सोमवार, 7 अप्रैल 2014

अथातो कूड़ा जिज्ञासा …

 
कूड़ा - करकट के चहुँ ओर फैले होने से वर्त्तमान की भागमभाग वाली व्यस्त ज़िंदगी में भी आप बिना अलग से समय निकाले प्राणायाम कर सकते हैं ।  कूड़े के ढेर के आने से पहले एक लम्बी सांस खींच लो फिर कूड़े के ढेर के पीछे छूट जाने के बाद उस सांस को छोडो । इस प्राणायाम को आप सुबह - सुबह की मीठी नींद को ख़राब किये बगैर और बाबा रामदेव के दीदार किये बिना भी कर सकते हैं । मेरी बस रोज़ जिस रास्ते से होकर गुज़रती है उस रास्ते पर लोग मरे हुए जानवर फेंक जाते हैं । उधर से गुज़रते हुए बस या अन्य वाहनों में सवार सभी यात्री कई - कई मिनटों तक सांस रोक सकते हैं । 

कूड़े के ढेर इफरात से हों हों तो देश में सुलभ शौचालय बनवाने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी । ये इस देश के निवासियों की महान परंपरा रही है कि धरती का जो कोई भी कोना खाली देखो, पहले तो उसे गन्दा करो फिर उसे शौचालय बनाने में तनिक भी देरी मत लगाओ । जगह - जगह बने हुए इन कूड़े के ढेरों पर इंसान शौच के लिए बिना शर्म महसूस किये जा सकता है । इससे आए दिन उठने वाला शौचालय बनाम देवालय या शौचालय बनाम मोबाइल सम्बन्धी विवाद भी उत्पन्न नहीं हो पाएगा । 

कूड़े के पहाड़ों से पर्वतारोहण का अभ्यास किया जा सकता है । 'सत्यमेव जयते' के एपिसोड में एक जगह पर दिखाया गया था कि किन्हीं प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा मुम्बई के कूड़े के पहाड़ को एक महीने में समतल किया गया । इन्हीं चंद अदूरदर्शी लोगों की वजह से भारत पर्यटन के क्षेत्र में तरक्की नहीं कर पा रहा है । विचार कीजिये, यदि उस कूड़े के पहाड़ को और ऊंचा कर दिया गया होता तो हम भारतीयों को पर्वतारोहण के लिए माउंट एवरेस्ट की ओर नहीं देखना पड़ता । कुछ समय से यह देखने में आ रहा है कि ऐसा हर इंसान जो खुद को कुछ अलग साबित करना चाहता है, माउन्ट एवरेस्ट को फतह करने निकल पड़ता है । ऐसी हालत में अगर हम भारतीय एकजुट हो जाएं तो हम अपने शहर में भी ऊंचे - ऊंचे कूड़े के पर्वतों का निर्माण कर सकते हैं । इस तरह हर शहर में हमारे अपने एवरेस्ट होंगे और विदेशी लोग उन पर पर्वतारोहण के लिए आया करेंगे । गौर से सोचा जाए तो पर्वतारोहण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना देश के अंदर एक स्थिर सरकार के होने से भी बड़ी आवश्यकता बन चुका है । 

कूड़ा फेंकना बहुत हिम्मत का काम होता है । इसमें जोखिम तो है ही साथ ही साथ रोमांच भी भरपूर होता है । इसे एक तरह से साहसिक खेलों की सूची में भी शामिल किया जा सकता है । इसमें गुरिल्ला युद्ध के सभी लक्षण मौजूद रहते हैं । कूड़ा फेंकना एक कला भी है । कूड़े से भरी हुई पोलिथीन को चुपचाप सड़क पर या पार्क के किनारे रखना पड़ता है । लोगों को ऐसा भ्रम दिलाना पड़ता है जैसे कि आप कोई राष्ट्रीय महत्त्व की वस्तु बहुत सावधानी से ले जा रहे हों । चौकन्ने होकर चारों तरफ नज़र रखनी पड़ती है । सबकी नज़रों से बचा कर अपनी थैली को चुपके से कोने में रख कर फुर्ती से आगे बढ़ जाना होता है । अगर किसी ने पीछे से टोक दिया '' भाईसाहब आपका थैला रह गया '' तब तुरंत चेहरे पर ऐसे भाव चेहरे पर लाने होते हैं जैसे आप बहुत भुलक्कड़ किस्म के इंसान हों, और अक्सर अपनी वस्तुएं इसी तरह सड़क पर भूल जाते हों । इस नाज़ुक समय में किसी भी जान -पहचान वाले को न नमस्कार किया जाता है न किसी का नमस्कार लिया जाता है । इस तरह से चाल तेज़ करनी होती है, मानो अफसर ने दफ्तर में आपातकालीन मीटिंग बुलाई हो । रोज़ अलग - अलग बस स्टॉप से जगह से बस पकड़नी पड़ती है, ताकि अगल - बगल के किसी फड़, ठेले वाले या दुकानदार को आप पर शक न होने पाए । 

मेरे पड़ोस की दो महिलाओं के मध्य कूड़ा फेंकने को लेकर बहुत लम्बे समय तक चूहा - बिल्ली का खेल चलता रहा । इसे एक तरह से पॉलीथीन वार भी कह सकते हैं । एक सुबह तड़के ही दूसरी के घर के आगे कूड़े से भरा हुआ पॉलीथीन फेंक देती थी । दूसरी सुबह जल्दी नहीं उठ पाती थी तो वह देर रात को कूड़े का बदला कूड़े से चुकाती थी । यूँ दिन के उजाले में दोनों एक दुसरे की अभिन्न मित्र थीं । दोनों जब दिन में मिलती तो यूँ मुंह छिपा कर कूड़ा फेंकने वाले को जम कर लानत भेजतीं । इस पता दोनों को था कि कूड़ा फेंकने वाला दरअसल है कौन ?

यह कूड़ा करकट मेरे शहर का दो तरफ़ा भला करता है । एक तरफ यह नालियों में फंस कर पानी को सड़कों पर ले आता है जिस कारण सड़कें झील का सा आभास देती हैं । दूर - दराज से नैनीताल घूमने आने वाले पर्यटकों को नैनीझील के दर्शन यहीं पर हो जाते हैं । बच्चे उनमे कागज़ की नाव बनाकर तैराते हैं, छप - छप करके खेल खेलते हैं, वहीं दूसरी तरफ इन चोक नालियों की वजह से सड़कों में घुटने - घुटने तक भरे पानी के कारण रिक्शे और ऑटो वालों की अच्छी कमाई हो जाती है । बरसात के मौसम में जहाँ और फड़ या ठेले बंदी की कगार पर आ जाते हैं, ये ऑटो और रिक्शे वाले सड़क के दोनों और फंसे, पानी के कम होने का इंतज़ार कर रहे लाचार इंसानों को सड़क के बीचों - बीच बनी हुई झील को पार करवाने की एवज में मनचाहा किराया वसूल करते हैं । लोग अपने मन को यह तसल्ली देते हैं '' चलो इस साल नैनीताल नहीं जा सकने का अफ़सोस नहीं हो रहा ।  झील के दर्शऩ यहीं हो गए ''। 

कूड़ा सड़क पर फेंकने के कुछ फायदे भी होते हैं । इसी कूड़े के द्वारा हम एक दूसरे की आर्थिक स्थिति का आकलन कर सकते हैं । कई लोग जान बूझकर इस तरह से कूड़ा फेंकते हैं जिससे सामने वाला उनके स्टेटस का अनुमान लगा ले । ऐसे लोग कूड़ा फेंकने के मामले में आत्मनिर्भर होते हैं । इन्हें कूड़ा उठाने वाले की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती । इनके  पड़ोसी की एक आँख इन पर रहती है और दूसरी आँख इनके कूड़े के थैले पर रहती है । वह मन ही मन सोचता है ''वाह ! आजकल तो बड़े - बड़े डिब्बे फेंके जा रहे हैं  , कल तक ब्रेड की थैली भी नहीं दिखती थी कूड़े में और आजकल हर दूसरे दिन पिज़्ज़ा और जूस के डिब्बे फेंक रहे हैं, इतना पैसा कहाँ से आ गया इनके पास ? ज़रा पता करिये तो ''  या '' क्या बात है शर्मा जी के यहाँ ब्रांडेड कपड़ों की पोलिथीन कबसे आने लगी, मिसेस शर्मा तो अक्सर शनि बाज़ार से कपडे खरीद कर लाती थीं ? सच में कपडे लाये होंगे या पड़ोसियों को दिखने के लिए टॉप ब्रांड्स की पॉलीथीन इकट्ठा की होगी ?'' । कूड़े की इन थैलिओं की वजह से इनकम टैक्स विभाग को बहुत सुविधा होती । विभाग आदमी के हर साल के फेंके गए कूड़े और उनमे आने वाले अंतर के आधार पर आदमी की हैसियत का अनुमान लगा सकता है और इस के आधार पर टैक्स चोरी का पता आसानी से लगाया जा सकता है ।  

सड़क पर कूड़ा फेंकने वाले जाने या अनजाने कुछ लोगों का भला भी करते हैं । रिटायर्ड एवं वृद्ध लोगों के लिए ये कूड़े के ढेर जीवनदायिनी औषधि का कार्य करते हैं । मेरे पड़ोस में रहने वाले एक रिटायर्ड अध्यापक साल भर इसी अभियान में लगे रहते हैं । वे रास्ते भर अपने अपने कुत्ते से बातें करते हुए चलते हैं और कूड़ा फेंकने वालों को जी भर के गालियां देते हैं । कुत्ता भी उनकी गालियों में अपना स्वर मिलाता हुआ सा हुआ प्रतीत होता है । जहाँ गंदगी का ढेर देखते हैं उस जगह की दीवार पर तुरंत लिख देते हैं '' कूड़ा फेंकने वाला झाड़ी की पैदाइश है ''। लोग दीवार पर लिखी इबारत पढ़ते हैं, आस - पास झाड़ी ढूंढते हैं, झाड़ी के न मिलने पर तसल्ली महसूस करते हैं, और फिर से कूड़ा फेंकने का पुनीत कर्म शुरू कर देते हैं । एक बार उन्होंने गुस्से में लिख दिया था, '' कूड़ा फेंकने वाले की अर्थी को रानीबाग लेकर जाएंगे ''। गुस्से में वे यह भूल गए कि सभी की अर्थियों को एक न एक दिन रानीबाग जाना ही है । रानीबाग मेरे शहर का दाह स्थल है । उनके इस अभियान से कूड़ा फेंकने वालों को आतंरिक खुशी मिलती है। लिखने के अगले ही दिन से वे उसी दीवार के नीचे कूड़ा फेंकना शुरू कर देते हैं । सच्चे रिटायर्ड सरकारी अध्यापक की तरह वे हार नहीं मानते और अपनी जेब में सदैव रहने वाली चॉक निकालते हैं और फिर से दीवार पर लिख देते हैं '' कूड़ा फेंकते हुए पकडे जाने पर पांच सौ रूपये का जुर्माना ''। 

मेरे शहर में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश में जगह - जगह इस तरह की जुर्माना वसूल करने वाली धमकी लिखी हुई दिखती रहती है । यह धमकी देने वाला आदमी दिखता कैसा होगा ? कहाँ रहता होगा ? क्या खाता - पीता होगा ? जुर्माना वसूल करने का इसका क्या तरीका होगा ?   यह किस कोने में छुपकर कूड़ा फेंकने वालों पर नज़र रख रहा होगा ? पांच सौ रूपये जुर्माना वसूल करने वाले इस व्यक्ति को देखने की मेरी बचपन की इच्छा आज तक पूरी नहीं हो पाई ।

पिछले साल भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि हम भारतवासियों ने यह जाना कि गरीबी वास्तव में एक दिमागी अवस्था होती है, उसका वास्तविकता से कोई लेना - देना नहीं होता । इस साल इसी विचारधारा को एक कदम आगे ले जाते हुए मैं कहना चाहती हूँ कि गन्दगी भी एक दिमागी अवस्था है । गन्दगी देखने वाले को हर जगह गन्दगी दिखती है, कूड़े का ढेर दिखता है । कह सकते हैं कि जिसका मन गन्दा होता है उसे ही गंदगी के दर्शन होते हैं । जिसका मन साफ़ होता है उसे सब जगह साफ़ दिखती है । इसीलिए साथियों हमें अपने मन को स्वच्छ रखने का प्रयास करना चाहिए । कूड़े के ढेर मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास सहायक होते हैं । जिस व्यक्ति को रोज़ कूड़े के ढेर को देखने की आदत हो, उसे किसी भी जगह गंदगी नज़र नहीं आती । ऐसा इंसान गंदी से गंदी वस्तु से भी घृणा नहीं करता । इसके विपरीत साफ़ - सफाई से रहने वाला हमेशा गन्दगी को लेकर तनाव में रहता है । ज़रा सी गंदगी को देखकर भी अवसाद का शिकार हो जाता है । 


'' आप सड़क पर कूड़ा क्यूँ फेंकते हैं ?'' प्रश्न के जवाब में लोगों के जो उत्तर सामने आये वे इस प्रकार हैं -------

''ये जो सत्यमेव जयते एपिसोड में कूड़ा उठाने वाले दिख रहे हैं, ये हमारे यहाँ नहीं आते ।  हमारे यहाँ जो आते हैं वे इनसे बहुत भिन्न किस्म के होते हैं ''।  

''महीने के पहले दिन का भी इंतज़ार नहीं करते, तीस तारीख को ही एडवांस मांग लेते हैं, जिससे हमारे घरेलू बजट बिगड़ने की सम्भावना रहती है । बात पचास रुपयों की नहीं है, बात सिर्फ आदत के खराब होने की है, एक बार एडवांस दे दिया तो हर बार मांगने लगेंगे '' ।  

''महाशय हर त्यौहार पर ईनाम मांगते हैं, और ईनाम में सीधे पांच सौ का नोट मांगते हैं, न देने पर एक हफ्ते तक कूड़ा उठाने नहीं आते ''। 

'' जिससे खुन्नस होती है या जो एडवांस नहीं देता या त्यौहार पर जेब ढीली नहीं करता उसके दरवाज़े पर इतनी हलके से सीटी बजते हैं कि उसे सुनाई ही न दे । एक बार सीटी बजा कर एक पल का भी इंतज़ार नहीं करते और तुरंत अगले घर की और दौड़ लगा देते हैं । जब कूड़ा लेकर दौड़ते - भागते गेट पर पहुँचो तो ये ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सर से सींग ''। 

'' घर पर पुराना स्कूटर, झूला या चारपाई पड़ी हुई देखते हैं तो उस पर अपना हक़ समझने लगते हैं ,लाख मना करो तब भी माँगना नहीं छोड़ते '' ।  

'' बहुत घमंडी है, कभी नमस्कार नहीं करता ''। 

मेरी नज़र में सबसे बढ़िया उत्तर ये रहा -----

'' अजी कूड़े का क्या है, आज है कल नहीं है । जैसे इंसान आज है, कल नहीं रहेगा । इंसान और कूड़ा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । इंसान है तो कूड़ा है । कूड़ा है तो इंसान है । जब इंसान ही नहीं रहेगा तो कूड़ा कौन करेगा ?  इससे शर्म कैसी और इससे क्यूँ डरना ? आपने देखा नहीं क्या ? हर साल जब बरसात आती है तो कैसा भी कूड़ा क्यूँ न हो, सब अपने साथ बहा ले जाती है । शहर के शहर साफ़ हो जाते हैं । पानी में बड़ी शक्ति होती है । जय इंद्र देव की, जय गंगा मैया की ''। 



9 टिप्‍पणियां:

  1. हजारों ख्वाहिशें थी कूड़े को लेकर
    नामुराद काम का ही नहीं निकला !

    बहुत सुंदर ।

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  2. ओह। पढ़ने के बाद पहली बार पता चला कि हम कूड़े पर भी विस्तृत चर्चा कर सकते हैं।

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  3. दो सौ साल में भी भारत का रूप नहीं बदला! :(
    भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कंकड़ स्त्रोत्र (रचनाकार.ऑर्ग में कहीं है) लिखा था - वह अब कूड़ा स्त्रोत्र में बदल गया है, और क्या खूब बदल गया है.

    बहुत खूब!

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  4. वाह ! अति रोचक रही कूड़ा गाथा

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  5. कल 12/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. इस कूड़ा-चिन्तन के पीछे कितनी चिन्ता दुख और बेबसी है एक भुक्त भोगी ही समझ सकता है .सब तरफ़ से हार कर हताश मन की जली-कटी ऐसे ही टेढ़े शब्दों में फूट पड़ती है !
    हम और कहें भी क्या ...

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