सोमवार, 27 अप्रैल 2009

साथियों ......कुछ और चुनावी क्षणिकाएँ लेकर मैं फिर हाज़िर हूँ ....

 
 
नाम का और काम का गाँधी ......वरुण बबुआ उवाच
 
कौन नाम का
और
कौन काम का
गाँधी है
प्रश्न सुना तो
ऊपर बैठा
था जो बस
राम का
हर खासो-आम का
उस बापू की
हंसी छूट जाती है
 
कड़े कदम
 
उन्होंने
आतंक से
लड़ने को
सदा
कदम उठाए
इतने कड़े
आपस में ही
उलझ कर रह गए 
कभी ज़मीन पर
नहीं पड़े
 
 

6 टिप्‍पणियां:

  1. शेफाली जी

    जितनी क्षणिकाएं ला रही हैं

    उतने ही वोट डालेंगी या

    जितनी पोस्‍ट लगा रही हैं उतने।


    पर जीतेंगी आप ही

    वोट चाहे किसे ही दें।

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  2. ये दो भाइयों का मामला है।
    सुन्दर क्षणिका है।

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  3. मुंह कड़े क़दम उठाने /उठाने का दावा करने वालों को 'कड़े ' पहनाने की दरकार....devil's moral

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  4. सुन्दर और चोखा कटाक्ष

    आभार.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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