शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

जाना एक सरकारी ऑफिस में ....

जाना एक सरकारी ऑफिस में ....
साथियों , कल दुर्भाग्य से  एक सरकारी दफ्तर में हमारा जाना हुआ ,दरअसल मामला पापा की पेंशन का था ,दस सालों से उनका एक मसला बाबुओं की  हथेली गर्म ना करने की वजह से लटका हुआ था , कई लोगों ने कह दिया था कि बिना पैसा खर्च करे ये काम भगवान् भी नहीं करा सकता ,कुछ ऐसे भी निकले जिन्होंने साफ़ लफ्जों में कह दिया था कि काम तो आपका हो जाएगा लेकिन आधा पैसा उन्हें देना पड़ेगा ,लेकिन एक टीचर की रगों में ना जाने कैसा खून दौड़ता है ,उन्होंने जवाब दिया 'चाहे मेरा पैसा मिले न मिले ,लेकिन घूस के नाम पर एक पैसा नहीं दूंगा .इस प्रकार चिट्ठी -पत्री करते -करते १० साल निकल गए .फिर किसी ने पापा को यह बताया कि वे सूचना के  अधिकार के अर्न्तगत इस  मामले को ले जाएं ,पापा की बेटी होने के नाते मैंने उनसे कहा कि यह काम मैं कर दूंगी ,आप इस उम्र में परेशान हो जाएँगे ,तो जब  पहले दिन कार्यालय गए तो पता चला कि जो इस मामले को देखती हैं ,वे आज नहीं आई हैं ,पहले दिन बैरंग वापसी के बाद जब हम दूसरे दिन वहां गए ,तो हमें पता चला कि सरकारी बाबू क्या होते हैं ,जब हम उन महिला के पास पहुंचे तो वे बिलकुल ही अनजान बन गईं .क्या ,कैसे ,कब वाले भाव उनके चेहरे पर आ गए ,फिर हमने जब उन्हें बताया कि आपके पास हमारे पिताजी दो दिन पहले आए थे और आपने उन्हें एक प्रार्थना पत्र लाने के लिए कहा था ,तो कुछ -कुछ उनकी स्मृति लौट आई ,फिर उन्हों हमें हाथों के इशारे से कमरे के दाहिनी तरफ जाने के लिए कहा ,कि वहां एक बाबू हरीश नाम के बैठते हैं ,वही इसे लेंगे ,तो उनकी बताई हुई दिशा की ओर जब हम गए ,और वहां जाकर अमुक नाम के सज्जन के बारे में पूछताछ की ,तो पता चला कि वह उसकी उल्टी दिशा में बैठते हैं ,मतलब जहाँ से हम आए थे ,उसी के बगल वाले कमरे में ,हमने फिर वहां की दौड़ लगाई और ,उनकी  पूछताछ करी ,मालूम हुआ कि वह यह मामला नहीं देखते ,हमारे यह पूछने पर कि इस मामले को कौन देखता है ,वह सज्जन एक दम से क्रोधित हो गए ,'हमें नहीं मालूम ,आप आगे ऑफिस से पता कीजिए ,देखते नहीं हम   काम कर रहे  हैं ' अंतिम वाक्य उन्होंने बहुत जोर देकर कहा ,तब हमें एहसास हुआ कि हमने कितना बड़ा गुनाह कर दिया ,वहां मौजूद सारे कर्मचारी बेहद गुस्से में दिख रहे थे ,पता नहीं उन्हें गुस्सा किस पर था ,लेकिन इतना समझ में आ गया था कि यह गुस्सा  सरकारी कर्मचारी होने पर भी काम करने का था ,फिर हम काफ़ी देर तक मेरी गो राउण्ड खेलते रहे ,मतलब एक टेबल से दूसरी टेबल तक हमारा अनवरत आवागमन जारी रहा ,पैर टूट कर बेजान हो गए ,हमें इतना समझ में आ गया था कि जब हम ये हमें इतना नचा सकते हैं तो हमारे वृद्ध पिताजी को कितना नचाते ,हर कर्मचारी ये समझ रहा था कि  शायद हमारा जन्म इस तहसील के आँगन  में  हुआ हो , हम इसी के बरामदे में खेलते कूदते बड़े हुए हों ,और  यहाँ के कर्मचारियों के साथ हमारा दिन रात उठना बैठना हो .यहाँ आकर ये लग रहा था कि शायद इंसान को अभी दिशा बोध नहीं हुआ है , एक कर्मचारी ने तो हवा में इशारा किया कि ये इस नाम के सज्जन यहाँ मिलेंगे .उस महिला कर्मचारी  ने हमें जब उत्तर की ओर इशारा किया तब उसका आशय दक्षिण दिशा से था , वे सारे कर्मचारी यूँ बात कर रहे थे  जैसे कि हमें उनके इशारों को समझ जाना चाहिए था , ऐसे मौकों पर स्वयं पर कोफ्त होती है कि भगवान् ने हमें अन्तर्यामी क्यूँ नहीं बनाया , एक ही परिसर में घूमते घूमते हमें घंटों हो गए ,उस पर तुर्रा ये कि बार बार पूछा भी जा रहा है कि 'काम हुआ कि नहीं , या फलाना सज्जन मिले या नहीं 'मन हुआ कि एक बार कह दें कि आप लोग साल में एक बार जनता को ट्रेनिंग देने के लिए यहाँ पर अवश्य बुलाएं ,उन्हें हर कर्मचारी और उसके काम के बारे में जानकारी दें  ताकि हमारी तरह वे चहुँ दिशाओं में भ्रमण करने से बच जाएं . अंत में दो घंटे के अथक प्रयास के बाद जिस वह शख्स पकड़ में आ गए ,जो पापा का कागज़ लेने वाले थे ,मिल तो ये हमें  एक घंटे पहले ही गए थे ,लेकिन तब इन्होंने कहा था कि ये मामला अमुक नाम की मैडम देखती हैं ,जो आज नहीं आई हैं ,तो जब हमने उन्हें कागज़ थमाए   तो बोले  ..'ये तो यहाँ का मामला ही नहीं है ,इसे आपको इलाहबाद  भेजना पड़ेगा ,कहने का मन तो बहुत हुआ कि 'ये बात आप पहले नहीं बता सकते थे ',लेकिन इतने चक्कर लगाते लगाते हलक इतना सूख चुका था कि लग रहा था कि बेहोश होकर अब गिरे तब  गिरे .किसी तरह से घर पहुंचे और पापा को यह खुशखबरी दी कि आपका यह काम यहाँ से नहीं होगा ,एक बार फिर से आप अपने प्रिय  चिट्ठी पत्री के  क्रम को जारी रख सकते हैं .
 

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपने 'ऑफिस ऑफिस' धारावाहिक की याद दिला दी।
    बढ़िया (पोस्ट) :-)

    वैसे अगर अपनी पोस्ट्स को कुछ पैराग्राफ्स में बांट कर दर्शाएँ तो मुझ जैसों की रूचि बनी रहेगी, पढ़ने में

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  2. आप उस आफिस के कुछ चित्र भी मोबाइल में उतार लाते और उन्‍हें इस पोस्‍ट के साथ लगाते तो शायद काम तेजी से हो जाता। वैसे दिल्‍ली दूर नहीं है ... यह शुभ कार्य तो अभी भी करवाया जा सकता है। पर उन्‍हें न पता लगे तो बहुत आनंद आएगा।

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  3. बडी पीडादायक बात है कि इस उम्र के इंसान को पेंशन के लिये इस तरह भटकना पडॆ और वो दस साल हो चुके है. क्या फ़ायदा ऐसी पेंशन का? आपने सटीक लिखा है. शायद अब आप मामले को देख रही हैं तो जल्द हल निकल आये. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  4. सूचना के अधिकार का प्रयोग तो करतीं आप फिर देखतीं यही बाबू घर आते कागज, पेंशन लेकर।
    वैसे देश चल ही बाबुओं के सहारे रहा है। अधिकारी तो मंत्रियों के साथ बैठे बैठे बैठकें किया करते हैं।

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  5. लालफीताशाही इसी को कहते हैँ....


    वैसे सूचना के अधिकार के अंतर्गत आप अगर उनसे कुछ पूछती हैँ तो उन्हें उत्तर देना ही पड़ेगा

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  6. हरिशंकर परसाई जी का व्यंग्य है: भोलाराम का जीव!!

    उसे अवश्य पढ़ें.

    http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_/_%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88

    एकदम अपनी कहानी नजर आयेगी.

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  7. इसी को कहते हैं सरकारी दफ्तर, कई बार इन जगहों पर जा चुके हैं। और ऐसे ही पंगे में पड़ चुके हैं। यदि गुस्सा हो जाओं तो फिर भूल जाओ कि कभी भी आपका काम होगा।

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  8. भगवान माफ करे इन सरकारी दफ्तरों से।

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  9. दस साल में आप इतना ही पता लगा पाये कि काम इलाहाबाद में होगा?

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  10. और अगर आप के पास पावर होती तो स्थिती बिल्कुल उलट होती, फ़िर इनकी चमड़ी रिश्वत की रकम से इतनी मोटी हो गई है कि इन्हें कोई असर नहीं पड़ता है। भगवान आपके पापा की पेंशन का टेंशन ले और उन्हें जल्दी मिले।

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