गुरुवार, 3 सितंबर 2009

आप सबकी आभारी हूँ .

शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में ....आप सभी लोगों ने मेरे नए ब्लॉग 'मास्टरनी - नामा' के प्रति अपना प्रेम प्रर्दशित किया ,उसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ .
 
आजकल वे लोग भी शिक्षा व्यवस्था को कोसने लगे हैं जिन्हें शिक्षा के असल मायने तक पता नहीं होते . जो स्वयं किसी नैतिकता का पालन नहीं करते ,  वे शिक्षकों के लिए  आचार - संहिता का निर्धारण करने लग गए हैं ,शिक्षकों के लिए  नैतिक मापदंडों का निर्धारण करने वाले ये क्यूँ भूल जाते हैं कि शिक्षक भी उन्हीं के बीच से आया हुआ एक प्राणी है .उसके अन्दर भी एक आम आदमी सांस लेता है . किस क्षेत्र में बुराइयां नहीं हैं ? आज समाज का हर क्षेत्र ,हर तबका जब सांस्कृतिक ,सामाजिक एवं नैतिक अवमूल्यन से गुजर रहा है ,तब  ऐसे में शिक्षकों से आदर्श के प्रतिमान स्थापित करने की अपेक्षा करना कितना उचित है ,यह बात सच है कि बच्चा अपने अध्यापक से बहुत कुछ सीखता है , वह उसका रोल मोडल होता है ,लेकिन यह भी सच है कि शिक्षक के पास बच्चा सिर्फ ५ - ६ घंटे व्यतीत करता है , बाकी  का समय वह अपने माँ -बाप और  परिवार के बीच में  बिताता है ,और उस अवधि में माँ - बाप  बच्चे के अन्दर कौन से संस्कार भरते हैं ,यह भी विचारणीय प्रश्न है और आज के व्यस्त माता -पिता अपने बच्चे को कितना समय देते हैं ? इस बात का भी इमानदारी से जवाब देना होगा, कितने माता पिता ऐसे हैं जो बच्चों को यह सिखाते हैं कि अपने टीचर्स की इज्जत करनी चाहिए, उनकी बात माननी  चाहिए ? इसके उलट हम उनके सामने उनके  टीचर्स के प्रति ज़हर उगलते रहते हैं ,हम बच्चों की कापियों में जान - बूझ कर गलतियां ढूंढते हैं, ताकि किसी ना किसी प्रकार से टीचर को  बेईज्ज़त किया जा सके ,हम ये जानने की कोशिश नहीं करते कि टीचर एक साथ इतने बच्चों को कैसे संभालते होंगे,  हमारी पूरी कोशिश सिर्फ यह जानने की होती है कि हमारे जिगर के टुकड़े को टीचर डांटती  तो नहीं है ,या कभी गलती से भी उसने कभी  हमारे लाडले  मारने की कोशिश तो नहीं की, बच्चे की एक झूठी  शिकायत पर स्कूल और सारे स्टाफ की कर्तव्यनिष्ठा पर प्रश्नचिंह लगाने लग जाते हैं  बच्चे का स्कूल तक बदल दिया जाता है .ऐसे माता - पिताओं की भी कमी नहीं है जो खुद अपने बच्चों को घर पर एक पल के लिए भी संभाल नहीं सकते ,जिनके घरों में  चौबीस में से दस  घंटे टी.वी. पर  कार्टून चैनल  चलता है , कई घरों में तो  बच्चों के लिए एक अलग टी . वी . की भी व्यवस्था है, भांति - भांति के विडियो गेम हैं, क्यूंकि उनके पास एक अकाट्य तर्क है   'क्या करें ,कहना ही नहीं मानता '   लेकिन स्कूल वालों से उनकी ये अपेक्षा रहती है कि वे कोई  ऐसी जादू की झड़ी घुमा  दें कि वह एकदम से अच्छा बच्चा बन जाए ,टॉप करने लग जाए..
शिक्षकों के हाथ से समस्त अधिकार छीन कर, उनके हाथों को बाँध कर उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे बच्चों के प्रति समर्पित रहें , उन्हें अपने बच्चे की तरह समझें , स्नेह दें ,यह कैसे संभव है ? अपने बच्चे को तो इंसान डांटता भी है ,फटकारता भी है  ,और कभी कभार मारता भी  है ,लेकिन टीचर का जोर से बोलना तक  सभी को नागवार गुज़रता है .  ज़रा  सी  गलती पर उसे जेल भिजवाने तक से गुरेज़ नहीं किया जाता है, रात - दिन ऐसी  असुरक्षा के हालात में रहने वाला  शिक्षक किस - किस की अपेक्षाओं को पूर्ण करे ?
इस बात पर चिंतन और मनन करने आवश्यकता है ..
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सही बात है माता पिता को अपने बच्चो को सही सीख देनी चहिये

    पंकज

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  2. Jaise jaise hum develop hote gaye uske sath hum apne desh ko v bhulate chale gaye. Aj hamri pidi khatam ho rahi he to sirf hamare apne swartho ke karan. hum bacho ko sukh suidaye dene ke piche bhagte he par ye bhul jate he ke is sabne unhe apse wa sanskaro se kitna dur kar diya he.Jab solution hamare pas he to hum use bahar kyon dundh rahe he.

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