शनिवार, 8 अप्रैल 2017

मुर्गा, बकरा, गाय और एक औरत का हलफनामा [ श्रेणी- व्यंग्य ]

जी बहिन जी ! 
अपनी तो कट गयी | साथ - साथ बीस साल कट गए जितने और बचे हैं, वे भी कट ही जाएंगे | 
शुरुआत में ऐसा नहीं था | नाम सुनकर ही घिन आ जाती थी | 

शादी के बाद पहली बार बाहर खाना खाने गए थे | हम ठहरे सदाबहार पनीर के आइटम खाने वाले, सो पनीर का कोई आयटम मंगवा लिया | उन्होंने मेन्यू में किसी चीज़ पर हाथ रखा और जब वेटर वह लाया तो उसे देखकर ऐसा लगा कि आंतें बाहर आ जाएँगी | प्लेट पर एक झींगा पड़ा हुआ था | उन्होंने जैसे ही उसे खाना शुरू किया हमें उबकाई आने लगी | किसी तरह से माफी माँगी और वाशरूम में जाकर सब खाया पिया उलट दिया तब भी वह वितृष्णा शांत नहीं हुई | 

हम तो ऐसे घनघोर शाकाहारी हुए कि पूछो मत | केक या बिस्किट में गलती से भी अंडा मिला हो तो नाक कई फ़ीट दूर से अलार्म देने लगती है | 
झगडे भी बहुत हुए और क्यों न होंगे भला ? वो घनघोर मांसाहारी हम घनघोर शाकाहारी | 

एक बार चिकन लाये थे कि घर में गरम कर के खाएंगे | बनाने को तो हम शादी से पहले ही साफ़ शब्दों में मना कर चुके थे लेकिन गरम करने की बात दिमाग में ही नहीं आई वरना नौबत यहाँ तक पहुँचती ही नहीं | हुआ यह कि वे लाये चिकन और बोले कि माइक्रोवेव में गरम कर देना | हमने मना कर दिया | चिकन सुनकर ही दिमाग भन्ना गया था | हमारे हाथों में नया - नया लैप टॉप था जो कि किस्तों में खरीदा था | हम नई - नई चैटिंग करना सीख रहे थे | उन्हें गुस्सा आ गया | उन्होंने सोचा कि हम चैटिंग में व्यस्त हैं इस कारण चिकन गरम करने से इंकार कर रहे हैं, सो हमारे हाथ से लैप टॉप लिया और पटक दिया ज़मीन पर | एक झटके में पचास हज़ार स्वाहा | 

तो उस दिन से लेकर आज तक हमने चिकन, मटन इत्यादि गरम करने के लिए कभी मना नहीं किया | हम समझ गए कि घिन अपनी जगह और आर्थिक नुकसान अपनी जगह | 

शादी तय होने से पहले  इस बात पर सहमति हो गयी थी थी कि वे जब नॉन - वेज खाएंगे तो उसके बर्तन अलग होंगे और हम उन्हें न छुएंगे न धोएंगे | घर में एक छोटी सी रसोई अलग से थी वहीं गरम करते थे, खाते थे और बर्तन धो देते थे | शुरू- शुरू में उन्होंने रखा बर्तनों को अलग | साफ़ भी किये | लेकिन बाद के सालों में बर्तनों को अलग रख तो देते थे लेकिन धोना भूल जाते थे | कई - कई दिनों तक पड़े रह जाते थे | बदबू का भभका पूरे घर में छा जाता था | सड़ांध आने लग जाती थी | उनसे कहो तो कहते थे, ''कामवाली को और पैसे दे दो और उससे साफ़ करवा लो ''| कामवाली पूरे पांच सौ रूपये पर राजी हुई | फिर एक दिन वह हमेशा की तरह बिना बताए छुट्टी पर चली गयी | झख मारकर करने पड़े साफ़ बर्तन | क्या करते? हर बर्तन से मुर्गे और बकरे की चीख आ रही थी | फिर तो सिलसिला चल पड़ा | अब तो न किसी की चीख सुनाई देती है न किसी की आँख प्लेट में दिखती है | पांच सौ रूपये हर महीने बचे सो अलग | 

एक बार हम बहुत बीमार पड़ गए | पिला दिया चोरी से हमको शोरबा | हम बोले '' बहुत स्वादिष्ट चीज़ बनाई है आपने | क्या है यह ? हंसने लगे '' वही जिससे तुम्हें बहुत घिन आती है'' | हमें काटो तो खून नहीं | ''चिकन' है क्या ''?  बहुत मुश्किल से पूछ पाए | 
'' नहीं मटन का शोरबा है बस | टुकड़ा एक नहीं दिया तुम्हें | देखो नाराज़ मत होना इससे तुम्हें ताकत मिलेगी  ''| 

हम बीमार बिस्तर पर | पेट में थोड़ी बहुत मरोड़ हुई लेकिन फिर सब सामान्य हो गया | हम चुपचाप बिस्तर पर पड़े - पड़े बचपन के दिनों को याद करने लगे कि कैसे हम नॉन - वेज की खुशबू से ही दूर भाग जाते थे | एक  एक बार पड़ोस के एक तांत्रिकनुमा रिश्तेदार ने नवरात्र में कन्या पूजन के पश्चात बकरा काटा | सुबह चार बजे उठाकर हमें उसका प्रसाद दिया | '' प्रसाद तो खाना ही पड़ता है'' कहकर उन्होंने हमारे मुंह के अंदर डाल दिया था | हमने उनके सामने ही थूक दिया सब और भागे सिर पर पैर रखकर | वे आवाज़ देते ही रह गए | कई सालों तक वे हमसे नाराज़ रहे कि हमने देवी के प्रसाद का ऐसे अपमान किया | हमें लगता है कि उन्हीं के श्राप की वजह से आज हमारे साथ ऐसा हो रहा है कि हम नॉन - वेज पका रहे हैं, उसके बर्तन धो रहे हैं और तो और शोरबा भी चख ले रहे हैं | 

'बीफ' क्या होता है यह भी शादी के बाद ही जाना | हमारे लिए नॉन वेज माने मुर्गा, बकरा और मछली | अब ये नई चीज़ सी फूड और बीफ थी | 
एक दिन ऐसे ही पीत्ज़ा खाने के बैठे | उन्होंने पूछा ''बीफ वाला है क्या ?'' हमारा दिमाग उसी समय घूम गया | ''आप यह भी खाते हैं क्या ''?
'' हाँ क्यों ? बड़ा स्वादिष्ट होता है | चखोगी ''? पूछा उन्होंने | 
उन्होंने इतने साधारण लहज़े में कहा कि जैसे यह तो रोज़ के दाल -भात खाने जैसा है उनके लिए | 

अब क्या करें ? औरत हुए हम | लड़ाई - झगड़ा क्या करें ? खाते हैं तो खाएं | साथ तो रहना ही है | इसी बात का शुक्र मनाते हैं कि हमारे मुंह में जबरदस्ती मीट - मुर्गा नहीं डालते |  
पहले कहते थे कि '' मुझसे प्यार करती हो तो खाना पड़ेगा ''| 
हमने कहा '' आप हमसे प्यार करते हैं तो आप ही छोड़ दीजिये ना ''| 
उस दिन से उन्होंने खाने के लिए कहना छोड़ दिया | 
 
होती थी दिक्क्त, बिलकुल होती थी शुरू के सालों में | साथ सोने में घिन आती थी | मन करता था कि कह दूँ '' मुंह से बदबू आ रही है'' पर हिम्मत नहीं होती थी | धीरे - धीरे बदबू कम होती गयी अब पूरी तरह से गायब हो गयी | अब तो कभी - कभी मन होता है कि उबला हुआ अंडा खाना शुरू कर दूँ | जब बहुत भूख लगी होती है और कुछ बनाने का मन नहीं करता और सड़क के किनारे खड़े हुए लोग चटखारे ले - लेकर अंडा पकौड़ा खाते हैं तो मन करता है कि मैं भी गप्प से खा लूँ | पेट तो भर जाएगा | 

 और मज़ेदार बात बताते हैं | हमारी छोटी बहिन है, उसने तो बाकायदा शोरबा पीना शुरू भी दिया है |  कहती है कौन अपने लिए अलग से पकाए | एक दो पीस खा भी लेती है | शादी से पहले हमसे भी ज़्यादा खतरनाक थी | कॉलेज जाने के रास्ते में मछली कटती देखकर उसने अपने आने - जाने का रास्ता ही बदल लिया था | दो किलोमीटर अधिक चल लेती थी लेकिन मछली का काटा जाना नहीं देख सकती थी | कभी गलती से रास्ते चलते कटे हुए या लटके हुए बकरों पर नज़र पड़ जाती थी तो दो दिन तक बुखार मे पडी रहती थी | 

अब बहिन दुखी नहीं होती | मुस्कुराते हुए कहती है ''अब साथ रहना है तो कुछ न कुछ समझौता करना ही पड़ता है  ''?
 
      

4 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक।
    हमारा तो बन्द हो गया खाना । ही ही ।

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  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज रविवार (09-04-2017) के चर्चा मंच

    "लोगों का आहार" (चर्चा अंक-2616)
    पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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