यक्ष होते और युधिष्ठिर से प्रश्न पूछते '' वायु से तेज़ कौन चलता है ?  '' तब युधिष्ठिर का जवाब होता '' बाइकर, ये वायु से तेज़ चलते हैं '' ।

युवा आपको एहसास करवाते हैं कि आप सड़क पर चल रही चींटी से ज्यादा कुछ नहीं हैं । इस प्रकार ये आपको  महान होने के एहसास से दूर रखने में सहायता प्रदान करते हैं । मनुष्य होने का घमंड आपको छू भी नहीं पाता । भले ही धार्मिक चैनल वाले बाबा कितना चीख - चीख कर आपसे कहें '' मानव योनि बड़े ही भाग्य से मिलती है'', या ''मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है '' यकीन मानिए आप इन बाइकर्स के आगे बड़ा ही तुच्छ महसूस करते हैं । बाबा लोगों को सड़क पर नहीं चलना पड़ता इसीलिये वे मानव होने पर गर्व महसूस कर सकते हैं ।

बाइकर्स की वजह से हमारे बड़े - बुजुर्गों की सेहत ठीक रहती है । ये घर में चाहे कितना भी बहाने क्यूँ न बनाएं मसलन,  ' आँख नहीं दिखता '' या कान से नहीं सुनाई देता ''बुढापा आ गया है, चलने में तकलीफ होती है'', एक बार सड़क पर आते ही उनके सारे बहाने छूमंतर हो जाते हैं । आँख, कान, घुटने सब दुरुस्त हो जाते हैं । बाइक और बाइकर्स का डर दिन पर दिन क्षीण होती जा रही इन्द्रियों को दुरुस्त कर बुढापे को दूर करने में सहायता प्रदान करता है ।

इन बाइकर्स की वजह से ही छोटे - छोटे बच्चे बचपन से ही सड़क में सावधानी से चलना सीख जाते हैं । दाएं और बाएँ कैसे चलना है, इन्हें सिखाना नहीं पड़ता । बाइकर्स का कोई भरोसा नहीं होता ।  ये किसी भी दिशा में चलने के लिए स्वतंत्र होते हैं । यही कारण है कि हमारे बच्चे छठे साल से ही अपनी छठी इन्द्री का इस्तेमाल करना सीख जाते हैं । भय के कारण घंटों तक सड़क पार नहीं कर पाने के कारण इंसान को धैर्य का अच्छा अभ्यास हो जाता है । जिस तरह क्रिकेट के मैदान में बेट्समैन पहले से अपनी बल्लेबाजी डिसाइड नहीं कर सकता बल्कि बौलर के बॉल फेंकने के अंदाज़ से वह बॉल की दिशा का अनुमान लगाकर बल्लेबाजी करता है, उसी प्रकार इन बाइकर्स के एक किलोमीटर दूर से आने के अंदाज़ से यह डिसाइड करना पड़ता है कि किस दिशा की दीवार से जाकर चिपका जाए और अपने प्राणों की रक्षा करी जाए ।

 एक हमारा बचपन था, जब वाहनों की रेलम पेल नहीं होती थी । हम सारी सड़क अपनी जागीर समझ कर चलते थे । सारी दिशाएं अपनी मुट्ठी में कैद रहा करती थीं । बाइक बड़े - बड़े शहरों में इक्का - दुक्का लोगों के पास हुआ करती थी । बाइक चलाने वालों को लफंगा, आवारा और बदमाश समझा जाता था । बाइक वालों को लोग लडकी देने से डरते थे । शरीफ लोग स्कूटर चलाते थे । माँ - बाप खुशी - खुशी अपनी लडकी का हाथ स्कूटर चलने वाले के हाथों में दे देते थे । ट्रैफिक के नियम किताबों में ही धूल फांकते रहते थे । यही कारण है कि रिक्शे वाले को दायाँ और बायाँ बताने में अभी भी मुझे कन्फ्यूज़न होता है । मेरी बेटी ने दस साल की उम्र से ही दिशाओं का ज्ञान कर लिया है और सड़क में सावधानी से चलना सीख लिया है, कई बार तो वह मेरा हाथ पकड़ कर किनारे कर देती है कि ''ठीक से चलो मम्मा, अभी कोई बाइक वाला टक्कर मार जाएगा '' ।

बाइकर निडर होते हैं । उन्हें मौत से डर नहीं लगता । उनकी रफ़्तार देखकर आम आदमी का कलेजा मुंह को आ जाता है । आम आदमी सड़क पर चलते हुए हमेशा सावधान की मुद्रा में रहता है । फर्क बस इतना है कि इस '' सावधान ' के बाद ' विश्राम' नहीं आता ।

बाइकर आर्थोपेडिक डॉक्टरों और ट्रामा सेंटरों के लिए वरदान सिद्ध होते हैं । ये इनकी ही कृपा है कि सारे आर्थोपेडिक चांदी काट रहे हैं । छोटे से छोटा अस्पताल भी इनके सहारे अपनी रोजी - रोटी खींच ले जाता है ।

जिम की संख्या में इन दिनों जो बेतहाशा वृद्धि हुई है उसके पीछे भी इन्हीं बाइकर्स का हाथ है । डॉक्टर और हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं '' पैदल चलिए , पैदल चलना सेहत के लिए लाभदायक है '' । हम पैदल चलने का जोखिम नहीं उठा सकते इसलिए जिम जाते हैं । इस प्रकार नए - नए जिमों के खुलने से कई नौजवानों को रोज़गार के अवसर मिले, जिसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ इन बाइकर्स को जाता है ।

जिस तरह हम लोग देश की सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ नेताओं को बताते हैं, उसी तरह अगर आप किसी लड़के से ये पूछेंगे कि वह बाइक ही क्यूँ चलाता है तो वह इसके पीछे लड़कियों की बदलती पसंद का हाथ बताएगा । लड़कों का कहना है कि लडकियां उन्हीं लड़कों की और देखती हैं जिनके पास खूबसूरत और स्टाइलिश बाइक होती है । बाइक जितनी लेटेस्ट होगी उतनी ही स्मार्ट लडकी के पास आने की संभावना बढ़ जाती है ।

लड़कों का कहना है कि लडकियां अगर बाइक वालों की और देखना बंद कर देंगी तो खुद - ब -खुद दुर्घटनाएं होना बंद हो जाया करेंगी । कल्पना कीजिये एक लड़का लेटेस्ट मॉडल की बाइक लेकर खड़ा है और दूसरा लड़का पुराना चेतक, बजाज या ऐसा ही कोई स्कूटर लेकर खड़ा है । लडकी मुस्कुराती हुई आती है और बाइक वाले को हिकारत से देखकर झट से स्कूटर की गद्दी पर लपक कर चढ़ जाती है । बाइक वाला खडा देखता रह जाता है और स्कूटर वाला बाज़ी मार ले जाता है ।

बाइकर को ट्रैफिक व्यवस्था का दुश्मन माना जाता है । मेरा मानना है कि अगर आप गौर से देखें तो पाएंगे कि ये बाइकर ही हैं, जो कितना भी भयानक भी जाम लगा हो, चुटकियों में चीर कर आगे बढ़ जाते हैं । जाम दरअसल धीरे चलने वाले और फूंक - फूंक कर गाडी चलाने वालों की वजह से लगता है । बाइकर कभी जाम में नहीं फंसता । वह बाल बराबर जगह से भी बाइक निकाल ले जाता है । वह सूक्ष्म से सूक्ष्म रास्ते का तक उपयोग कर ले जाता है । जाम में फंसे लोग बाइकर को देखकर हसरत से आहें भरते हैं कि काश ! कोई बाइक वाला आता और हमें भी इस जाम से बाहर निकाल ले जाता ।

बाइकर ईंधन की बचत करते हैं । ये बहुत अच्छे मित्र होते हैं । बाइकर कभी अकेला नहीं चलता । उसके पीछे दो, तीन, चार और कभी - कभी पांच मित्र तक सवार हो जाते हैं, लेकिन उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती । दूसरी तरफ ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं जो दस सीट की गाड़ियों में अकेले चलते हैं । इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता और राष्ट्रहित में पेट्रोल बचाने वाले इन बेचारे बाइकर्स को पुलिस शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है ।

बाइक और आत्महत्या में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है । युवक बाइक न मिली तो आत्महत्या की धमकी देते हैं । इधर भारत वर्ष में माता - पिता भी दो तरह के होते हैं एक वे जो पहली धमकी से डर जाते हैं,  दूसरे वे जो धमकी से नहीं डरते । ऐसे निष्ठुर  माता - पिता को आत्महत्या के प्रयास से डराया जाता है । धमकी वाले प्रयास में सल्फाज़ या नुवान की मात्र कम रखी जाती है । कभी कभी मात्र का ठीक - ठीक अनुमान न हो पाने के कारण ये  धमकी वाले प्रयास सफल हो जाते है और बाइक की राह में एक और शहीद का नाम जुड़ जाता है । इधर मेरे शहर में पिछले साल एक आत्महत्या सिर्फ इस कारण हुई कि लड़का जिस कंपनी की बाइक चाहता था, वह ना लाकर उसका पिता किसी दूसरी कंपनी की बाइक ले आया था । आत्महत्या करने के लिए इतना ही कारण काफी था, सो लड़के ने आत्महत्या कर ली । मेरे पड़ोस का एक और लड़का जो छह बहिनों के बाद पैदा हुआ था, उसके आत्महत्या करने का कारण समझ में आता है क्यूंकि उसके पिता ने किसी भी तरह की बाइक खरीदने में असमर्थता प्रकट कर दी थी । क्या फायदा ऐसी ज़िंदगी का, जिसमे एक अदद बाइक ही न हो । सो लटक गया फंदे से । अब उसकी माँ पागल हो गयी है और बाप सालों से लापता है ।

बाइक और काले चश्मे के बीच गहरा सम्बन्ध पाया जाता है । लड़का बाइक खरीदने के तुरंत बाद अगर कोई चीज़ खरीदता है तो वह यही काले रंग का चश्मा । हेलमेट से ज्यादा ज़रूरी अगर कोई वस्तु है तो यही काला चश्मा । इसे लगाकर अष्टावक्र भी खुद को सुपर हीरो समझने लगता है ।

लड़के कहते हैं '' जब बड़े परदे पर अजय देवगन बाइक पर सवार होकर स्टंट दिखाता है तो वह रातों - रात सुपरहिट हो जाता है । आँख बंद करके बाइक चलने वाले का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज हो जाता है । छब्बीस जनवरी की परेड पर एक के ऊपर एक पिरामिड की तरह बने हुए जवानों को देश भर की तालियाँ मिलती हैं, और हम सामान्य लोगों को सड़कों पर स्टंट दिखाते हैं तो लोगों गालियाँ और पुलिस वालों की गोलियां मिलती हैं ? आँख बंद करके बाइक चलाने वाले को विदेशी यूनिवर्सिटी वाले डॉक्टरेट से नवाजते हैं, इनामों से लाद देते हैं, और हमें क्या मिलता है ? लोगों का तिरस्कार, अपमान और धिक्कार ।

इधर एक स्ट्राइकर कम बाइकर से मेरी मुलाक़ात हुई तो कुछ सवाल पूछे बिना रहा नहीं गया । अध्यापिका होने की ये आदत कहीं पीछा नहीं छोडती ।

सवाल …… तुम लोग बाइक किसलिए लेते हो ?
जवाब ……. जिस प्रकार नेता गण चुनाव से पहले हाथ जोड़कर वोट मांगते हैं कि जीतने के बाद जनसेवा करेंगे, उसी प्रकार हम लोग बाइक लेने के लिए माता - पिता के आगे हाथ जोड़ते               हैं और कसम खाते हैं  कि बाइक से सिर्फ कोचिंग और ट्यूशन जाएंगे ।

सवाल …… फिर क्या कारण है कि बाइक में बैठकर तुम लोग स्टंट मैन बन जाते हो ?
जवाब ……  गद्दी चीज़ ही ऐसी है कि इसमें बैठते ही हमें स्टंट करना और नेताओं को भ्रष्टाचार करना अपने आप आ जाता है ।

सवाल …… बाइकर्स के के साथ आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं को देख - सुनकर इसे बंद करने का ख्याल मन में नहीं आता ?
जवाब …… आप लोगों के गले से आए दिन सोने की चैन, मंगलसूत्र इत्यादि खींच लिए जाते हैं, आप लोग इन्हें पहिनना बंद क्यूँ नहीं कर देती ? [ निरुत्तर ]

सवाल …… आप लोगों के स्टंट देखकर आम आदमी सड़क पर चलने से घबराता है, इसके बारे में आपका क्या कहना है ?
जवाब ……आप इसे स्टंट कह सकते हैं, हम ऐसा नहीं मानते । असली स्टंट क्या होता है ये हमने अभी हाल ही में देखा, जब एक आई. ए. एस को निलंबित करने में सिर्फ इक्चालीस मिनट लगे थे । इतनी देर में तो उसने आई. ए .एस का फॉर्म भी ठीक से नहीं देखा होगा, जितनी देर में उसे सस्पेंड कर दिया गया । इसके अलावा जुबानी स्टंट, चुनावी स्टंट तो हम रोज़ ही देख रहे हैं, सुन रहे हैं । यकीन मानिए इस स्तर का स्टंट करना अपने बस की बात नहीं है । हम कितनी भी कोशिश कर लें इनकी बराबरी नहीं कर सकते । [ निरुत्तर ]

13 टिप्‍पणियां:

  1. चिंता ना करें लड़कियाँ भी दिखने लगेंगी बाईकर्स में बस कुछ दिन और इंतजार करिये !

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या बात है। खूब लिखा है। लिखने में कम स्टंट नही किये बाइकर्स से। जय हो।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसा लाजवाब व्यंग सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही लिख सकती हैं, बहुत ही लाजवाब, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. धुंआधार, हर वाक्य में नश्तर सा चुभता व्यंग्य.

    उत्तर देंहटाएं
  5. शानदार अभिव्यक्ति है,पर युवाओं की इस उर्जा क्षरण का जिम्मेदार कौन है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. एकदम सटीक .....सधी विचारणीय बातें कह डाली

    उत्तर देंहटाएं
  7. हरिशंकर परसाईजी के बाद इतना तीखा हास्य-व्यंग आप के पास ही देखा .बहुत -२ साधुवाद .
    दिनेशपाण्डेय

    उत्तर देंहटाएं