शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

शर्मिंदा हूँ मैं , बहुत शर्मिंदा हूँ देशभक्तों !



मेरा गुनाह माफी के काबिल तो नहीं है लेकिन फिर भी मुझे माफ करना देशभक्तों ------------

मैं किसी भी तरह से देशभक्त साबित नहीं हो पा रही हूँ । मैं बहुत शर्मिंदा हूँ अपनी बुजदिली पर । अपने इस कदर कायर होने पर मुझे कभी - कभी ऐसा महसूस होता है कि मैं इस दुनिया में रहने के लायक नहीं हूँ । 

दुश्मनों के देश में, चारों और भविष्य के दुश्मनों का बिखरा हुआ खून देखकर मुझे उल्टी आने लगती है । सिर चकराने लगता है । बेहोशी छाने लगती है । सिर से लेकर पैर तक  दहशत की लहर दौड़ जाती है । 

दुश्मनों के बच्चों की लाशों को देखकर अपने बच्चों की शक्लें याद आने लगती हैं । रातों की नींद उड़ जाती है । मारे गए हैं वो  बच्चे , जिनका मुझसे दूर - दूर तक कोई सरोकार नहीं है और रातों को उठ - उठकर मैं अपने बच्चों की साँसों को टटोलने लगती हूँ । 

दुश्मनों के मरे हुए बच्चों की लाशें देखकर खुश होने के बजाय मेरा दिल हाहाकार करने लगती हूँ । मुझे जश्न मानना चाहिए था । लज़ीज़ दावतें उड़ानी चाहिए थी,  पर मुझसे एक निवाला तक निगला नहीं जाता । 

दुश्मन मुल्क की औरतों को रोता देखकर मैं भी रोने लगती हूँ, जबकि मेरे दिल को सुकून मिलना चाहिए था ।  

दुश्मनों के इस दिलकश मंज़र की मुझे ज़्यादा से ज़्यादा तस्वीरें फेसबुक या वाट्सअप पर साझा करनी चाहिए थी लेकिन मेरा मन फोन छूने तक का नहीं कर रहा । 

दुश्मनों के मुल्क की ऐसी हालत देखकर '' अच्छा हुआ'',''जैसे को तैसा '', '' बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाए '' जैसे मुहावरे भी नहीं निकल पा रहे ।  

शर्मिंदा हूँ मैं , बहुत शर्मिंदा हूँ देशभक्तों ! 



4 टिप्‍पणियां:

  1. दुश्मन मुल्क की औरतों को रोता देखकर मैं भी रोने लगती हूँ, जबकि मेरे दिल को सुकून मिलना चाहिए था ....... सुकून तो तब मिलेगा जब आतंक का नाश होगा ......
    जो बेकसूर मासूम मारे गए वे कभी किसी के दुश्मन हो ही नहीं सकते ....
    मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  4. मर्मस्पर्शी। इन्सान हैं हम दरिंदे नही।

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