मंगलवार, 20 जून 2017

गर्म फुल्का ---- लघु कथा


आज चौथा दिन है जब मधु बिना रोटी बनाए सो गयी | रोज़ - रोज़ ब्रेड खाकर पेट नहीं भरा जा सकता | मानता हूँ कि वह भी नौकरी करती है और मेरे बराबर तनख्वाह पाती है, लेकिन वह अकेले ही तो नौकरी नहीं करती | कई औरतें नौकरी करती हैं और घर का काम भी करती हैं | बच्चे भी संभालती हैं | अभी तो हमारा बच्चा भी नहीं है | बच्चा होने के बाद कैसे मैनेज करेगी मधु ? 

रात नौ बजे ही उनींदी हो जाती है मधु | कहती है, सब्जी बन गयी है जब रोटी खानी हो तो उठा देना | गर्म - गर्म फुल्के सेंक दूंगी | फिर घनघोर नींद में डूब जाती है | अब उसे नींद से कैसे उठाऊं ? इतनी मासूम लगती है सोते हुए | एकदम किसी छोटे बच्चे की तरह | उसको उठाना पाप लगता है | रोज़ - रोज़ भूखा भी नहीं सोया जाता | मधु तो ऑफिस से आकर ही खाना खा लेती है फिर रात को कुछ नहीं खाती | उसका मानना है कि दिन ढलने तक भोजन कर लेना चाहिए इससे खाना अच्छी तरह पच जाता है | मैं ऐसा नहीं कर सकता | मुझे दस बजे से पहले भूख ही नहीं लगती | 

आज बात करनी ही पड़ेगी चाहे इसके लिए मुझे उसे नींद से ही क्यों न उठाना पड़े | मैंने कब चाहा कि मुझे खाने में गर्म फुल्का ही चाहिए ? मैं तो बस पेट भरना चाहता हूँ फिर चाहे फुल्का गर्म हो या ठंडा | क्या फर्क पड़ता है ? मैं कई बार कह चुका हूँ कि रोटी बनाकर सोया करो लेकिन उसकी वही ज़िद ''गर्म फुल्का सेंक दूंगी, उठा देना''| जानती है वह कि मैं नहीं उठाऊंगा फिर भी कहती है | 
 
इससे तो पापा का ठीक रहा | मनपसंद खाना न मिलने पर थाली पटक देते थे | माँ दोबारा खाना बनाती थी | पापा की इस गंदी आदत को देखकर मैंने बचपन से ही यही निश्चय कर लिया था कि खाने के लिए कभी अपनी पत्नी को तंग नहीं करूँगा | लेकिन अपनी इस अच्छी आदत से मुझे क्या मिला ? पिछले चार दिनों से बिना रोटी के सब्जी खा रहा हूँ | ऐसा हफ्ते में तीन दिन तो होता ही होगा | ऑफिस में सब पूछते हैं कि क्या बात है बहुत सुस्त लग रहे हो ? मैं फीकी सी हंसी हंस देता हूँ | 

नहीं ! मुझे नहीं चाहिए इसकी नौकरी | इतनी तनख्वाह तो मुझे मिलती ही है कि घर का खर्च चला सकूं | नहीं रहेंगे शान - शौकत से | नहीं खरीदेंगे अपना घर, गाड़ी | इनके बिना क्या लोग दुनिया में रहते नहीं हैं ? हम भी रह लेंगे |  

''मधु ! उठो मधु ! मुझे तुमसे बहुत ही ज़रूरी बात करनी है''|   
मधु ने आँखें मिचमिचाई | 
''ओह ! तुम हो | क्या बात है ? खाना खा लिया ''?
''नहीं ! तुम फुल्के .... ''| 
''ओह ! सॉरी डार्लिंग ! मैं फुल्के नहीं बना पाई | क्या करूँ ? इतना थक जाती हूँ कि बिस्तर देखते ही नींद आ जाती है | बस में बैठे - बैठे पैरों में इतना दर्द हो जाता है कि उठा ही नहीं जाता | मन करता है कि छोड़ दूँ ऐसी नौकरी को''| 
''चलो जाने दो | रात को खाना न भी खाया तो कोई हर्ज़ नहीं | तुम अपने पैरों का इलाज कराओ | अभी से इतना दर्द होना ठीक नहीं ''| मैं क्या कहना चाहता था और क्या कह रहा था | 
''हाय मेरे तलवे'' मधु ने लेटे -लेटे ही अपने पैरों की अंगुलिया घुमाई | 
''लाओ मैं दबा देता हूँ '' मेरे हाथ अपने आप ही उसके तलवों की ओर बढ़ गए | 
'' तुम कितने डार्लिंग हो यार ''| मधु बड़बड़ाई और थोड़ी ही देर में घुर्र - घुर्र करके सो गयी | 
'' गर्म फुल्का ..... '' मैं बड़बड़ाता हूँ | 

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है, लगा कि अपनी ही कहानी है ��

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  2. Wow यही देख रही हूं अभी जीवंत ,इसे रिकार्ड करने का मन हो गया,पॉडकास्ट बनाने के लिए अगर आपकी अनुमति हो

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (22-06-2017) को
    "योग से जुड़ रही है दुनिया" (चर्चा अंक-2648)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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