सोमवार, 7 जुलाई 2014

महिलाएं, चुनाव और ग्राम पंचायतें

भारत को निःसंकोच चुनावों का देश कहा जा सकता है। एक चुनाव ख़त्म होता नहीं है कि दूसरा आ जाता है। अभी महीने-दो-महीने पहले ही लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए थे, अब पंचायतों के चुनाव आ खड़े हुए हैं। प्रत्याशी एक साल चुनाव लड़ने में और बाकी के चार साल उसकी तैयारी करने में व्यस्त रहते हैं।

 

ग्राम पंचायतों के चुनाव छोटे स्तर पर ज़रूर होते हैं लेकिन इनमें लोकसभा या विधानसभा के चुनावों से कम रोमांच नहीं होता। यह चुनाव बड़े ही दिलचस्प होते हैं, जिनमें एक-एक वोट की कीमत होती है, हर वोटर अनमोल होता है, हर वोट ज़रूरी होता है। मतदाता ख़ुद को एक दिन का राजा समझने लगता है। एक दिन का राजा या तो वह अपनी शादी वाले दिन होता है या फिर इस मतदान वाले दिन। उसे गाड़ी भेजकर सम्मान-सहित मतदान स्थल तक लाया और वापस घर भी पहुँचाया जाता है। मतदान वाला दिन भी शादी वाले दिन की तरह ख़ास होता है। मतदाता रूपी दूल्हा किसी भी प्रकार का बहाना बना कर घर में नहीं बैठ सकता। एक वोट, मात्र एक वोट, से हार-जीत के फैसले हो जाते हैं, जिस स्थिति में लॉटरी से विजेता का चुनाव किया जाता है। एक वोट से हारने वाला अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पाता।  भला एक वोट से कोई हारता है क्या? जब तक मतदान-कर्मी झल्ला न जाएं तब तक वह बार-बार मतगणना करवाता रहता है। कई बार चुनाव भी मैच की तरह ड्रॉ हो जाता है। ड्रॉ के द्वारा हारने वाला अपनी हार को मरते दम तक पचा नहीं पाता और अगले चुनाव तक हर जान - पहचान वाले के आगे उस एक मनहूस वोट की माला जपता रहता है। दूसरी तरफ जीतने वाला अपनी जीत को लेकर हमेशा सशंकित रहता है कि पता नहीं कब यह जीत, हार में बदल जाए ।

 

गांवों में चुनावों की सुगबुगाहट होते ही प्रत्याशियों द्वारा महानगरों में रहने वाले अपने सभी नातेदारों और रिश्तेदारों से संपर्क साधा जाता है। महीनों पहले वोट डालने ज़रूर आने की चिरौरियां की जाती है। 'हमारी इज़्ज़त का सवाल है' कहकर दुहाई दी जाती है। महानगरों या दूसरे शहरों से वोट देने आने वाले भी सालों से वोट देते-देते बड़े ही शातिर हो गए हैं। ये अपनों और परायों में फर्क नहीं करते। साधारण किराए की बस से आते हैं और 'इमरजेंसी में टैक्सी से आना पड़ा, आपके कहने पर वोट देने आये हैं' कहकर पूरी टैक्सी का किराया प्रत्याशी से वसूल करते हैं| एहसान दिखाते हैं सो अलग। कुछ वोट देने आने वाले इससे भी एक हाथ आगे बढ़कर होते हैं। ये ट्रेन के जनरल डिब्बे से आते हैं, 'टैक्सी लाए हैं' कहकर पक्ष व विपक्ष दोनों पार्टी वालों से किराया वसूल करते हैं और वोट तीसरी पार्टी को दे जाते हैं।

 

इस साल मेरे मोहल्ले की महिलाओं के बीच जैसे चुनाव में खड़े होने की होड़ सी मच गई। जैसे-जैसे मतदान का दिन नज़दीक आता जा रहा था, चुनावी बुखार बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन उम्मीदवारों के जुलूस अलग-अलग दिशाओं से आकर एक जगह पर मिल गए। मैंने स्वयं को चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाया। नारा एक उम्मीदवार का गूँज रहा था, पैम्फलेट दूसरी ने पकड़ाया, तीसरी ने दूर से हाथ जोड़ा और अपना ख़याल रखने को कहा। चौथी ने चुनाव निशान 'अनार' सजीव रूप से  दिखाया। यूँ दिखाने की जगह अगर एक-एक अनार सबको पकड़ाती जाती तो शायद उसे वोट कुछ तो मिल ही जाते। मेरे सामने चारों को आश्वासन देने सिवाय कोई और रास्ता नहीं बचा था।

 

पंचायत चुनावों के पोस्टर भी कम आकर्षक नहीं होते। जबसे पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने लगी हैं तबसे चुनाव खासे दिलचस्प हो चले हैं। तरह-तरह की मोहक मुद्राओं में बड़े ही रोचक चेहरे दिखाई पड़ते हैं। अधिकतर महिलाएं सिर पर पल्लू रख कर फोटो खिंचवाना अच्छा मानती हैं। इससे आज्ञाकारी बहू की छवि उभर कर आती है। इस आज्ञाकारिता का प्रत्यक्ष प्रमाण जनता उनका चुनाव में खड़े होने को मानती है। जनता जानती है कि कौन अपने पति की राजनैतिक आकांक्षा और कौन अपनी सास की सामाजिक महत्वाकांक्षा को शिरोधार्य करके चुनाव में खड़ी है। इक्का-दुक्का प्रत्याशी पल्लू को सिर पर धरे बगैर फोटो निकलवाती हैं। ऐसी महिलाओं को बुजुर्गों के वोट नहीं पड़ते। पोस्टरों पर तरह-तरह की भाव-भंगिमाएं दिखती हैं। किसी की पूरी बत्तीसी दिखती है तो किसी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान। कोई न हंसती है न मुस्कुराती है, बस गंभीर मुद्रा में दिखती है मानो कह रही हो कि पहले जीत जाऊं फिर जी भर कर हंस लूँगी। अधिकतर पोस्टरों में पत्नी की बड़ी फोटो के नीचे पति महाशय की फोटो चस्पा होती है, जिससे बताया जाता है की ये फलाने-फलाने की पत्नी हैं। सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होने कारण वे चुनाव लड़ पाने सक्षम नहीं हैं, अतः उनके बदले इन्हें वोट दें। एक ही पोस्टर में उम्मीदवार की और उसके निवेदक पति की फोटो होने से  कभी-कभी प्रत्याशी को बहुत नुकसान उठाना पड़ जाता है, चुनाव-चिन्ह के लिए पोस्टर में जगह ही नहीं बचती। चुनाव चिन्ह एक कोने में, बहुत ढूंढने पर दिखाई पड़ता है।  देखने वाले को पति-पत्नि दोनों के नाम तो याद रह जाते हैं पर चुनाव निशान याद नहीं रहता। किसी-किसी पोस्टर में पति महाशय गायब होते हैं, लेकिन ऐसे पोस्टर बस इक्के-दुक्के दिखाई देते हैं। पिछले पंचायत चुनावों में और इस बार के पंचायत चुनावों में एक बड़ा फर्क यह देखने को मिला कि इस बार चुनाव लड़ने वाली महिला की तस्वीर खिसक कर पोस्टर में सबसे ऊपर आ गई। पति की फोटो बिलकुल नीचे या छोटी सी किनारे पर दिखाई दे रही है जबकि पिछले चुनावों में पति की फोटो बिलकुल बराबर में और अक्सर पत्नी की फोटो से ऊपर लगी रहती थी। 

 

मुझे अच्छी तरह से याद है कि करीब दसेक साल पहले जब महिलाएं चुनाव लड़ती थीं तो उनकी शक्ल भी कोई नहीं पहचानता था। सामने आकर वोट मांगने वाली महिला को लोग अच्छी नज़रों से नहीं देखते थे। महिला उम्मीदवार की फोटो वाले पोस्टर नहीं चिपकाए जाते थे। सभी जगह उसका पति ही हाथ जोड़कर वोट माँगता नज़र आता था। लोग भले होते थे, पत्नी के नाम पर पति को वोट देने में किसी को आपत्ति नहीं होती थी। ऐसी महिला को बहुत सुशील समझा जाता था। लेकिन विगत कुछ वर्षों से महिलाओं के सामने न आने पर लोग बेधड़क होकर उनके पतियों से पूछने लगे हैं '' जो चुनाव लड़ रही है, वह वोट मांगने क्यों नहीं आई ? अगर वह बाहर नहीं निकलेगी तो गाँव के काम क्या खाक करेगी ''? ऐसी हालत में धीरे - धीरे महिलाओं का सामने आना ज़रूरी होने लगा और विगत चुनावों से वे स्वयं वोट मांगने घर - घर जाने लगीं।   


ऐसे समय में, जब हम सबको महिला उम्मीदवारों को देखने की आदत पड़ चुकी हो, तब उम्मीद के विपरीत इस चुनाव में एक उम्मीदवार के पति ने प्रचार का मोर्चा संभाल रखा था। वह एक बड़े से जुलूस के साथ घर-घर जा रहा था। गेट खटखटाकर वह दल-बल समेत अंदर आ गया। उसने मेरे आगे अपने हाथ जोड़े और अपना सर नीचे ज़मीन तक झुका दिया। यह देखकर मैंने हड़बड़ाहट में उसे ही उम्मीदवार समझ कर आश्वासन देकर टालने की नीयत से कहा, ''चिंता मत कीजिये, आपको तो हम बहुत पहले से जानते हैं। निश्चिन्त रहिये, हमारा वोट आपको ही जाएगा ''। मेरे ऐसा कहते ही उनका चमचानुमा साथी झट से बोल पड़ा  ''नहीं, ये नहीं, इनकी पत्नी चुनाव में खड़ी है, यह चुनाव निशान उनका है ''। बिना पैम्फ्लेट देखे बोलने की अपनी पुरानी आदत पर मैं शर्मिंदा हो गयी। मैंने दल को गौर से देखा और पाया कि उसकी पत्नी जुलूस में नहीं थी। मैंने कहा, '' इनकी पत्नी तो दिख नहीं रही है ''। उसने बिना शर्मिंदा हुए जवाब दिया '' वो ज़रा बीमार हैं, इसीलिये नहीं आ पाईं ''।   

 

इन चुनावों में चुनाव चिन्ह भी खासे दिलचस्प होते हैं। उम्मीदवारों को ज़मीन से जुड़ें हुए निशान आबंटित किये जाते हैं। इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो आपसे कहा जा रहा हो कि पंजा, हाथी, साइकिल, कमल की हवाई दुनिया से बाहर आकर साधारण इंसान की दुनिया में आ जाओ, जहाँ अनार, अनानास, कटहल, अनाज की बाली, गैस का चूल्हा, कढ़ाई, कैमरा, टी. वी. इत्यादि मौजूद हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि प्रत्याशियों को मोबाइल, एल. सी. डी., लैपटॉप जैसे हाई टेक चिन्हों के ज़माने में ऐसे घरेलू चिन्हों को दिया जाना पिछड़ेपन की निशानी है। इसके विपरीत मेरा यह मानना है कि इस प्रकार के चुनाव चिन्ह भारतीय संस्कृति को जीवित रखने का कार्य करते हैं, अन्यथा इमली और कलम - दवात जैसी वस्तुओं को आज की पीढ़ी कैसे पहचानेगी?  

 

चुनाव चिन्हों के आवंटन में भी अजीब घाल-मेल था। लग रहा था कि जैसे उपरवाले ने इसकी कमान अपने हाथों में थाम रखी हो। जिसको जो मिलना चाहिए था, वह उसके बदले दूसरी को मिल गया था। जिस उम्मीदवार को अनानास का चिन्ह मिला था वह भूतपूर्व विधायक की पत्नी थी। विधायक बनने के बाद से उनकी शक्ल किसी ने नहीं देखी। चुनाव चिन्ह और वे एक दुसरे के पूरक थे। उनसे मिलना उतना ही मुश्किल था जितना अनन्नास को छीलना। दूसरी उम्मीदवार डबल एम. ए. और पी. एच. डी. है। एक पब्लिक स्कूल में टीचर है। उसे शिकायत है कि उसे चुनाव चिन्ह कलम-दवात मिलनी चाहिए थी और मिल गयी कुल्हाड़ी। जिसे कलम और दवात चिन्ह मिला है वह केवल हाई स्कूल पास है।

 

कुछ उम्मीदवारों के साथ बड़ी विडम्बना हुई। जब उन्होंने चुनाव लड़ने का निश्चय किया था तब चुनाव तिथि घोषित नहीं हुई थी और न ही चुनाव चिन्ह आबंटित हुए थे। उन्हें जीत का भरोसा था, जिसके चलते उनके पोस्टर हर खंभे पर कई महीनों पहले ही चिपक गए थे। लोगों को उनका नाम याद हो गया। महीनों बाद जब चुनाव की तिथि की घोषणा हुई और चुनाव चिन्ह आबंटित हुए तब उन्हें नए पोस्टर चिपकाने पड़े। नए पोस्टरों में सबसे बड़ी उनकी फोटो, उससे छोटी उनके पति की फोटो और सबसे अंत में बचे हुए छोटे से कोने में उनका चुनाव चिन्ह छपा था। लोगों को अब तक उनके नाम रट चुके थे। चुनाव चिन्ह चाहने पर भी याद नहीं आ रहे थे। जब चुनाव चिन्ह याद आ रहे थे तो नाम गायब हो जा रहे थे।   

 

कहीं तीन तो कहीं चार बैलेट पेपर होने से अक्सर पता ही नहीं चल पाता है कि कौन किस पद हेतु खड़ा है। उस पर नाम भी न छपे होने से वोट देने वाला इतना कन्फ्यूज़ जाता है कि कई बार मतदान कर्मियों से ही कह बैठता है, ''मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा, आप ही बता दीजिये किसको डालूँ वोट? '' या '' मैं तो बस प्रधान पद के प्रत्याशी को वोट डालने आया हूँ किसी और को नहीं जानता हूँ। ऐसा कीजिये, बाकी तीन में आप ही लगा दीजिये ठप्पा''। ऐसे में मतदान कर्मी अकबका कर एक दूसरे का मुंह देखने लगते हैं। हर तीसरा मतदाता जब यही बात दोहराता है तो उन्हें यह लगता है कि इस मुहर को अपने माथे में ठोक लें।

 

कभी-कभी बहुत मुश्किल पेश आ जाती है। मेरे घर के बिल्कुल पड़ोस में रहने वाली महिला को भी इस बार चुनावी कीड़े ने काट लिया। एक दिन वह हाथ जोड़कर वोट मांगने द्वार पर आकर खड़ी हुई तो मैं उससे पूछ बैठी, '' कहिये क्या काम है?'' इस पर वह अपमानित महसूस करते हुए कहने लगी, '' लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं, आपके पड़ोस में रहती हूँ। आपके घर के सामने ही मेरा पोस्टर लगा हुआ है। मैं इस बार पंचायत चुनाव में खड़ी हूँ|'' मैं शर्मिन्दा होकर माफी मांगने लगी। उसके जाने के बाद जब मैंने गौर से उसके पोस्टर को देखा तो महिलाओं की फेसबुक में लगाने वाली फोटो और असल जीवन की शक्ल में जितना अंतर होता है, उतना ही अंतर उसके और उसके पोस्टर के बीच में मुझे नज़र आया। अपने पोस्टर से वह इतनी भिन्न लग रही थी कि मैं चाहती भी तो उसे पहचान नहीं पाती।

 

प्रत्याशियों के नाम बैलेट पेपर पर छपे नहीं होने के कारण चुनाव चिन्हों पर आश्रित आम मतदाता ने इस तरह से अपने गाँव की सरकार बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया।  


इनको वोट न देने के कारण ये रहे -


कटहल और अनानास को छीलने में बहुत दिक्कत होती है। सिलेंडर दिन पर दिन महँगा होता जा रहा है। अनार खून बढ़ाता है पर हमेशाबजट से बाहर होता है। इमली बचपन में अच्छी लगती है पर अब दांत खट्टे कर देती है। कैमरा तो अब फ़ोन में आने लगा है। 


इनको वोट देने के कारण ये रहे -    

 

अंगूठी पर दिल न चाहते हुए भी अटक जाता है। उगते सूरज को तो दुनिया सलाम करती है। कलम - दवात का सम्मान हर हाल में होना ही चाहिए। कार तो अब हर घर की ज़रूरत में शामिल हो गयी है।     

 

इस तरह चुनाव रूपी यज्ञ में आख़िरी आहुति देकर वह अगले पाँच साल तक निश्चिन्त हो गया।   

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी रही चुनाव गाथा..बधाई

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  2. बहुत ही बढ़िया आलेख। बेहद सधे अंदाज में आपने ग्राम चुनाव का दृश्य प्रस्तुत कर दिया।

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  3. गांव में भी शहर से ज्यादा राजनीति घुस आयी है ....कहीं कहीं तो ऐसे वक्त पर कई लोग बड़े आक्रामक रुख अपना लेते हैं
    सार्थक सामयिक चुनाव चिंतन प्रस्तुति ..

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज गुरुवार १० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- राम-रहीम के आगे जहाँ और भी हैं – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

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