सोमवार, 15 मार्च 2010

संस्मरण : किस्सा पहली बोर्ड ड्यूटी का

संस्मरण २५ अप्रैल सन् २००० को  लिखा  गया  था , जब मैं नई - नई शिक्षा विभाग में आई थी.
 
मेरी बरसों से एक  इच्छा थी कि मैं टीचर  बनूँ, किसी और व्यवसाय में जाने की मैंने कभी नहीं सोची क्यूंकि जब से आँखें खोलीं शिक्षक  माता - पिता को बड़ी - बड़ी सिद्धांतवादी  बातें करते  हुए, और दूसरों को उपदेश देते हुए  पाया. उपदेश  देने  की  सहूलियत  के  चलते मैंने सिर्फ़ और सिर्फ़ शिक्षिका  बनने को प्राथमिकता दी.
 
टीचर बन जाने के पश्चात एक दिन बोर्ड परीक्षा में ड्यूटी करने का भी मन किया.  ड्यूटी करने की एवज में रूपये मिलने का कारण उस समय  गौण  था, क्यूंकि उस समय बहुत कम पैसा मिलता था, जो कि सेंटर तक आने - जाने में ही ख़त्म हो जाता था. इसके पीछे छिपा हुआ  मुख्य  कारण यह  था कि मैंने  अपने कक्ष निरीक्षकों से परीक्षाओं के दौरान उस  ज़माने में बहुत डांट खाई थी. आदत से मजबूर गर्दन पीछे  की  सीट में ना चाहते हुए भी चली ही जाती थी. मन में बदले की भावना कबसे कुण्डली मारे बैठी  हुई थी  कि आएगा कभी ना कभी ऐसा दिन कि मैं भी बच्चों को डांट लगाउंगी  और मौका मिले या ना मिले कान  ज़रूर उमेठुन्गी.
 
मैं नौकरी में लग चुकी थी. दो महीने बाद  बोर्ड परीक्षाएं भी गईं थीं और मैं अपनी बचपन की  इच्छा के चलते  ड्यूटी लगवाने अधिकारी के पास गई, जिसने पूरी धौंस के साथ आदेश दिया '' आप देर से आई हैं, लड़कियों  के स्कूल में जगह भर गई हैं, अब सिर्फ़ एक जगह बची है वह भी इस कॉलेज  में, [जिसके नाम से शहर भर की जनता थर्राती थी], अब आपको यहीं ड्यूटी करनी पड़ेगी.'' मना करने की मजाल किसके अन्दर थी?
 
अपने आप को कोसते हुए, मैं डरते, काँपते  घर आ गई. रात भर डरावने सपने आते रहे और कई बार पसीना - पसीना होकर नींद से उठ बैठी. सुबह के समय ज़रा सी नींद आने लगी थी कि अलार्म की कर्कश आवाज़ ने उठा दिया. ड्यूटी पर जाते समय अनुभवी माँ - बाप ने भांप लिया कि इसकी हालत पतली है '' किसी लड़के पर हाथ मत उठाना, करने देना नकल, तेरा क्या जाता है''? वे समझ गए थे कि नई नई ज़िम्मेदारी मिली है, सो डर और जोश दोनों उछालें मार रहा होगा  '' मैंने हाँ में हाँ मिलाई क्यूंकि दोनों से ही  प्रतिवाद करने का कोई फायदा नहीं था.
 
रास्ते भर ऐसा महसूस हुआ कि निहत्थे  किसी रणक्षेत्र में जा रही हूँ,.अकेली हूँ और दुश्मनों की फ़ौज अस्त्र - शस्त्रों  से लेस होकर सामने खड़ी है
 
मेरे साथ - साथ ऑटो वाला जाने क्यूँ परेशान था, इसीलिये मुझे कॉलेज के गेट पर छोड़ने के बजे एक किलोमीटर आगे छोड़ गया, और शिकायत करने पर टीचर ना होते हुए भी अमूल्य सलाह देने लगा  ''बहिन जी आप दूसरे ऑटो में चले जाइए''. समय बीत रहा था सो गुस्से को पीकर दूसरा ऑटो पकड़ कर पीछे आयी और लगभग दौड़ते, हाँफते, पसीने से तरबतर  कॉलेज के गेट पर पहुँची. घड़ी में देखा तो पाया कि पंद्रह मिनट बचे थे . साँस  में साँस लौट आई.
 
गेट के अन्दर घुसी ही थी कि लड़कों की चीखों से घबरा उठी-
''ओ मैडम! हाय क्या बात है''
''आई लव  यू मैडम, दू यू लव मी''
''मज़ा आ गया यार, पेपर देने में बहुत मन लगेगा''
एक लड़का बिलकुल मेरे पास आ गया और गाने लगा,
''ओ मैडम तेरे गाल, तेरे सिल्की सिल्की बाल, दिल तल्ली साडा हो गया, ओये की करिए''
मैंने नज़रें उठा आर देखा, सिर के ऊपर संजय  दत्त स्टाइल का चश्मा सुशोभित था और दाँत गुटखा खाने के कारण काले हो चुके थे, जिनसे वह ही ही कर के हंस रहा था और आँख मार रहा था.
 
मैंने अपनी चाल को तेज़ किया और स्टाफ रूम में आ गई. वहाँ  मेरे अतिरिक्त सभी पुरुष अध्यापक थे, जिनकी आँखों में उभरे हुए प्रश्नचिन्हों को मैंने ड्यूटी का कागज़ दिखा कर शांत कर दिया. कक्ष निरीक्षक के रूप में मेरे साथ जो अध्यापक थे, वे करीब ४० से ४५ वर्ष के बीच के होंगे.
 
कक्षा में पहुंचकर मैंने राहत की सांस  ली . क्या पता था कि असली  मुसीबत तो अब शुरू होंगी , बाहर जो हुआ वह  तो मात्र  ट्रेलर था. मुझे इस कमरे में देखकर दूसरे कमरे के लड़कों से रहा नहीं गया, उन्होंने खिड़की पर भीड़  लगा दी, और वहीं से चीखने लगे-
''अबे नसीब खुल गए सालों के''
अबे देखता नहीं मैडम कुंवारी है, ना सिन्दूर न मंगलसूत्र है ना मैडम ?
''कल हमारे कमरे में आइयेगा मैडम, आएंगी ना?''
अनसुना करके मैंने अपने कक्ष में नज़र दौड़ाई तो पाया कि वही संजय दत्त स्टाइल के चश्मे वाला लड़का आगे की सीट पर विराजमान था और मुझे देखकर मेज़ बजा रहा था. मैंने उसकी उपेक्षा की और कक्षा को संबोधित किया
'' आप लोग अगर नकल आदि लाए हैं तो यहाँ जमा कर दीजिये, वर्ना आपको जुर्माना और जेल दोनों ही हो सकते हैं''
यह सुनकर दो - चार लड़के समवेत स्वर में बोले-
''मैडम हम तैयार हैं, तलाशी ले लीजिये अच्छी  तरह से'' पूरी कक्षा में ठहाके गूंज उठे. मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया.
इतने में एक और बोल पड़ा-
''मैडम, आपकी शादी हो गई क्या''?
''शटअप'' मैं गरजी 
'''मैडम हमको अंग्रेजी नहीं आती, जो कहना है हिन्दी में कहो'' जवाब मिला.
''वैसे मैडम आपने लड़का नहीं ढूँढा तो यहाँ भी स्टाफ में कई कुंवारे हैं, कहिये तो बात करा दें '' सब हंस रहे थे, और मैं अपनी बचपन की इच्छा को पानी पी पी कर कोस रही थी.
सहयोगी अध्यापक से रहा ना गया, उन्होंने कोने में ले जाकर मुझे  समझाया.
''मैडम, इनके मुँह मत लगिए, आपको बाद में परेशान कर सकते हैं'' बात मेरी  समझ में आ गई थी.
इतने में वह चश्मे वाला लड़का मेरे पास आया और टक्कर मार कर बाहर पानी पीने चला गया. मैंने जलती हुई आँखों से उसे घूरा तो उसने एक आँख दबा दी और गुटखे का पूरा पाउच हलक के अन्दर उड़ेल दिया.
कुछ एक सभ्य लड़के भी इस भीड़ में थे, मुझसे बोले-
''मैडम लगा दीजिये इसे दो हाथ, बहुत अकड़ दिखाता है''
मैंने स्थिति को समझ कर उत्तर दिया-
''कोई बात नहीं, बच्चा है, गलती से टक्कर लग गयी  होगी''
''नहीं मैडम, ये तो पिछले पाँच सालों से फ़ेल होता  आ रहा है, इससे सभी सर  लोग डरते हैं''
अच्छा हुआ जो मैंने उसे कुछ नहीं कहा, मैंने मन ही मन शुक्र मनाया.
मैंने कॉपी  और पेपर बांटे, और हस्ताक्षर करने के लिए प्रवेश पत्र मांगे तो पाया कि इनकी हालत इतनी जीर्ण - शीर्ण हो चुकी थी कि पढना  लगभग असंभव था कि क्या लिखा है. शक्ल पहचानना तो लगभग नामुमकिन था.  चश्मे वाले लड़के का नंबर आया. मैंने प्रवेश पत्र माँगा तो जवाब मिला कि वह नहीं लाया है. मैंने सर से उसका नाम व अनुक्रमांक लिखने को कहा तो प्रवेश पत्र जेब से निकाल कर घृष्टता से मुस्कुराते हुए बोला '' ये लो प्रवेश पत्र''
मेरा पारा चढ़ गया, ''हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं समझे, कि जब तुम चाहो तब हस्ताक्षर करें''
वह भी भड़क गया ''ये आपकी ड्यूटी है, आपको करनी पड़ेगी''
इसी पहले कि मैं पलटवार करुँ सर ने मुझे आँखें दिखा कर रोक दिया. इस यज्ञ को निपटाने के बाद कुर्सी पर आकर बैठ गई. तभी मेरे पैरों से कागज़ का एक गोला टकराया, उठाकर देखा तो घृणा  के मारे बुरा हाल हो गया. कागज़ के पुर्जे को बुरी तरह से चबाकर गोल गोल लड्डू बनाकर फेंका गया था.  जैसे - तैसे उसे खिड़की से बाहर फेंका.
 
अभी आधा घंटा बीता होगा कि महसूस हुआ कि साथ वाली अध्यापक मुझे लगातार घूरे जा रहे हैं  मैंने नज़रें फेरी और चहलकदमी करने लगी. मैं उसी चश्मे वाले लड़के के पास जाकर बार - बार खड़ी हो जाती, मुझे शक था कि इसके पास नकल की सामग्री है. मैंने उसकी कॉपी, हाथ,  डिब्बा सबका निरीक्षण कर डाला. जब तक मैं उसके पास खड़ी थी वह पेन को मेज पर रखकर मुझे घूरता रहा.
''क्या है मैडम, कुछ काम है क्या''?
''काम क्यूँ नहीं कर रहे हो? समय गुज़रता जा रहा है''
वह बोला ''जब तक आप सर पर खड़ी रहेंगी, मैं नहीं लिख सकता, आप जाइए पहले''
मैंने उसकी आज्ञा मानी और फिर घूमने लगी, एक लड़के ने, जिसके बाल बौबी  देओल कट के थे [ उस समय वही फैशन  में था ], ने जोर से आवाज़ लेकर अंगड़ाई ली.
मैंने कहा ''ठीक से बैठो''
''मैडम, अंगड़ाई लेने की भी नहीं हो रही क्या? कर्फ्यू लगा है क्या"? पूरी कक्षा हंस पड़ी.
एक छुटका सा लड़का अपने आगे बैठे लड़के से बार बार पूछता जा रहा था, सर ने उसके पास जाकर मना किया तो अन्य गुंडा टाइप लड़के भड़क गए,
''बच्चा समझ कर हड़का रहे हो , ज़रा हमें डांट कर दिखाओ''
''अरे कुछ नहीं, मैडम के सामने रौब मार रहा है साला, बाहर निकल के आ तब बताएंगे'' पता  नहीं किस कोने से आवाज़ आई. सर बेबसी और लाचारी के चलते चुप हो गए.
''मैडम, थोडा सा बता दीजिये, यह दूसरे प्रश्न का 'ग' वाला बता दीजिये, एक लड़का बोला.
''हम यहाँ आपको बताने नहीं आए हैं, पेपर आपका है, हमारा नहीं'' मैंने कड़कते स्वर में कहा.
कहीं पीछे से आवाज़ आई, ''अबे छोड़ यार, मैडम को भी नहीं आता होगा, तभी ऐसे डांट रही है''
 
अधिकतर सभी लड़कों के शर्ट के ऊपर के सभी बटन खुले थे, सर से लेकर पैर तक की वेशभूषा ऐलान कर रही थी कि किसका आदर्श कौन सा हीरो है. सिर्फ़ दो तीन लड़कों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा कहा जा सकता है कि इन्होने साल भर से किताब का मुँह भी ठीक से नहीं देखा होगा, एक दूसरे से पूछ - पूछ कर ही सभी ने पेपर पूरा कर डाला.
 
''चुप रहो, चुप रहो'' का इतनी बार प्रयोग करना पड़ा कि मेरे सर में दर्द हो गया, लेकिन मजाल  है कोई  चुप हो जाए.
पेपर छूटने में पंद्रह  मिनट पहले कक्षा में बेहद अव्यवस्था फैल  गई, कोई चुप  होने का और  अपनी सीट पर बैठने का नाम  तक नहीं ले रहा था, हमारी  उपस्थिति से उन्हें कोई सरोकार नहीं रह गया था, उलटे एक लड़का मुझसे बोला,
'' मैडम, वो पीछे की सीट वाले लड़के से प्रश्न न.. तीन का उत्तर पूछ लाइए''
मैंने उसे जबरदस्त झाड पिलाई, वह बोला,
''मैडम आपको मेरा काम नहीं करना है तो मत करिए, मेरे पास लेक्चर सुनने का टाइम नहीं है, मैं खुद जाकर पूछ लाता हूँ''
कहकर उसने पीछे की सीट की ओर दौड़ लगा दी, मैं अवाक देखती रह गई.
 
पेपर का समय ख़त्म हो गया, जब  कॉपियां  लेने गए तो दादी और नानी, सब  याद  आ गई,
'' मैडम, बस एक मिनट, ज़रा सा रह गया है'' जिसने सारा समय इधर उधर देख कर बिता दिया था वह बोला.
''मैडम, आपका क्या जाएगा, हम पास हो जाएंगे तो, आपको तो खुशी होनी चाहिए ना, वैसे आप रहती कहाँ है? हम पास हो जाएंगे तो मिठाई  ले कर आएँगे.
अब सर को मोर्चे पर आना पड़ा, उन्होंने कॉपियां  जमा की. मैं कोने में खड़ी तमाशा देखती रही.
'' अच्छा मैडम, बाय बाय, सी यु टुमॉरो'' कहकर दो तीन लड़कों ने हवा में चुम्बन उछाल दिया.
 
हाथ में कापियां लेकर मैं और सर स्टाफ रूम की ओर चलने लगे तो सर मुझसे मुखातिब होकर बोले-.
''मैडम ,आपको बुरा तो नहीं लग रहा है ना, क्या करें ये लड़के हैं ही ऐसे, पता नहीं कैसे घरों से आए हैं''
'नहीं सर , इसमें बुरा क्या मानना , उनकी तो उम्र है ऐसा व्यवहार करने की, हाँ हम और आप ऐसा व्यवहार करें तो शोभा नहीं देगा है न ?
सर चुपचाप सर झुकाकर चल दिए.
इस प्रकार मेरी ज़िंदगी की पहली ड्यूटी पूरी हुई.
 
 
 
 
 
 
 

26 टिप्‍पणियां:

  1. जबरदस्त, दहशत भरा... हमें अपना गाँव का सरकारी स्कुल याद आ गया... यही हाल था वहां, कुछ मामले में शायद इससे भी बुरा.

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  2. हाँ हम और आप ऐसा व्यवहार करें तो शोभा नहीं देगा है न ?...
    असल सीख तो यही है...

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  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. हे भगवान रोंगटे खड़े हो गए...मान गए मास्टरनी जी..युद्ध जीतने से भी बढ़कर निकली ये ड्यूटी..बाप रे ..

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  5. badi bhayanak rahi duty.........kafi din to sapne isi ke aate rahe honge......hai na.

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  6. ओह! पढ़ाना इतना खतरनाक भी हो सकता है!
    घुघूती बासूती

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  7. बहुत सही. इस संस्मरण के अन्त की तरह, अन्त भला तो सब भला.

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  8. बाप रे बाप !
    ड्यूटी भी इतनी बडी मुसीबत!
    चलिए अंत भला तो सब भला !!

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  9. ओह सचमुच बड़ा भयावह संस्मरण था ये तो....हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी..

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  10. भयंकर संस्मरण वैसे ये उजड्ड लडके किस जगह से बिलांग करते थे ?

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  11. यह हुई न कोई बात, आज कोई टक्‍कर का मिला। जिसके पास ऐसे संस्‍समरण हों। आपने तो ऐसे वातावरण में एक दिन बिताया है अरे हमने पूरे छ: साल पढाई में और फिर बीस साल पढ़ाने में निकाले हैं। अन्‍त में तो लड़के ही तौबा करने लगे थे। डरने से कुछ नहीं होता, बस हिम्‍मत से डटे रहो।

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  12. साँस रोके आपका पूरा लेख पढ़ा फिर लगा की मामला कुछ कुछ फ़िल्मी है। क्या लडके इतनी हिम्मत कर पाते हैं की टीचर को आंख मारें या उससे टकरा जाएँ। किस सन की बाते हैं ये और जगह कौन सी थी, जानने का मन है। अगर ऐसा सच में हुआ तो वास्तव में आपबहुत बहादुर हैं। आपकी सेंडिलों में खुद को रख कर देखता हूँ तो लगता हैं की शायद मैं होता तो उसी दिन टीचर का जॉब छोड़ देता।

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  13. आपकी पहले ही साल ऐसी ट्रेनिंग होगई तो अब तो यकिनन लडके/लडकियां आपके नाम से ही कांपते होंगे और भगवान का शुक्र मनाते होंग कि हे भगवान शैफ़ाली मैडम को क्लास से दुर रखना.") जबरदस्त हिम्मत दिखाई आपने.

    रामराम

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  14. बड़ी भयानक किस्म की ड्यूटी निभाई....संस्मरण रोचक रहा...बधाई

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  15. आप काफी हिम्मत वाली हैं और साथ ही सौभाग्यशाली भी.
    वैसे, पहली-पहली बार घबराहट होना और डर लगना स्वाभाविक भी हैं.
    धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  16. मज़ा आ गया । आपकी भाषा और शैली तो अद्भुत है ।

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  17. बहुत सुन्दर और रोचक संस्मरण!
    भारतीय नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  18. वाह! बहुत सुन्दर अन्दाज! इत्ते सहज अंदाज में लिखना वाकई काबिले तारीफ़ है।
    इस बार भी ड्यूटी चल रही है न! उसके भी संस्मरण लिखिये !

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  19. विचार शून्य जी,
    ये संस्मरण २४-४-२००० का है , उस समय मेरी उम्र कम थी .मैं वेशभूषा , हेयर स्टाइल इत्यादि से टीचर का आभास नहीं देती थी. मैंने तब हल्द्वानी के एक बोयज़ कोलेज में ड्यूटी करी थी, उसी दिन वापिस आकर इस पूरी घटना को डायलोग सहित कलमबद्ध कर लिया था, जो आज इतने सालों बाद हुबहू वैसा ही टाइप कर दिया, कोलेज का नाम बताना बहुत आवश्यक नहीं है, लड़कों की हिम्मत का आप अंदाजा नहीं लगा सकते , ये उन्हें पता है कि वे किस हद तक जा सकते हैं, जो उनके डाइरेक्ट संपर्क में रहते हैं.

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  20. @शेफाली बहना,

    ये पढ़कर आपके लिए सम्मान और बढ़ गया...

    @विचारशून्य भैया,
    कभी वक्त मिले तो इम्तिहान वाले दिनों में मेरठ जैसी जगह पर जाकर देख लीजिएगा....क्या क्या नहीं होता...मेरठ कालेज में लॉ की लेक्चरार के साथ एक बार क्या हुआ था, मैं लिखने की भी हिम्मत नहीं कर सकता...

    जय हिंद...

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  21. या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

    उच्छृंखलता को झेल लेना, मैनेज कर लेना, आपा कायम रखना और सुरक्षित लौट आना सबके बस का नहीं होता। आप के संस्मरण की महत्ता इसमें है कि ऐसी परिस्थितियों में पड़ने पर बल मिलेगा। सबसे बड़ी बात यह कि आप ने अपनी विधेयात्मकता बनाए रखी।

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  22. बड़ी-बड़ी बातें न कर मैं सिर्फ़ यह बताना चाहूँगा कि इस पोस्ट को रीडर में पढ़ कर मैं पसन्द जताने के लिए यहाँ तक आया हूँ । मुझे कुछ मिनट लगे, यह समझने - पालन करने में कि कैसे टिप्पणी दे सकते हैं रीडर से ब्लॉग तक आकर। मगर आप की पोस्ट ऐसी थी कि यहाँ तक आए बिना रहा न गया।
    यह पोस्ट नवीनतम नहीं थी, अत: कुछ समय ब्लॉग पर आने के बाद भी लगा। मगर संस्मरण बहुत अच्छा है, निहायत सादा-बयानी के साथ, अपनी सब्जेक्टिविटी और ऑब्जेक्टिविटी दोनों को सफलता से दर्ज करता हुआ।
    बधाई स्वीकार करें।

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  23. काश हाथ में डण्डा न हुआ और सामने लड़कों के कपाल ।

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  24. कल आफ़िस मे इसे पढ रहा था.. एक सांस मे पढ गया सब.. समझ नही आ रहा था कि इस वाक्ये पर हंसू या इन हालातो पर क्षोभ प्रकट करू..
    आपका ये रीडर कन्फ़्यूज है..

    कुल मिलाकर एक बहुत सफ़ल पोस्ट.. आपने जिस तरीके से लिखा वो तो काबिले तारीफ़ है ही.. मज़ा तब और आता जब आपने किसी के एक दो लगा दिये होते :)

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