शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

व्यंग्य की जुगलबंदी-28


उन्हें बहुत गर्मी लगती है  | 

वे बड़ी सी टाटा सफारी में आए | 'खचाक' से हनुमान मंदिर के आगे उन्होंने गाड़ी रोकी | भगवान् की मूर्ति को प्रणाम किया | आस - पास खड़े लोगों ने सोचा कि हनुमान जी को प्रणाम करने के लिये गाडी रोकी है | '' आजकल की पीढ़ी भगवान् को ज़्यादा मानती है '' ऐसा सोचने ही जा रहे थे कि उनके अनुमानों पर बिजली गिर पडी | 'बजरंग बली की जय'' बोल कर उन्होंने सामने दुकान की ओर नज़र दौड़ाई जहाँ उन्हें चिप्स, नमकीन, कोल्डड्रिंक सजे - धजे खड़े हुए दिख रहे थे | 
गाड़ी में सवार सभी जवान सभी जवान,नौजवान और ऊर्जावान मालूम पड़ते थे | संख्या में वे लगभग नौ या दस रहे होंगे क्योंकि गाड़ी पूरी भरी हुई थी | 
गाड़ी में सवार सिर्फ एक जवान ने आधी बाजू की टी - शर्ट और जींस पहनी हुई थी | अन्य सभी केवल बनियान और बरमूडा पहने हुए थे | गाड़ी का ए.सी. ऑन था फिर भी वे पसीने से लथपथ हो रहे थे |   
गाड़ी का दरवाजा जैसे ही खुला, बदबू का तेज़ भभका हमारे नथुनों से टकराया | अंदर शराब की बोतलें खुली हुई थीं | उनमे से वही जिसने पूरे कपडे पहन रखे थे, गाड़ी से नीचे उतरा और दुकान के अंदर चला गया | थोड़ी देर में सोडे की एक बोतल हाथ में लेकर वह गाडी के पास आया | बनियानधारी दूसरे युवा ने उसके हाथ में शराब की बोतल थमाई | सोडे को शराब में मिलाने की प्रक्रिया में उसने अपने चारों ओर नज़र दौड़ाई | आस - पास के सभी लोगों को अपनी ओर देखते पाकर वह बहुत खुश हो गया और दोगुने उत्साह से शराब में सोडा मिलाने लगा | 

काले रंग का बनियानधारी दूसरा युवा दौड़ लगाकर उसी दुकान से चिप्स और नमकीन के पैकेट हवा में लहराते हुए, जिससे कि सब अच्छी तरह देख लें, गाड़ी के पास ले आया | 

एक और लाल बनियानधारी युवा को इतनी तेज़ गर्मी लगी कि उसने खिड़की से बाहर अपना आधा शरीर निकाल लिया | पानी कीएक बोतल उसने अपने सिर पर उड़ेल ली | पास खड़ी महिलाओं के कौतुहल से भरे चेहरे उसे अच्छे लगे इसीलिये वह उन्हें देखकर अश्लील सा गाना गाने लग गया |  
एक सफ़ेद बनियानधारी को ए. सी. में इतनी गर्मी लगी कि वह भी गाड़ी से बाहर आ गया | उसके हाथ में बोतल थी वह उस बोतल को पकड़ कर ही नाचने लगा | मंदिर में हनुमान जी के दर्शनों के लिए आई महिलाऐं पूजा छोड़ कर उन्हें ही ताकने लगीं | वह और जोश में नाचने लगा | 
एक और पीले बनियानधारी ऊर्जावान ने गाड़ी से उतरकर सिगरेट जला ली | लगा कि बहुत देर से वह बाहर आना चाहता था लेकिन ए. सी. छोड़कर आ नहीं पा रहा था | उसने सिगरेट सुलगाई | धुएँ के के छल्ले बना - बना कर वह अन्य बनियांधारियों के मुंह पर मारने लगा | बीच - बीच में गाँव वालों की तरफ भी मुंह घुमा ले रहा था और धुँवा छोड़ रहा था | 
गाड़ी के अंदर से ज़ोर - ज़ोर की गाने की आवाज़ें आ रही थी | बाहर खड़े अन्य नाचने लगे और अंदर बैठे भी बैठे - बैठे ही नाचने की मुद्रा में आ गए |
एक अन्य दूसरी खिड़की से आधा बाहर निकल कर खिड़की के ऊपर ही बैठ गया, वहीं से टेढ़े - मेढ़े हाथ हिला कर नाचने का भ्रम पैदा करने लगा | 
पूरे कपडे पहने हुए नौजवान मंदिर के अंदर लगे हुए नल से बोतल में पानी भर लाया फिर सबके ऊपर उस पानी को छिड़कने लगा | गर्मी से सबसे ज़्यादा आहत वही लग रहा था | थोड़ी देर बाद उसने पानी को मुंह के अंदर भरा और पिचकारी सी मारते हुए कुल्ला करने लगा | सफ़ेद बनियानधारी को यह क्रिया बहुत पसंद आई उसने भी बोतल पकड़ कर इसे दोहराया | सारे बनियानधारी नीचे उतर गए और मुंह में पानी भर कर सड़क पर कुल्ला करने लगे | 

मन भर के नाचने, गाने, पीने, खाने, कुल्ला करने के बाद वे सब के सब आस -पास वालों को अकबकाई हालत में छोड़कर, अपनी टाटा सफारी में बंद होकर हल्ला मचाते हुए अगले पड़ाव की ओर चल पड़े | 

उसे बिलकुल गर्मी नहीं लगती | 

आँखों पर ऑपरेशन करने के बाद लगाने वाला काला चश्मा लगाए, सिर पर मोटे कपडे का फेंटा बांधे हुए, पुराना घिसा हुआ घाघरा, जगह - जगह से पैबंद लगी हुई कुर्ती, चेहरे पर हज़ार झुर्रियां और हाथों में लाठी पकड़े हुए वह उन दोनों के पास आकर खड़ी हो गयी | 

दोनों ने उसे देखा | उसने कुर्ती के ऊपर मोटा सा स्वेटर, पैरों में कपडे के पुराने जूते पहन रखे थे | ''इतनी गर्मी में स्वेटर ! हायराम ''! उनके मुँह से निकला | 
''ठण्डी लगरही है बहनजी ''|  
''कहाँ रहती हो'' ? 
गर्मी से बेहाल छायादार पेड़ के नीचे खड़ी दोनों में से एक ने सवाल किया | 
''पीरूमदारा में'' | कहकर उसने उनके आगे एक हाथ पसार दिया | 
''बाप रे ! इतनी दूर से यहां क्या करने आई हो ''? सवाल के हास्यास्पद होने का उन्हें पता था | 
''क्या करूँ ? पापी पेट का सवाल है | दवाई खरीदने के लिए पैसे चाहिए | यह ऑपरेशन हुआ है आँख का | इसी के लिए दवा चाहिए ''| 
''इस उम्र में ऐसे क्यों भटक रही हो ? बच्चे नहीं हैं क्या तुम्हारे''? फिर से  हास्यास्पद सवाल पूछकर उन्होंने अपना पल्ला छुड़ाना चाहा | 
''अब क्या बताऊँ ? दो लड़कियाँ हैं | दोनों का ब्याह भी कर दिया था | लेकिन अब दोनों के आदमी मर गए हैं | दोनों के  तीन - तीन चार चार बच्चे हैं | सबको पालने के लिए मुझे मांगना पड़ता है ''| कहकर वह हंस दी | 
उन्होंने उसे बीस - बीस रूपये दिए | खुश होकर वह चौराहे की तरफ तरफ चली गयी जहाँ बहुत सारे लोग बस के इंतज़ार में खड़े थे |  
चौराहे पर खड़े लोग उसे देखते फिर उसके स्वेटर को देखते | कुछ बड़बड़ाते हुए पर्स खोलने लगे तो कुछ बस को देखने का अभिनय करने लगे |  
पैसा देने वाले सवाल पूछ रहे हैं, ''इतनी गर्मी में स्वेटर पहन रखा है | तुमको गरम नहीं लगता ''?  
''नहीं लगता साहब बिलकुल नहीं लगता'' |  वह जवाब देती है | 
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर । बहुत से उत्सव नजर आ जाते हैं छोटे छोटे बड़े पीछे कहीं छुप जाते हैं शरम के कारण।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "विनम्र निवेदन - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. गर्मी के भी अपने अपने आयाम और एहसास हैं। पैसा इंसान को बाहरी ठंडक और अंदरुनी गर्मी देता है।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-04-2017) को
    "खोखली जड़ों के पेड़ जिंदा नहीं रहते" (चर्चा अंक-2619)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. पैसे की गरमी और गरीबी के पैबंद फ़ौरन नज़र आते हैं लोगों को
    बहुत सही शब्द चित्र

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