शनिवार, 27 मई 2017

बिना शीर्षक ----व्यंग्य की जुगलबंदी ३५


एक दिन ऐसा भी हुआ कि सारे अखबारों में से मोटे - मोटे अक्षरों में छपने वाले शीर्षक गायब हो गए | सारा दिन न्यूज़ चैनलों से ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश नहीं हुई | व्हाट्सप्प से एक भी हिंसक वीडियो वायरल नहीं हुआ | 

पृथ्वी के फलाने - फलाने दिन खत्म होने की भविष्यवाणी नहीं हुई | मौसम बस मौसम की तरह आया किसी डरावने राक्षस की तरह नहीं आया कि जिसके आने से पहले चेतावनी देनी पड़े | 

गर्मी का मौसम आया तो बिना डराए हुए निकल गया | 'जल्दी ही खत्म हो जाएगा पानी' | 'प्यासे मरेंगे धरती वासी'|'और झुलसाएगी गर्मी'|'आने वाले दिनों में तापमान बढ़ता ही जाएगा' | लू के थपेड़े झेलने के लिए तैयार रहें '| 'अभी और तपेगी धरती' जैसे भयानक समाचार नहीं सुनाई पड़े | 
गर्मी बचपन के दिनों की तरह आई | जितनी बार चाहा नहा लिया | नहाने में डर नहीं लगा न ग्लानि हुई कि मैंने नहा कर धरती का सारा पानी खत्म कर दिया | बिना कैलोरी की टेंशन किये दिन में चार बार अलग - अलग किस्म के शरबत पिए | 'लू लग जाएगी' कहकर किसी पड़ोसन ने डराया नहीं और नंगे पैर मोहल्ले भर की ख़ाक छानती रही | भरी दोपहरी में दोस्तों के साथ आई स्पाय या सेवन टाइम्स का खेल खेला | गूलों में बिना गन्दगी या बैक्टीरिया की टेंशन के दल - बल के साथ दिन भर घुसे रहे | जब तक मम्मी डंडा लेकर मारने के लिए नहीं आ गयी तब तक निकले ही नहीं | रात को छत पर कई बाल्टियां पानी डालकर, दरी बिछाकर, ओडोमॉस लपेटकर, गप्पें मारकर सो गए | बिजली के आने न आने की परवाह नहीं करी | ए. सी. लगाने के बाद मीटर के दौड़ने का तनाव नहीं हुआ और चैन से नींद आई | दिन में हज़ार बार फ्रिज खोला और दिन भर बर्फ निकाल कर चूसते रहे | इंफेक्शन, खांसी, जुखाम का भय नही | सस्ती आइसक्रीम के ठेले पर टूट पड़े | गन्दा पानी, इंफेक्शन, कीटाणु जैसे शब्द हमारी डिक्शनरी से बाहर हो गए | 


जाड़े का मौसम जब आया तब आनंद ही आनंद लेकर आया  | 
किसी ने आकाशवाणी नहीं करी | जम जाएगी धरती | हिम युग आने वाला है | ब्रेन स्ट्रोक, ब्लडप्रेशर वाले रहें सावधान | जम जाएगा नलों का पानी | खाने - पीने की वस्तुओं के दाम आसमान पर | कौन बचाएगा धरती को | पूरी सर्दी किसी मौसम वैज्ञानिक ने जनता को सावधान नहीं किया | सब असावधानी से रहे और चैन से रहे | 

जाड़ा बचपन की तरह आया | एक पतला सा स्वेटर पहने हुए, न इनर , न जूते, न मोज़े, न टोपी, न मफलर, न कफ सीरप,न डॉक्टर के चक्कर लगे | नाक बहती रही, खांसी खुद ब खुद बोर होकर बिना दवाई के ठीक हो गयी | बिना हीटर और ब्लोवर के एक ही रजाई में सारे भाई - बहिन सो गए | सन टेनिंग, त्वचा का शुष्क होना, होंठ और गाल फटना इत्यादि छोटी मोटी समस्याओं की टेंशन से दूर सारा दिन धूप में खेलते - कूदते हुए गुज़ार दिया | जाड़े के मौसम में यह न खाएं, वह न पीएं ऐसा किसी डाइट एक्सपर्ट ने नहीं बताया | 

बरसात जब आई तो पानी लेकर आई | बाढ़ आएगी तो कहाँ- कहाँ विनाश होगा | बाँध टूटेंगे तो कहाँ तक के शहर डूब जाएंगे | भूस्खलन से सावधान | बह जाएगी एक दिन दुनिया |  आकाश से बरसी आफत जैसे खतरनाक बमवर्षक शब्दों की बमबारी नहीं हुई | 

बचपन की तरह बरसी बरसात | छत के पाइप के रास्ते से आने वाले गंदे पानी की बौछारों के नीचे सिर लगाकर खड़े हो गए | जिधर ज़रा सा पानी जमा हुआ देखा उधर कागज़ की नाव बनाकर तैरा दी | ज़ोर - ज़ोर से उस पर खड़े होकर छप - छप करी और एक दूसरे को उस पानी से भिगाने का सुख महसूस किया | पानी में मेंढक बनकर उछले | सांप बनकर रेंगे | चिड़िया बनकर मुँह खोलकर बारिश में खड़े हो गए |  मूसलाधार बारिश के दिन छाता और बरसाती दोनों एक साथ लेकर पड़ोस में रहने वाली मौसियों और चाचियों के घर जाकर उन्हें अचंभित किया | ओले बटोरे और उन्हें मटके में भरा | कभी हथेली में उठा कर उसके पिघलने तक इंतज़ार किया | हाथ सुन्न पड़ जाने पर हाथों को बगल में दबाकर गर्म करने की कोशिश करी |  सड़क किनारे खड़े ठेले से गोलगप्पे खाने में पेट में कभी इंफेक्शन नहीं हुआ | मच्छर, डेंगू, मलेरिया नामक बीमारियों की दुनिया से परे शरीर से खून चूसते मच्छरों को पट - पट करके मारा | 'किसने कितने मच्छर मारे' के आधार पर उस दिन का विजेता घोषित किया | 

दिन जब एक साधारण दिन की तरह आया  | 
किसी ने नहीं डराया कि तृतीय विश्वयुद्ध किस बात पर होगा ? कौन बन रहा है महाशक्ति ? परमाणु हथियार किसने कर रखे हैं तैयार ?अगर परमाणु हमला हुआ तो कहाँ तक असर होगा ? कितने लोग मारे जाएंगे ? आने वाली पीढ़ियां इस हमले की वजह से कितनी बीमारियां झेलेगी ? कितने राष्ट्र नेस्तनाबूद हो जाएंगे | किसका मिट जाएगा नामोनिशान ? कितने सालों तक तबाहियाँ होती रहेंगी ? कौन - कौन देश एक साथ लड़ेंगे ? किस - किस हथियार से युद्ध लड़ा जाएगा ? 

दिन आया तो बचपन की तरह | खेला - कूदा | खाया - पिया | दौड़े - भागे | सोए - उठे | उठे - सोए | मार - पीट | लड़ाई - झगड़ा | कट्टी - सल्ला | सुलह - सफाई | छुप्पन - छुपाई | सुबह रंगोली | शाम चित्रहार | गुड़िया की शादी | अपनी रसोई | छोटी - छोटी पूरियां | गाना - बजाना | नाच | मम्मी की साड़ी और लिपस्टिक | पापा का चश्मा | नानाजी की लाठी | नानी की कहानियां | रामलीला का खेला खेलते दिन बीत गया |  

रात को मैंने बच्चों से पूछा, '' आज दिन भर में कुछ भी डरावना नहीं हुआ बच्चों | किसी अखबार मे रेप, दुष्कर्म, अपहरण, आतंकवाद, हत्या की खबर नहीं है | सारे चैनल सुनसान पड़े हैं | आज तुम परियों की कहानी सुनना चाहोगे ?
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-05-2017) को
    "इनकी किस्मत कौन सँवारे" (चर्चा अंक-2635)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १७०० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " अरे दीवानों - मुझे पहचानो : १७०० वीं ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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