शुक्रवार, 23 जून 2017

आमदनी और सफाई ; एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

मेरी ज़िंदगी में ऐसे कई लोग आए, जिनके व्यवहार के आधार पर मैंने कुछ सूत्रों और कहावतों का निर्माण किया है | इन सूत्रों में से एक सूत्र यह रहा - ''ज्यों - ज्यों इंसान की आमदनी बढ़ती जाती है त्यों - त्यों उसके घर में होने वाली सफाई का ग्राफ भी बढ़ता जाता है''| 

इस सूत्र को मैं एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करूंगी | 
  
बहुत साल पहले मेरी एक सहेली हुआ करती थी | तब वह मेरे जैसी निम्न वर्गीय थी | हफ्ते में दो बार झाड़ू और एक बार पोछा लगाया करती थी | उसके घर में चप्पल - जूते पहिनकर कहीं भी घूम सकते थे | मैं उस बेतरतीब, बिखरे हुए घर में जब भी जाती थी, कपड़ों के ढेर को हटाकर अपने बैठने के लिए स्वयं जगह बनाती थी | वह हंस कर कहती थी, ''जगह तो दिल में होनी चाहिए ''| दिल की बात पर भला कौन सहमत नहीं होगा | 

ऐसे ही एक बार उसके बिस्तर पर रखे हुए कपड़ों के ढेर को सरकाकर, बैठे हुए हम दोनों दुनिया जहान की बातें कर रहे थे | गलती से बिस्तर का गद्दा मुझसे सरक गया | मैंने उसे ठीक करने की कोशिश करी तो क्या देखती हूँ गद्दे के नीचे पूरा एक लोक बसा हुआ है | मुझे देश के वैज्ञानिकों पर तरस आया कि वे बिला वजह चाँद और मंगल पर रहने की जगह ढूंढ रहे हैं अगर उन्हें इस गद्दे के नीचे की दुनिया का दीदार करवा दिया जाता तो वे अपने अन्य ग्रहों पर जीवन ढूंढने के अभियान को तिलांजलि दे देते |  

उस गद्दे के नीचे किताबें, अखबार, ज़रूरी कागज़, होम्योपैथी की खाली शीशियां, दवाई के रेपर, पुरानी चिट्ठियां, महिलाओं की पत्रिकाएं, शादी के कार्ड, कपडे, मोज़े, चम्मचें, सुई धागा, बिजली - पानी के बिल, लिपस्टिक, पाउडर, बिंदी, रूमाल, पर्स, कैसेट, कंगन, कटे हुए नाखून, बालों के गुच्छे, पॉलीथिनों का ढेर जो तकिया होने का भरम दे रहा था, इसके अलावा भी कई वस्तुएं थीं जिन्हें मैं एक नज़र में नहीं देख पाई | मैंने इतने दिव्य दर्शन से घबराकर गद्दा वापिस ठीक से लगा दिया और उसके ऊपर बैठ गयी | दोस्त को कोई फर्क नहीं पड़ा | वह हँसती रही | मैंने मन ही मन अपनी दोस्त को प्रणाम किया उसके गद्दे को नमन किया जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में समेटे हुए था | 

उनके घर में मक्खी - मच्छर, मकड़ियों के बड़े - बड़े जाले, काक्रोच ,चूहे, छुछुंदर, खटमल सारे कीट - पतंगे वसुधैव कुटुम्बकम वाले भाव से रहते थे | सब के सब उनके स्नेह की डोरी से बंधे हुए रहते थे | इनमे से किसी की भी हत्या उसे पाप लगता था | '' इस दुनिया में सबको रहने का अधिकार है'', यह उसका प्रिय वाक्य था |   

उसका घर मुझे बहुत प्यारा था | उस घर का कोना - कोना अतिथियों का स्वागत करता सा लगता था | उन बेजान दीवारों से स्नेह टपकता था और छत से अपनत्व की बरसात | जब भी वहां जाना होता था वह मिन्नतें करके दो - तीन दिन रोक ही लेती थी | 

उसकी रसोई भी एक नमूना थी | रसोई के अधिकतर डिब्बे ढक्कन विहीन होते थे | डिब्बों में इतनी चिकनाई लगी होती थी कि हाथ से पकड़ते ही फिसल कर नीचे गिरने का डर रहता था | कहीं आटा बिखरा रहता था तो कहीं सब्जियों के छिक्कल पड़े रहते थे | मसाले के डिब्बे में सारे मसाले एक - दूसरे से मिलकर ''मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा'' गाते थे | एक कटोरी निकालो तो दो गिलास नीचे गिर जाते थे | कपों में दरारें पडी होती थीं, किसी - किसी का तो हैंडल ही नहीं होता था | पूरी रसोई में कहीं किसी किस्म का कोई पर्दा नहीं | कोई दुराव - छिपाव नहीं | है तो सामने है, नहीं है तब भी सामने है | 

उसके घर जाओ और खाली नमकीन, बिस्किट खाकर आ जाओ ऐसा कभी नहीं हो सकता | अपनी बिखरी, गंदी, धूल - धक्कड़ से भरी हुई रसोई में जब वह जाती थी तो आधे घंटे के अंदर दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, रायता, चटनी, सलाद ,खीर के साथ ही बाहर आती थी | खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि पेट ही नहीं भरता था | पेट भर जाने पर भी वह ठूंस - ठूंस कर पेट के फटने तक खिलाती रहती | घर के लिए मिनटों में बिना बताए डिनर भी पैक कर के हाथ में थमा देती थी | 

उस खाने की ख़ास बात यह होती थी अगर उसे बनते समय देख लिया तो एक कौर भी मुंह के अंदर नहीं जाएगा | अगर कोई गलती से खाना बनाने के दौरान उनकी रसोई में चला जाता था तो उसे लगता था कि अभी- अभी कोई सूनामी यहाँ से होकर गुज़री है | सारे बर्तन एक दूसरे से टकराए हुए इधर - उधर गिरे पड़े रहते थे | कॉकरोच यहाँ से वहाँ रेस लगाते थे | नाली में पानी जमा होकर आस - पास के इलाके तक फ़ैल जाता था | उस पानी में कई जीव - जंतु विचरण करते दिख जाते थे | गैस का चूल्हा पहचानना मुश्किल होता था | 

उस खाने में स्नेह था | गंदगी दिख कर भी महसूस नहीं होती थी | वे दिन बहुत प्यारे थे | 

कुछ समय बाद हमारा दूसरे शहर में स्थानांतरण हो गया | वह उसी शहर में रही | 

उसका समय बदला | भाग्य ने करवट ली | उनके पति का प्रमोशन होता गया | पद बढ़ते गया | घर में लक्ष्मी छप्पर फाड़ कर ही नहीं दीवारों को लांघ कर, खिड़कियों, रोशनदानों और दरवाज़ों को तोड़ कर घर - आँगन में प्रवाहित होने लगी | 

हर प्रमोशन के साथ मेरी मित्र का सफाई का शौक बढ़ता गया | घर में कई नौकर - चाकर आ गए | सुबह, दिन, शाम यहाँ तक की रात को भी डिटॉल वाला पोछा लगने लगा | काम वालियों को दिन में दो बार डस्टिंग का आदेश दे दिया गया | वह स्वयं मेज़ पर हाथ फिर कर धूल चैक करती थी | धूल का एक भी कण अंगुली में चिपका तो समझो क़यामत आ गयी | गुस्से के मारे वह बौखला जाती | पागलों जैसा बर्ताव करने लग जाती | 

झाड़ू - पोछे की क्रिया के दौरान घर वालों की हर किस्म की क्रिया पर बैन लग जाता था | पोछे के पाने में ज़रा सी गन्दगी देख कर उसका ब्लड प्रेशर हाई होने लग जाता था और चीखने की आवाज़ पूरे घर में गूँज जाती थी | काम वालियों को दोबारा नहा कर ही घर के अंदर घुसने का आर्डर था | घर का कोना - कोना बैक्टीरिया प्रूफ हो चुका था | लिपस्टिक, पावडर के डिब्बे तक रोज़ डिटॉल से धुलने लगे | 

भूले से भी कोई मय चप्पलों के अंदर नहीं आ सकता | आगंतुकों के लिए डिटॉल से धुली चप्पलें दरवाज़े के बाहर रखी रहती थी | 

खुलकर हंसना में भी उन्हें खटका लगा रहता था की कहीं बैक्टीरिया अपने दल - बल समेत आक्रमण न कर दे |  

किसी के खांसने व छींकने भर से उसे वायरल का खतरा मंडराता दिखता था | 

उसकी समृद्धि और सफाई के चर्चे इधर - उधर से कभी - कभार सुनाई दे जाते थे | मन में उससे मिलने की उत्कंठा ने एक दिन बहुत ज़ोर मारा और मैं पुरानी दोस्ती को याद करके मैं उससे होली मिलने चली गयी | मैंने हाथों में गुलाल लेकर उसके गाल में मलना चाहा तो उसे करंट मार गया, ''छिः छिः यह क्या कर रही हो ? सब जगह गन्दा हो गया', अब फिर से सारी सफाई करनी पड़ेगी'' | मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया | मैं ''सॉरी- सॉरी कहकर पीछे हट गयी | 

वह इतना गुस्सा हो गयी कि सामान्य शिष्टाचार तक भूल गयी और दनदनाती हुई घर के अंदर चली गयी | मैं अपराधिनी की तरह सिर झुकाए हुए उलटे पैरों लौट गयी | 

सुनती हूँ कि उसके बच्चे दीपावली में पटाखे नहीं जला सकते | दिए जलाना उन्होंने कब का छोड़ दिया क्योंकि इससे उनके बेशक़ीमती फर्श पर गंदगी हो जाती है | होली पर गेट के बाहर ताला लगाकर वे सपरिवार अंदर बैठ कर टी. वी. देखते हैं | 

उसके दोस्त या रिश्तेदार उसकी शान - औ - शौकत, धन - दौलत इत्यादि बात से प्रभावित होकर उसके घर आना चाहते हैं, रुकना चाहते हैं, पर वह किसी को रोकने की तो छोड़ ही दो आधे घंटे से अधिक अगर वह बैठ गया तो स्वयं अंदर चली जाती है | 

अब उसके बिस्तर गद्दे को उठाना तो दूर कोई उस पर बैठ भी नहीं सकता | 

घर जाने पर अब चाय ही मिल जाए तो अहो भाग्य समझो | बेशक अलमारी में सजी हुई बेशकीमती क्रॉकरी आप देख सकते हैं, सराह सकते हैं पर उस पर कुछ परोसा जाएगा यह सोचना मूर्खता होगी |  

वह गर्व से सबको बताती है कि मेरे घर का फर्श इतना चमकता है कोई अपना चेहरा देख सकता है, लेकिन लोग हैं कि उसके घर उसके फर्श पर अपना चेहरा देखने जाते ही नहीं | 

वह अमीर घर के लोगों से मेल - जोल बढ़ाना चाहती है लेकिन वे लोग उसे घास नहीं डालते | वे लोग उस से मिलते ही याद दिलाते हैं '' तुम्हे याद है तुम पहले कैसे रहती थी ? अब तुम्हारे दिन कितने बदल गए हैं, सच ही कहा गया है कि घूरे के भी दिन फिरते हैं ''| घूरा सुनकर उसके माथे पर बल पड़ जाते हैं | 

वह बहुत परेशान रहती है | पुराने लोगों को भूल जाना चाहती है लेकिन पुराने लोग उसे नहीं भूलते | 

वह उन गरीबी के दिनों दिनों को भूल जाना चाहती हैं लेकिन अमीर लोग उसे भूलने नहीं देते |   


7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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